अध्याय-06 मुद्रा-अर्थ, कार्य एवं पूर्ति (Money-Meaning,Functions and Supply)
1.मुद्रा का अर्थ एवं विकास(Meaning and Evolution of Money)
विनिमय जीवन की एक सामान्य क्रिया है। इसलिए हिक्स (Hicks) ने अर्थव्यवस्था की परिभाषा पारस्परिक विनिमय प्रणाली के रूप में की है। इसका अर्थ है कि हम अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं । अतः इस निर्भरता के फलस्वरूप ही वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता है।
मुद्रा का उद्गम विनिमय को सरल बनाने के लिए मुद्रा का उद्गम हुआ है। अतः मुद्रा को सामान्यतया उस वस्तु के रूप में परिभाषित किया जाता है जो विनिमय के माध्यम के रूप में सामान्य रूप से स्वीकार की जाती है।
जब आवश्यकताओं में अधिक विविधता नहीं पाई जाती थी तो वस्तुओं का प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं के रूप में विनिमय कर लिया जाता था। उदाहरण के लिए,प्राचीनकाल में एक ग्रामीण समुदाय में जूता बनाने वाला, एक किसान के लिए गेहूँ के बदले में जूता बनाता था और कृषि श्रमिक अनाज के लिए खेतों में काम करता था, इसी प्रकार अर्थव्यवस्था चलती रहती थी । विनिमय की इस प्रणाली को ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ (Barter System) कहा जाता था। परंतु आवश्यकताओं में विविधता बढ़ जाने तथा विनिमय की आवश्यकता अधिक हो जाने के फलस्वरूप वस्तु-विनिमय प्रणाली (वह प्रणाली जिसमें वस्तुओं तथा सेवाओं का विनिमय प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं और सेवाओं के लिए किया जाता है।) विनिमय की एक अव्यवहारिक एवं अप्रभावपूर्ण प्रणाली सिद्ध हुई । इस स्थिति में मनुष्य ने मुद्रा अर्थात एक ऐसे साधन का आविष्कार किया जिसे सामान्य रूप में विनिमय के साधन के रूप में स्वीकार किया जाने लगा। आरंभ में सोने व चाँदी जैसी धातुओं के सिक्के प्रचलित किए गए। परंतु धीरे-धीरे कागजी मुद्रा के साथ-साथ अन्य धातुओं के सिक्के भी प्रचलन के लिए जारी किए जाने लगे और वर्तमान युग तो ऋण कार्ड (Debit Card) तथा साख कार्ड (Credit Card) के रूप में प्लास्टिक मुद्रा का युग है। अतएव मुद्रा का जन्म विनिमय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए हुआ है। इसलिए मुद्रा की परिभाषा एक ऐसी वस्तु के रूप में की जाती है जो सामान्य रूप से विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार की जाती है।
2.वस्तु विनिमय प्रणाली(Barter System of Exchange)
विनिमय अंतर्निर्भरता का प्रतीक है । अर्थशास्त्र में, विनिमय की जरूरत तब पड़ती है जब जितना आपके अधिकार में है जितनी मात्रा में आप उत्पादन करते हैं वह आपकी जरूरत से अधिक है। वस्तु-विनिमय प्रणाली उस प्रणाली को कहते हैं जिसमें वस्तु का विनिमय वस्तु से किया जाता है, अर्थात वस्तु के बदले वस्तु का ही लेन-देन होता है।
परिभाषा (Definition):-
आर० पी० केन्ट के शब्दों में, “वस्तु विनिमय मुद्रा का विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग किए बिना वस्तुओं का वस्तुओं के लिए प्रत्यक्ष विनिमय है।”
(Barter is the direct exchange of goods for goods without the use of money as a medium of exchange.—R. P. Kent)
एक किसान के रूप में यदि आपके पास चावलों का जरूरत से अधिक भंडार है तो आपको एक ऐसे व्यक्ति की तलाश होगी जिसे चावलों की जरूरत है और जिसके पास बदले में देने के लिए कपड़ा है जिसकी आपको जरूरत है। इसका अर्थ आवश्यकताओं का दोहरा संयोग है।
(i) आपकी कपड़े की आवश्यकता किसी अन्य व्यक्ति की चावल की आवश्यकता से मेल खानी चाहिए।
(ii) आपके पास चावलों का आधिक्य तथा अन्य व्यक्ति के पास कपड़े का आधिक्य होना जरूरी है। वर्तमान समय में आप क्या करते हैं? एक किसान के नाते, आप चावलों को मुद्रा के रूप में बेचते हैं और एक कपड़े के व्यापारी के नाते, अपने कपड़े को मुद्रा के रूप में बेचते हैं। इस मुद्रा द्वारा आप उस वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं जिसकी आपको आवश्यकता है। इस प्रकार चावलों का मुद्रा के साथ और कपड़े का भी मुद्रा के साथ विनिमय किया जाता है। मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करती है। वस्तु वस्तु अर्थव्यवस्था (C-C Economy) में ऐसा कोई विनिमय का माध्यम नहीं होता यहाँ वस्तुओं का विनिमय वस्तुओं से होता है।
वस्तु-वस्तु अर्थव्यवस्था की धारणा (The Concept of C-C Economy)
यहाँ C = वस्तु। वस्तु-वस्तु अर्थव्यवस्था उस अर्थव्यवस्था को कहते हैं जहाँ वस्तुओं का विनिमय वस्तुओं से होता है अर्थात वस्तुओं को वस्तुओं में बदला जाता है। वस्तु वस्तु अर्थव्यवस्था को वस्तु विनिमय प्रणाली कहते हैं । अतः वस्तु-वस्तु अर्थव्यवस्था उस अर्थव्यवस्था को कहते हैं जिसमें वस्तु विनिमय प्रणाली का प्रचलन होता है।
2.1 वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ (असुविधाएँ) (Drawbacks of the Barter System)
वस्तु विनिमय प्रणाली की मुख्य कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं। इन कठिनाइयों के कारण ही वस्तु विनिमय प्रणाली को त्याग दिया गया तथा मौद्रिक विनिमय प्रणाली को अपनाया गयाः
(1) आवश्यकताओं के दोहरे संयोग में कठिनाई (Difficulty of Double Coincidence of Wants):-
आवश्यकताओं का दोहरा संयोग वस्तु विनिमय प्रणाली की एक पूर्व शर्त है । आवश्यकताओं के दोहरे संयोग से अभिप्राय यह है कि किसी एक व्यक्ति की वस्तु दूसरे की आवश्यकता को और दूसरे व्यक्ति की वस्तु पहले की आवश्यकता को पूरा करती है। किंतु यह एक दुर्लभ घटना है। वास्तव में यह बहुत ही कठिन है कि आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिले जिसे आपके घोड़े की आवश्यकता हो और उसके पास देने के लिए गाय हो जिसकी आपको आवश्यकता है। अतः वस्तु विनिमय प्रणाली में विनिमय बहुत ही सीमित स्तर पर हुआ करता था ।
(2) वस्तु विनिमय की व्यापार संबंधी लागत (Trading Costs of Barter Exchange) : आवश्यकताओं का दोहरा:-
संयोग एक दुर्लभ घटना होने के कारण वस्तु विनिमय प्रणाली में व्यापार करने की लागतें बहुत ऊँची होती हैं। इन लागतों के दो महत्त्वपूर्ण घटक इस प्रकार हैं:
(i) तलाश की लागत (Search Cost):-
उस व्यक्ति को तलाश करने की लागत जिसकी जरूरतें आपसे मेल खाती हों। इसमें समय की बर्बादी की ऊँची अवसर लागत शामिल है। यह समय आप कुछ अन्य कार्य करने में बिता सकते हैं।
(ii) प्रतीक्षा की अनुपयोगिता (Disutility of Waiting):-
उपयुक्त व्यक्ति (जो उस वस्तु को खरीदने के लिए राजी हैं जो आप बेचना चाहते हैं और उस वस्तु को बेचना चाहते हैं जिसे आप खरीदने के लिए राजी हैं।) की प्रतीक्षा असुविधाजनक है। असुविधा में अनुपयोगिता निहित है। अतः यह लागत प्रतीक्षा की अनुपयोगिता के रूप में खर्च करनी पड़ती है।
वस्तु विनिमय प्रणाली में विशिष्टीकरण (Specialisation) का अभाव पाया जाता है। विशिष्टीकरण के अभाव का अर्थ है उत्पादन की फैक्टरी प्रणाली का अभाव। इसका अर्थ है, बड़े पैमाने पर उत्पादन का अभाव; अर्थात् जीवन के सुख-साधन तथा आनंद के लिए जरूरी वस्तुओं का अभाव । एक व्यक्ति उतना ही उत्पादन करेगा जितना उसके जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
(3) मूल्य की समान इकाई का अभाव (Lack of Common Unit of Value):-
वस्तु विनिमय प्रणाली में मूल्य की समान इकाई का अभाव पाया जाता है। इसके अभाव में किसी वस्तु का मूल्य व्यक्त करना बहुत कठिन होता है। उदाहरण के लिए, यदि आपसे यह प्रश्न किया जाए कि आपकी कार का क्या मूल्य है? आपका उत्तर है: ₹5 लाख । क्या आप यही उत्तर वस्तु विनिमय प्रणाली में दे सकते हैं? निश्चित तौर पर नहीं। ऐसी प्रणाली में आपकी कार का मूल्य घोड़ों, गायों अथवा भैंसों के रूप में निर्धारित किया जाएगा, क्योंकि उस प्रणाली में मुद्रा नहीं पाई जाती। यह स्थिति कितनी बेढंगी और हास्यप्रद है। इसके अतिरिक्त मूल्य की समान इकाई के अभाव में लेखा प्रणाली (Accounting System) का भी अभाव पाया जाता है। यदि किसी एक वस्तु का मूल्य बाजार में किसी दूसरी वस्तु के रूप में निर्धारित होता है तो इस स्थिति में किसी लेखांकन प्रणाली का विकास नहीं किया जा सकता ।
(4) भविष्य में किए जाने वाले या ठेके के भुगतानों या स्थगित भुगतानों की प्रणाली का अभाव (Lack of a System for Future Payments or Contractual Payments or Deferred Payments):-
भविष्य के लिए किए जाने वाले या स्थगित भुगतानों से अभिप्राय उन भुगतानों से है, जिन्हें तत्काल न करके भविष्य में कुछ समय पश्चात किया जाता है। उदाहरण के लिए, ब्याज, मजदूरी, किराया आदि के भुगतान संबंधी जो करार (Contracts) किए जाते हैं उन्हें स्थगित भुगतान कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी श्रमिक की सेवाएँ भाड़े पर लेते हैं और उसके साथ ₹ 5,000 प्रतिमास भुगतान करने का औपचारिक समझौता करते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली में आप क्या करेंगे? क्या आप उसे मेज तथा कुर्सियों, चावल तथा गेहूँ या दवाइयों तथा चॉकलेट आदि के रूप में भुगतान करेंगे ? वस्तु विनिमय प्रणाली में ठेके के (Contractual) भुगतान या भावी भुगतान बहुत कठिन होंगे।
जब भावी भुगतानों का वस्तुओं के रूप में भुगतान करना होता है तो निम्नलिखित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं
(Following Problems crop up when Future Payments are to be made in terms of Goods)
(i) वस्तुओं को चुनने की समस्या या उन वस्तुओं के प्रकार की समस्या जिनका भुगतान भविष्य में किया जाना है।
(ii) विशिष्ट वस्तुओं की गुणवत्ता (Quality) की समस्या ।
(iii) वस्तुओं के बाजार मूल्य की समस्या जो बाजार में अन्य वस्तुओं की तुलना में बढ़ या घट सकती है।
(5) धन या मूल्य के संचय की कठिनाई (Difficulty of Store of Wealth or Value):-
वस्तु-विनिमय प्रणाली में मुद्रा के अभाव में धन या मूल्य का संचय वस्तुओं या पशुओं के रूप में ही किया जा सकता है। परंतु इनके रूप में निम्नलिखित चार कारणों से धन का संचय करना संभव नहीं होता।
(i) कुछ वस्तुएँ जैसे अनाज, सब्जियाँ आदि तथा पशु नाशवान होते हैं। इनका अधिक समय तक संचय नहीं किया जा सकता। यदि इनके रूप में धन का संचय किया जाएगा तो वह कुछ समय बाद नष्ट हो जाएगा।
(ii) कई वस्तुओं की किस्म तथा गुण समय के साथ-साथ खराब होते जाते हैं। इस प्रकार उनका मूल्य कम हो जाता है।
(iii) वस्तुओं तथा पशुओं का संचय करने के लिए बहुत अधिक लंबे-चौड़े स्थान की आवश्यकता होती है।
(iv) पशुओं को जीवित रखने के लिए उन पर धन खर्च करना पड़ता है। अतएव वस्तु-विनिमय प्रणाली में धन का संचय करना संभव नहीं होता ।
(6) मूल्य हस्तांतरण की कठिनाई (Difficulty of Transfer of Value):-
वस्तु-विनिमय प्रणाली में वस्तुओं के का हस्तांतरण करना अर्थात् एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना बहुत कठिन है। मान लीजिए एक व्यक्ति अपना मकान बेचकर दूसरी जगह जाना चाहता है । उसे मकान के बदले में वस्तुएँ तथा पशु ही प्राप्त होंगे। भारी वस्तुओं जैसे अनाज आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना काफी कठिन होगा। मार्ग में पशु बीमार हो सकते हैं तथा मर भी सकते हैं। इसलिए मूल्य हस्तांतरण करना संभव नहीं होगा। इसके फलस्वरूप साधनों की गतिशीलता कम हो जाती है तथा बाजार का विस्तार संकुचित हो जाता है। वस्तु विनिमय प्रणाली में मुद्रा, बैंक खाते, डिपोजिट, चेक, ड्राफ्ट आदि का अभाव होता है। इन सुविधाओं के अभाव में आप कल्पना कर सकते हैं कि जीवन किस प्रकार का होगा।
वस्तु विनिमय प्रणाली में पाए जाने वाले अभाव का सार
(The Substance of what we Lack in a Barter System of Exchange)
(i) उत्पादन जीवन के लिए नितांत आवश्यक वस्तुओं तक ही सीमित हो जाएगा।
(ii) बड़े पैमाने पर उत्पादन और विशिष्टीकरण नहीं होगा ।
(iii) संवृद्धि तथा विकास की धारणाएँ केवल कल्पना बन कर रह जाएँगी ।
- मुद्रा की परिभाषा(Definition of Money):-
मूलत: मुद्रा का प्रवेश विनिमय के माध्यम के रूप में हुआ । अतः कोई भी वस्तु जो विनिमय के माध्यम का कार्य करती है वह मुद्रा कहलाने के योग्य बन जाती है। समय के साथ-साथ लोग मुद्रा के रूप में बचत करने लगे। इस प्रकार मुद्रा के अर्थ तथा परिभाषा में ‘मूल्य संचय’ को भी जोड़ा जाने लगा। इसके अतिरिक्त मुद्रा को ‘मूल्य के मापक’ के रूप में भी पहचाना जाने लगा अर्थात विभिन्न वस्तुओं तथा सेवाओं का मूल्य मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जाने लगा | मुद्रा स्थगित भुगतानों (Deferred Payments) के मान के रूप में भी कार्य करती है । स्थगित भुगतान उन भुगतानों को कहते हैं जो भविष्य में किसी समय में किए जाते हैं।
परिभाषा (Definition)-
आदेश मुद्रा तथा न्यास मुद्रा
आदेश मुद्रा (Fiat Money) वह मुद्रा होती है जो सरकार के आदेश से चलती है। इसमें नोट तथा सिक्के सम्मिलित होते हैं। न्यास मुद्रा ( Fiduciary Money) उस मुद्रा को कहते हैं जो प्राप्तकर्ता तथा अदाकर्ता के बीच परस्पर विश्वास पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, चेक एक न्यास मुद्रा है। इसे भुगतान के रूप में स्वीकार करना विश्वास पर आधारित है न कि सरकार के आदेश पर ।
- क्राउथर के अनुसार, मुद्रा की परिभाषा ऐसी किसी भी वस्तु के रूप में दी जा सकती है जिसे साधारणत: विनिमय का माध्यम स्वीकार किया जाता हो और इसके साथ ही जो मूल्य के मापक और मूल्य के संचय का भी कार्य करती हो ।
(Money can be anything that is generally accepted as a means of exchange and at the same time acts as a measure and as a store of value. -Crowther)
मुद्रा की वैधानिक तथा कार्यात्मक परिभाषा (Legal and Functional Definition of Money):-
कानूनी तौर पर, मुद्रा कोई भी ऐसी वस्तु हो सकती है जिसे कानून द्वारा विनिमय का माध्यम घोषित किया जाए। कागजी नोट तथा सिक्के (जिन्हें सामूहिक रूप से करेंसी कहा जाता है) कानूनी तौर पर मुद्रा है। कोई व्यक्ति इन्हें विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार करने से इंकार नहीं कर सकता । करेंसी को आदेश मुद्रा (Fiat Money) भी कहा जाता है क्योंकि इसके पीछे सरकारी आदेश / सत्ता होती है।
मुद्रा की कार्यात्मक परिभाषा के अनुसार कोई भी वस्तु मुद्रा हो सकती है जो चार मूल कार्य करती है: (i) विनिमय के माध्यम का कार्य, (ii) मूल्य के मापदण्ड का कार्य, (iii) भावी के मान का कार्य और (iv) मूल्य के संचय का कार्य । इस परिभाषा के अनुसार भुगतान कागजी नोट, सिक्के, बैंकों में पड़ी माँग जमा या चेकों द्वारा निकलवायी जाने वाली जमा को मुद्रा में सम्मिलित किया जाता है।
मुद्रा की संकुचित तथा विस्तृत परिभाषा (Narrow and Broad Definition of Money)
मुद्रा परिसंपत्तियाँ तथा निकट मुद्रा परिसंपत्तियाँ मुद्रा परिसंपत्तियाँ (Money Assets) वे परिसंपत्तियाँ हैं जो मुद्रा का कार्य करती हैं इनके अंतर्गत
(i) करेंसी तथा
(ii) माँग जमा को शामिल किया जाता है।
निकट मुद्रा परिसंपत्तियाँ (Near Money Assets) वे परिसंपत्तियाँ हैं जो मुद्रा का कार्य नहीं करतीं, परंतु उन्हें अल्पकाल में ही मुद्रा में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरण, बैंकों के निश्चितकालीन या सावधि जमा।
मुद्रा की कार्यात्मक परिभाषा को संकुचित परिभाषा माना जाता है। इसके अनुसार मुद्रा में केवल नोट, सिक्के, माँग जमाएँ (चेकों द्वारा निकाली जाने वाली जमाएँ) आदि को सम्मिलित किया जाता है। अन्य शब्दों में, संकुचित परिभाषा के अनुसार मुद्रा केवल उन वस्तुओं को ही शामिल किया जाता है जो मुद्रा का कार्य इन रूपों में करती हैं:-(i) विनिमय का माध्यम, (ii) मूल्य का मापदण्ड, (iii) मूल्य का संचय तथा (iv) स्थगित भुगतानों का मान।
मुद्रा की विस्तृत परिभाषा में मुद्रा के अन्य घटकों जैसे बैकों तथा डाकखानों में समय जमा / सावधि जमा को भी सम्मिलित किया जाता है। इन जमा राशियों को बहुत कम समय के नोटिस (Short Notice) पर माँग जमाओं अर्थात् चेकों द्वारा निकाली जाने वाली जमाओं में बदला जा सकता है तथा ये ‘निकट मुद्रा परिसंपत्तियाँ’ (Near Money Assets) कहलाती हैं। अतएव निकट मुद्रा से अभिप्राय उन परिसंपत्तियों से है जो मुद्रा का कार्य नहीं करतीं परन्तु उन्हें अल्पकाल में मुद्रा में परिवर्तित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, बैंकों की निश्चितकालीन जमाएँ । ‘मुद्रा परिसंपत्तियाँ’ तथा ‘निकट मुद्रा परिसंपत्तियाँ’ मिलकर मुद्रा की विस्तृत परिभाषा की रचना करती हैं।
मुद्रा = करेंसी + माँग जमाएँ
मुद्रा की संकुचित परिभाषा के अनुसार (According to Narrow Definition of Money)
(इनसे अभिप्राय उन परिसंपत्तियों से है जो मुद्रा का कार्य करती हैं ।)
मुद्रा की विस्तृत परिभाषा के अनुसार (According to Broad Definition of Money)
मुद्रा = मौद्रिक परिसंपत्तियाँ + निकट मौद्रिक परिसंपत्तियाँ
(इनसे अभिप्राय उन परिसंपत्तियों से है जिन्हें बहुत कम समय के नोटिस ( Short Notice) पर मुद्रा के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है; जैसे- सावधि जमाएँ (Fixed Deposits) ।
मुद्रा का मौद्रिक मूल्य तथा मुद्रा का वस्तु मूल्य
(Money Value of Money and Commodity Value of Money)
‘मुद्रा के मौद्रिक मूल्य’ तथा ‘मुद्रा के वस्तु मूल्य’ में पाए जाने वाले अंतर को समझना बहुत जरूरी है। मुद्रा के वर्गीकरण के संदर्भ में इस अंतर को समझना बहुत आवश्यक है।
मुद्रा का मौद्रिक मूल्य (Money Value of Money):-
इसका संबंध, किसी सिक्के या कागजी नोट पर अंकित मूल्य से है। कागजी नोट का मौद्रिक मूल्य वही है जो उस पर अंकित है; जैसे- ₹100, ₹500 इत्यादि । अत: ₹500 के नोट से आप बाजार में ₹ 500 मूल्य की वस्तुएँ तथा सेवाएँ खरीद सकते हैं।
मुद्रा का वस्तु मूल्य (Commodity Value of Money):-
इसका संबंध उस वस्तु या धातु से है जिसकी मुद्रा बनी होती है। अतः यदि सिक्के सोने या चाँदी के बने हुए हैं (जैसा कि पुराने समय में था ) तो मुद्रा का वस्तु मूल्य एक सिक्के में लगे सोने या चाँदी के बाजार मूल्य के बराबर होगा ।
- मुद्रा का वर्गीकरण(Classification of Money)
मुद्रा का वर्गीकरण सामान्यतः तीन भागों में किया जाता है: (i) पूर्ण – काय मुद्रा (Full-bodied Money), (ii) प्रतिनिधि पूर्ण – काय मुद्रा (Representative Full-bodied Money), (iii) साख मुद्रा (Credit Money)। इनका उल्लेख इस प्रकार है:
(i) पूर्ण – काय मुद्रा (Full-bodied Money):-
इसका संबंध उस मुद्रा से है जो सिक्कों के रूप में होती है। यदि सिक्के पर अंकित मूल्य और उसमें लगी धातु का मूल्य बराबर है तो ऐसे सिक्के को पूर्ण- काय मुद्रा कहा जाएगा। उदाहरणत: अंग्रेजों के शासनकाल में एक रुपये का सिक्का चांदी का बना होता था । इस सिक्के का वस्तु मूल्य इसके मौद्रिक मूल्य के बराबर हुआ करता था । अन्य शब्दों में, एक सिक्के में लगी चांदी का बाजार मूल्य एक रुपया हुआ करता था । अतः रुपया एक पूर्णकाय मुद्रा थी।
(ii) प्रतिनिधि पूर्ण – काय मुद्रा ( Representative Full-bodied Money):-
इसका संबंध कागजी नोटों से है। ये नोट पूर्ण – काय मुद्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वास्तव में यह नोट पूर्ण – काय सिक्कों का प्रतिनिधित्व करने वाली ‘चिट’ (Receipt ) है जिसे सरकार जारी करती है। उस कागज, जिस पर नोट छपे होते हैं, का अपना कोई बाजार मूल्य नहीं होता ।
(iii) साख मुद्रा (Credit Money):-
उस मुद्रा को कहते हैं जिसका मौद्रिक मूल्य वस्तु मूल्य से अधिक होता है। इसका कारण यह है कि जिस वस्तु का मुद्रा के लिए प्रयोग किया जाता है वह वस्तु, बाजार में कुल पूर्ति का एक छोटा अंश होता है । अतः वस्तु का बाजार मूल्य मुद्रा के मौद्रिक मूल्य से बहुत कम होता है।
उदाहरण (Example): भारत में एक रुपये का सिक्का जिस धातु का बना हुआ है उसका बाजार मूल्य एक रुपये के सिक्के के मौद्रिक मूल्य से बहुत कम है। यदि ऐसा नहीं है तो, लोग सिक्कों को पिघला कर उसे धातु के रूप में बाजार में एक रुपये से अधिक कीमत पर बेचने लगेंगे।
उच्च बलयुक्त मुद्रा क्या है? (High Powered Money)
उच्च बलयुक्त मुद्रा में शामिल होते हैं:-
- जनता के पास नकद राशि(सिक्के व पत्र मुद्रा)।
2.बैंकों के पास नकद कोष ।
इसे उच्च बलयुक्त मुद्रा इसलिए कहा जाता है क्योंकि मुद्रा के आधार पर ही बैंक साख निर्माण (या माँग जमाएँ) करने के योग्य होते हैं, जो मुद्रा के रूप में कार्य करती है। उच्च बलयुक्त मुद्रा, इस प्रकार, देश में मुद्रा के प्रवाह को निर्धारित करती है जिसमें (अन्य चीजों के अतिरिक्त) बैंकों की माँग जमाएँ शामिल होती है।
साख मुद्रा के रूप (Forms of Credit Money):-
साख मुद्रा उस मुद्रा को कहते हैं जिसमें मुद्रा का वस्तु मूल्य मुद्रा के मौद्रिक मूल्य से कम होता है। इसमें निम्नलिखित को शामिल किया जाता है:
(i) प्रतीक सिक्के (Token Coins):-
जैसे एक रुपये का सिक्का या 50 पैसे का सिक्का । भारत में यह साख मुद्रा है क्योंकि सिक्के में लगी धातु का बाजार मूल्य उस पर अंकित मूल्य से बहुत कम है (वस्तु मूल्य मौद्रिक मूल्य से कम है) ।
(ii) प्रतिनिधि प्रतीक मुद्रा (Representative Token Money):-
प्रतिनिधि मुद्रा वह मुद्रा है जिसके अंकित मूल्य तथा वास्तविक मूल्य बराबर नहीं होते। ऐसी मुद्रा को वस्तु मुद्रा में बदलने की सुविधा दी जाती है। यह मुद्रा की सूचक अथवा प्रतिनिधि होती है। पत्र मुद्रा (Paper Money) प्रतिनिधि मुद्रा का उदाहरण है।
(iii) केंद्रीय बैंक के प्रॉमिसरि / प्रोनोट नोटों का परिचलन (Circulating Promissory Notes of the Central Bank):-
ये वे कागजी नोट हैं जो केंद्रीय बैंक (जैसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) द्वारा जारी किए जाते हैं। जैसे ₹500 या ₹ 1,000 का नोट । आप इस नोट पर यह वाक्य पाएंगे “मैं धारक को ₹ 500 अदा करने का वचन देता हूँ।” यदि आप लिखे वचन को पूरा करने के लिए बैंक को ₹ 500 का नोट प्रस्तुत करते हैं तो बैंक आपको ₹ 500 के मूल्य का कोई नोट देकर इस वचन को पूरा करेगा। आपको अपने नोट के बदले बैंक से क्या मिला? कागज का टुकड़ा जिस पर उपरोक्त वचन छपा रहता है। इस कागज के टुकड़े का बाजार मूल्य क्या है ? कुछ भी नहीं । स्पष्ट है कि प्रॉमिसरि नोट का वस्तु मूल्य उसके मौद्रिक मूल्य से बहुत कम है। अतः इसे साख मुद्रा कहा जाएगा।
(iv) बैंक की माँग जमाएँ (Demand Deposits at Bank):-
माँग जमाओं को चेक द्वारा निकलवाया जा सकता है या चेक जारी करके किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित किया जा सकता है। इन जमाओं के पीछे बैंकों द्वारा किसी मूल्यवान धातु- सोना या चांदी का कोई आश्वासन नहीं दिया जाता। दूसरे शब्दों में एक चेक का वस्तु मूल्य उसके मौद्रिक मूल्य से बहुत कम होता है । अतः चेकों द्वारा निकलवायी जाने वाली जमाएँ भी साख मुद्रा होती हैं।
- मुद्रा के कार्य(Functions of Money);-
प्रो० किनले ( Kinley) ने मुद्रा के कार्यों को निम्नलिखित तीन वर्गों में बाँटा है:
(1) प्राथमिक अथवा मुख्य कार्य (Primary or Main Functions)
(2) गौण अथवा सहायक कार्य (Secondary or Subsidiary Functions)
(3) आकस्मिक कार्य (Contingent Functions) ।
(1) प्राथमिक अथवा मुख्य कार्य (Primary or Main Functions):-
इस वर्ग में मुद्रा के वे कार्य आते हैं जो प्रत्येक देश और काल में मुद्रा द्वारा किए जाते हैं। इनमें निम्नलिखित दो कार्य आते हैं:-
(i) विनिमय का माध्यम (Medium of Exchange):-
मुद्रा का एक महत्त्वपूर्ण कार्य विनिमय का माध्यम है। इसका अभिप्राय यह है कि मुद्रा के रूप में एक व्यक्ति अपनी वस्तुओं को बेचता है तथा दूसरी वस्तुओं को खरीदता है । मुद्रा क्रय तथा विक्रय दोनों में ही एक मध्यस्थ का कार्य करती है।
(Medium of exchange means to act as an intermediary that can be used in exchange for goods and services in an exchange transaction.)
विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा ने वस्तु विनिमय की मुख्य कठिनाई अर्थात आवश्यकताओं के दोहरे संयोग के अभाव (Lack of Double Coincidence of Wants) को समाप्त कर दिया है। मौद्रिक प्रणाली के अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय को दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहले भाग में वस्तुओं को बेच कर मुद्रा प्राप्त की जाती है दूसरे भाग में इस मुद्रा की सहायता से अन्य वस्तुओं को खरीदा जाता है।
इसके फलस्वरूप विनिमय का कार्य सरल और सुगम हो गया है तथा समय और परिश्रम की बहुत अधिक बचत हुई है। मुद्रा के इस कार्य ने सौदों का समय और स्थान के आधार पर बँटवारा कर दिया है क्योंकि आज किसी वस्तु के विक्रेता को एक निश्चित समय और स्थान पर ही अपनी वस्तु बेचकर तुरंत ही उसी मूल्य की दूसरी वस्तु खरीदने की आवश्यकता नहीं है। अब वह मुद्रा के रूप में अपनी वस्तु बेच सकता है तथा उस मुद्रा के द्वारा अन्य कोई भी वस्तु किसी भी समय तथा किसी भी स्थान पर आवश्यकतानुसार खरीद सकता है। क्रय और विक्रय के कार्यों के पृथक होने के फलस्वरूप लाभदायक व्यापारिक निर्णय लेना सुगम हो जाता है।
वस्तु विनिमय की स्थिति में मनुष्य को अपनी आवश्यकता की वस्तु प्राप्त करने के लिए विनिमय की एक लंबी श्रृंखला में से गुज़रना पड़ता था । इसके फलस्वरूप समय और शक्ति का बहुत अपव्यय होता था । परंतु विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा का प्रयोग किए जाने के फलस्वरूप लोगों को अपनी आवश्यकता की वस्तु प्राप्त करने के लिए विनिमय की लंबी श्रृंखला में से गुजरने की आवश्यकता नहीं रही । इसके फलस्वरूप समय तथा शक्ति की बहुत बचत हुई है । मुद्रा वस्तु के मूल्य का आधार है?
सभी वस्तुओं के मूल्य को मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। मुद्रा की अनुपस्थिति में एक वस्तु के मूल्य को दूसरी वस्तु के मूल्य के रूप में व्यक्त करना पड़ता था, इससे विक्रय, क्रय तथा विनिमय की प्रक्रिया में बाधा आती थी।
मुद्रा के विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करने का अभिप्राय यह है कि इसे लोग सामान्य रूप से स्वीकार करते हैं। इसलिए मुद्रा के द्वारा वे अपनी इच्छा की विभिन्न वस्तुएँ खरीद सकते हैं अर्थात बहुपक्षीय व्यापार ( Multilateral Trade) कर सकते हैं। इस प्रकार मुद्रा लोगों को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करती है तथा बाजार का विस्तार तथा प्रतियोगिता बढ़ाकर बाजार संयंत्र को निपुण बनाती है ।
(ii) मूल्य का मापदण्ड या मूल्य की इकाई (Measure of Value or Unit of Value):-
मुद्रा का दूसरा कार्य वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य को मापना है। मुद्रा लेखे की इकाई (Unit of Account) के रूप में मूल्य का माप करती है । लेखे की इकाई से अभिप्राय यह है कि प्रत्येक वस्तु तथा सेवा का मूल्य मुद्रा के रूप में मापा जाता है |
(Unit of account means that the value of each good or service is measured in the monetary unit.)
विनिमय की एक मुख्य कठिनाई मूल्य मापने का अभाव था । मुद्रा के द्वारा इस कठिनाई को दूर किया जा सका है। प्रत्येक वस्तु और सेवा की कीमत मुद्रा के रूप में व्यक्त की जा सकती है, जब हम यह कहते हैं कि एक किलो चीनी की कीमत ₹ 15 है तो यह चीनी का मुद्रा में व्यक्त किया गया मूल्य है। क्राउथर के अनुसार, “यह लेखे की इकाई का कार्य करती है। यह मूल्य के मापदण्ड अथवा प्रमाणिक मापक जिससे अन्य सभी वस्तुओं की तुलना की जा सकती है, का कार्य करती है ।
” (It serves as a unit of account. It acts as a yardstick of standard measure of value to which all other things can be compared. – Crowther)
मुद्रा के द्वारा सभी वस्तुओं के मूल्य को मापा जा सकता है तथा व्यक्त किया जा सकता है।
प्रत्येक वस्तु का मूल्य आंकने के पश्चात मुद्रा विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के बीच ऐसा अनुपात निर्धारित करती है जिसके आधार पर वस्तुओं तथा सेवाओं में परस्पर विनिमय संभव होता है। इसके फलस्वरूप हिसाब-किताब ( Accounting) रखना सरल हो जाता है। आय तथा व्यय की विभिन्न मदें, परिसंपत्तियाँ (Assets), दायित्व (Liabilities) आदि को मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। मुद्रा के इस कार्य के फलस्वरूप व्यापारिक फर्मों अपनी लागतों, आय, लाभ, हानि का अनुमान लगा सकती हैं। देश की राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय की गणना की जा सकती है तथा योजनाओं का निर्माण किया जा सकता है। मुद्रा के सामान्य मूल्य मापक कार्य के फलस्वरूप समाज में आर्थिक सूचनाएँ प्रसारित करना संभव हो गया है। कीमत संयंत्र (Price Mechanism) की सहायता से, उपभोक्ता अपनी माँग तथा उत्पादक अपनी पूर्ति के लक्ष्य का निर्धारण कर सकते हैं।
(2) मुद्रा के गौण अथवा सहायक कार्य (Secondary or Subsidiary Functions of Money)
इस वर्ग में हम उन कार्यों को सम्मिलित करते हैं जो प्राथमिक कार्यों के सहायक हैं। इनमें निम्नलिखित तीन कार्य शामिल किए जाते हैं:-
मुद्रा ने उपभोग तथा निवेश के लिए उधार को सुविधाजनक बना दिया है मुद्रा उधार लेकर आप उन वस्तुओं को खरीद सकते है जिनका आप प्रत्यक्ष उपभोग करना चाहते हैं अथवा जिन्हें आप खेतों तथा कारखानों में प्रयोग करना चाहते हैं। इसके फलस्वरूप उपभोग तथा निवेश दोनों में वृद्धि हुई है। उपभोग तथा निवेश के ऊँचे स्तर का अर्थ है संवृद्धि तथा विकास का ऊँचा स्तर।
(i) स्थगित भुगतानों का मान (Standard of Deferred Payments ):-
जिन लेन-देनों का भुगतान तत्काल न करके भविष्य के लिए स्थगित कर दिया जाता है उन्हें स्थगित भुगतान कहा जाता है। ऋणों के भुगतान को भी स्थगित भुगतान कहते हैं। के फलस्वरूप स्थगित भुगतानों अथवा उधार लेन-देन की क्रिया सरल बन गई है। मुद्रा प्रत्येक अर्थव्यवस्था में किसी-न-किसी प्रकार के ऋण के लेन-देन की आवश्यकता रहती है। जब हम किसी व्यक्ति से कर्ज लेते हैं तो हमें उसको मूलधन तथा ब्याज दोनों देने पड़ते हैं। ऋण तथा ब्याज का वस्तुओं के रूप में लेन-देन करना एक कठिन कार्य है। मान लीजिए आपने किसी व्यक्ति से गेहूँ के रूप में ऋण लिया है। जब आप ऋण वापिस करेंगे तो उसी गुणवत्ता का गेहूँ देना संभव नहीं होगा। अतः हमें एक ऐसे माध्यम की आवश्यकता है जिसके द्वारा ऋण के लेन-देन तथा ब्याज का निर्धारण सरलता तथा सुविधा से किया जा सके। यह कार्य मुद्रा के द्वारा अधिक सरलता से किया जा सकता है । मुद्रा को स्थगित भुगतानों का मान इसलिए माना गया है क्योंकि (i) अन्य किसी वस्तु की तुलना में इसका मूल्य स्थिर (Relatively Stable) रहता है,
(ii) इसमें सामान्य स्वीकृति ( General Acceptability) का गुण पाया जाता है,
(iii) अन्य वस्तुओं की तुलना में यह अधिक टिकाऊ ( Durable) है |
मुद्रा के इस कार्य के फलस्वरूप ही व्यापार का इतना अधिक विकास संभव हो सका है। मुद्रा के फलस्वरूप उत्पादकों, उपभोक्ताओं तथा सरकार द्वारा ऋण लेना सरल हो गया है। शेयरों, ऋणपत्रों तथा प्रतिभूतियों का क्रय विक्रय मुद्रा के कारण ही संभव हो सका है। स्थगित भुगतानों के मान के रूप में कार्य करके मुद्रा पूँजी निर्माण में सहायक होती है। मुद्रा के इस कार्य के फलस्वरूप ही मुद्रा बाजार (Money Market) तथा पूँजी बाजार (Capital Market) का विकास संभव हो सका हैं । परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि स्थगित भुगतानों के मान के रूप में मुद्रा में कुछ दोष भी पाए जाते हैं। मुद्रा का मूल्य कम होने पर जब कीमतें बढ़ जाती हैं तो ऋणदाताओं (Creditors) को हानि होती है और ऋणियों (Borrowers) को लाभ होता है। इसके विपरीत कीमतों के गिर जाने से मुद्रा का मूल्य बढ़ जाता है तो इसके फलस्वरूप ऋणदाताओं को लाभ होता है तथा ऋणियों को हानि उठानी पड़ती है।
मूल्य का संचय क्या है? मूल्य के संचय से अभिप्राय धन के संचय से है। मुद्रा के आविष्कार से धन का संचय सरल हो गया है। संचित धन भावी निवेश तथा आर्थिक क्रिया के उच्च स्तर का एक साधन है।
(ii) मूल्य का संचय (Store of Value):-
मुद्रा मूल्य के संचय के रूप में भी कार्य करती है। मुद्रा के मूल्य संचय का अर्थ है धन का संचय । इससे अभिप्राय यह है कि मुद्रा को वस्तुओं तथा सेवाओं के लिए खर्च करने का तुरंत कोई विचार नहीं है। (As a store of value, money is held without plans for immediate exchange for a goods or service.) प्रत्येक व्यक्ति अपनी आय का कुछ भाग भविष्य के लिए बचाता है, इसे ही मूल्य का संचय कहा जाता है। वस्तु विनिमय प्रणाली के अंतर्गत मूल्य का संचय करना संभव नहीं था क्योंकि वस्तुएँ नाशवान होती हैं। वस्तुओं को भुगतान के रूप में सभी व्यक्ति स्वीकार नहीं करते। परंतु मुद्रा के रूप में मूल्य का संचय करना सरल होता है क्योंकि (a) मुद्रा को सब लोग स्वीकार कर लेते हैं। (b) मुद्रा के मूल्य में अधिक कमी या वृद्धि नहीं होती है। (c) मुद्रा का संग्रह सरलता से किया जा सकता है। (d) मुद्रा के रूप में बचत करने में बहुत कम स्थान की आवश्यकता होती है। मुद्रा के रूप में की गई बचतें वस्तुओं के रूप में की गई बचतों की तुलना में अधिक सुरक्षित हैं। न्यूलन (Newlyn) ने मुद्रा के इस कार्य को मुद्रा का परिसंपत्ति कार्य (Asset Function of Money) कहा है।
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(iii) मूल्य का हस्तांतरण (Transfer of Value):-
मुद्रा के कारण मूल्य का हस्तांतरण सुविधाजनक बन गया है। आज के इस युग में लोगों की आवश्यकताएँ बढ़ गई हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूर-दूर से वस्तुएँ खरीदी जाती हैं। मुद्रा में तरलता तथा सामान्य स्वीकृति का गुण होने के कारण इसका एक स्थान से दूसरे स्थान पर हस्तांतरण संभव है। इसके अतिरिक्त मुद्रा के रूप में कोई भी व्यक्ति एक स्थान पर अपनी संपत्ति बेच कर दूसरे स्थान पर खरीद सकता है। इसके परिणामस्वरूप पूँजी की गतिशीलता में सहायता मिलती है। मुद्रा के इस कार्य के फलस्वरूप ही लोग अपने अतिरिक्त धन को अन्य व्यक्तियों को उधार देकर ब्याज के रूप में आय प्राप्त कर सकते हैं तथा जो लोग धन को उधार लेते हैं वे इसका प्रयोग अपनी आवश्यकताओं को संतुष्ट करने तथा उत्पादक कार्य के लिए कर सकते हैं।
मूल्य का हस्तांतरण कैसे महत्वपूर्ण है?
मूल्य के हस्तांतरण से अभिप्राय है पूँजी का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना। देश के सभी क्षेत्रों की विकास प्रक्रिया को तेज करने के लिए यह आवश्यक है।
(3) आकस्मिक कार्य (Contingent Functions)
(i) साख निर्माण का आधार (Basis of Credit Creation):-
मुद्रा के प्रचलन से पूर्व साख का निर्माण संभव नहीं था। आज लगभग सभी देशों में चेक, ड्राफ्ट, विनिमय पत्र इत्यादि साख पत्रों का प्रयोग किया जाता है। इन साख पत्रों का आधार मुद्रा ही है। लोग अपनी आय में से कुछ राशि अर्थात मुद्रा बैंकों में जमा करवाते हैं । इस जमा को ही वे चेकों द्वारा मुद्रा के रूप में निकलवा सकते हैं। इस जमा राशि के आधार पर ही बैंक साख का निर्माण करते हैं।
(ii) अधिकतम संतुष्टि का माप (Measurement of Maximum Satisfaction):-
मुद्रा के रूप में धन व्यय करके एक उपभोक्ता अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर सकता है। एक उपभोक्ता विभिन्न वस्तुओं के उपभोग से अधिकतम संतुष्टि तभी प्राप्त कर सकता है जब उन वस्तुओं से प्राप्त होने वाली सीमांत उपयोगिता बराबर हो । मुद्रा द्वारा ही इस प्रकार के संबंध का अध्ययन संभव हो सका है।
(iii) राष्ट्रीय आय का वितरण (Distribution of National Income):-
वस्तु विनिमय में उत्पादन के विभिन्न कारकों के बीच राष्ट्रीय आय का माप व वितरण करना कठिन था । मुद्रा के प्रचलन के पश्चात राष्ट्रीय आय का वितरण बड़ा सरल हो गया है। अब प्रत्येक कारक को उसके द्वारा किए गए कार्य का उचित भाग मुद्रा के रूप में मिल जाता है।
(iv) निर्णय का वाहक (Bearer of Option):-
प्रो० ग्राहम ने मुद्रा के इस कार्य को विशेष महत्त्व दिया है। इस कार्य से अभिप्राय यह है कि मुद्रा के रूप में धन का संचय करके हम परिस्थितियों के अनुसार वस्तुओं को खरीदने के संबंध में अपने निर्णय में परिवर्तन कर सकते हैं। मान लीजिए आप ने एक रंगीन टी० वी० खरीदने के लिए मुद्रा का संचय किया है। परंतु आप को अपने भाई की बीमारी के लिए धन की आवश्यकता है तो आप रंगीन टी० वी० के लिए मुद्रा के रूप में संचय किया गया धन बीमारी पर खर्च कर सकते हैं। इस प्रकार मुद्रा का प्रयोग आप किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कर सकते हैं। मुद्रा आपके निर्णय का वाहक है।
(v) शोधन क्षमता की गारंटी ( Guarantee of Solvency):-
आर० पी० केंट के अनुसार किसी व्यक्ति या संस्था के पास मुद्रा उसकी शोधन क्षमता की गारंटी है। अपनी शोधन – क्षमता बनाए रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, फर्म, बैंक या बीमा कंपनी को मुद्रा के रूप में कुछ-न-कुछ धन अवश्य जमा रखना पड़ता है। मौद्रिक जमाएँ शोधन क्षमता की गारंटी का कार्य करती हैं।
(vi) पूँजी की तरलता में वृद्धि (Increase in the Liquidity of Capital):-
केन्ज का विचार है कि मुद्रा में सामान्य स्वीकृति का गुण होने के कारण यह पूँजी को तरल बनाए रखने का कार्य करती है। हम मकान, दुकान या भूमि इत्यादि के रूप में पूँजी को लेने से मना कर सकते हैं। मुद्रा के रूप में पूँजी लेने से कोई मना नहीं करता ।
अगत्यात्मक तथा गत्यात्मक कार्य (Static and Dynamic Functions)
प्रो० कोलबोर्न (Prof. Coulborn) तथा पाल इन्जिंग (Paul Einzing) ने मुद्रा के सभी कार्यों को केवल दो विस्तृत वर्गों में बाँटा है:
(i) अगत्यात्मक कार्य (Static Functions ):-
मुद्रा के अगत्यात्मक कार्यों से अभिप्राय मुद्रा के स्थिर तथा निष्क्रिय (Passive) कार्यों से है। ये कार्य अर्थव्यवस्था का संचालन करते हैं उसमें गति पैदा करने में कोई सहायता नहीं करते। इन कार्यों में मुख्यतया मुद्रा के प्राथमिक तथा गौण कार्य अर्थात विनिमय का माध्यम, मूल्य का माप, मूल्य के संचय, मूल्य का हस्तांतरण एवं स्थगित भुगतानों का मान आदि कार्य आते हैं।
(ii) गत्यात्मक कार्य (Dynamic Functions):-
इनसे अभिप्राय ऐसे कार्यों से है जो अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करते हैं। गत्यात्मकता का अर्थ है कीमत स्तर में स्थिरता लाना और रोजगार, आय, उत्पादन तथा व्यापार में वृद्धि करना । मुद्रा के मुख्य गत्यात्मक कार्य इस प्रकार हैं:-
(a) अवस्फीति (Deflation) तथा मुद्रा-स्फीति जैसी स्थितियों को दूर करना,
(b) मुद्रा के माध्यम से प्राकृतिक तथा मानवीय साधनों का पूर्ण उपयोग संभव बनाना,
(c) घाटे की वित्त व्यवस्था को संभव बनाना, (d) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में विस्तार,
(e) मुद्रा नीति के प्रयोग से सरकार द्वारा आर्थिक विकास,कीमत स्थिरता आदि उद्देश्यों को प्राप्त करना।
- भारतीय मौद्रिक प्रणाली(Indian Monetary System)
भारतीय मौद्रिक प्रणाली को कागजी मुद्रा मान या प्रबंधित मुद्रा मान (Managed Currency Standard) कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि कागजी करेंसी का भारत में प्रामाणिक मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता है।
प्रामाणिक मुद्रा की धारणा (The Concept of Standard Money)
प्रामाणिक मुद्रा उस मुद्रा को कहते हैं जिसका सरकार या मौद्रिक अधिकारी के आदेश द्वारा अर्थव्यवस्था में परिचालन होता है। इसी के प्रयोग द्वारा सरकार अपने दायित्वों को पूरा करती है।
कागजी (पत्र) करेंसी के साथ धात्विक सिक्के भी चलन में होते हैं। भारत में धातु के सिक्के तथा कागजी नोट दोनों ही साख मुद्रा अंतर केवल इतना ही है कि सिक्के छोटे मूल्यांक तथा कागजी नोट बड़े मूल्यांक वाले होते हैं।
ध्यानपूर्वक नोट करें ! (Note Carefully )
भारत में सिक्के सीमित विधि ग्राह्य (Limited Legal Tender) हैं।
भारत में कागजी नोट असीमित विधि ग्राह्य (Unlimited Legal Tender) हैं।
इसका अर्थ यह है कि भुगतानों का निपटारा करने के लिए सिक्कों का प्रयोग केवल एक सीमा तक ही किया जा सकता है। इसके विपरीत, कागजी नोटों के रूप में भुगतानों का निपटारा करने हेतु उनका प्रयोग असीमित मात्रा में किया जा सकता है।
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भारत में नोट जारी करने की क्या व्यवस्था है ? (What Governs Note Issuing in India ? )
भारत में नोट जारी करने की व्यवस्था को ‘न्यूनतम सुरक्षित व्यवस्था’ (Minimum Reserve System) कहते हैं । समस्त जारी की गई करेंसी के पीछे न्यूनतम सोना एवं विदेशी मुद्रा सुरक्षित कोष में रखी जाती है। इस संदर्भ में दो बातें अवश्य नोट करें:-
(i) सुरक्षित कोष में सोने की मात्रा न्यूनतम ( ₹ 115 करोड़) होती है तथा विदेशी प्रतिभूतियों का मूल्य ₹85 करोड़ होता है। अतएव कुल सुरक्षित कोष का मूल्य केवल ₹200 करोड़ (₹ 115 करोड़ + ₹85 करोड़ ) है । ये सुरक्षित कोष चलन में करेंसी के अनुपात में नहीं होते ।
(ii) लोगों के पास जितनी भी मुद्रा होती है वह सब साख मुद्रा ही होती है। इसे जारी करने वाली संस्था (अधिकरण) इस मुद्रा को सोने या चांदी में परिवर्तित नहीं कर सकती । सुरक्षित कोष में सोना केवल कागजी मुद्रा का आधार है, यह कागजी नोटों को सोने में परिवर्तित करने वाला भंडार नहीं है।
भारत में पायी जाने वाली मुद्रा एक साख मुद्रा है।
आपको यह विदित होना चाहिए
भारत में सभी कागजी नोट रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए जाते हैं, किंतु एक रुपये का नोट तथा सभी सिक्के भारत सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं। इन्हें Indian Coinage Act अधीन जारी किया जाता
किंतु समस्त करेंसी (नोट और सिक्कों सहित) को केवल RBI ही जारी ( Issue) करता है।
भारत की करेंसी अपरिवर्तनीय ( Inconvertible) है अर्थात् जारी करने वाला प्राधिकरण इसे सोने या चाँदी में परिवर्तित नहीं करेगा।
- मुद्रा की पूर्ति(Supply of Money)
मुद्रा की पूर्ति की धारणा (The Concept of Money Supply)
मुद्रा की पूर्ति एक स्टॉक धारणा (Stock Concept) है। इससे अभिप्राय किसी एक समय बिंदु पर देश में लोगों के पास कुल मुद्रा (सभी प्रकार की) के स्टॉक से है।
एक सचेतक टिप्पणी (A Note of Caution)
मुद्रा के उत्पादक कौन होते हैं? मुद्रा के उत्पादकों से अभिप्राय मुद्रा की पूर्ति करने वालों से है। भारत में मुद्रा की पूर्ति करने वाले हैं:
(i) देश की सरकार
(ii) देश की बैंकिंग प्रणाली- जिसमें केंद्रीय बैंक तथा व्यापारिक बैंक सम्मिलित हैं।
मुद्रा की पूर्ति में न तो (i) सरकार के पास मुद्रा के स्टॉक और न ही (ii) देश में समस्त बैंकों के पास मुद्रा के स्टॉक को सम्मिलित किया जाता है। देश की सरकार तथा समस्त बैंकिंग व्यवस्था वास्तव में मुद्रा की आपूर्ति करने वाले होते हैं। अतः इनके पास पड़ी मुद्रा को लोगों के मुद्रा के स्टॉक का एक भाग नहीं माना जाता | मुद्रा की पूर्ति में मुद्रा के केवल उस स्टॉक को सम्मिलित किया जाता है जो लोगों के पास होता है न कि जो मुद्रा की आपूर्ति करने वालों के पास होती है। दूसरे शब्दों में, मुद्रा की पूर्ति का अर्थ जनता के पास मुद्रा का स्टॉक है या जो मुद्रा की माँग करते हैं।
सावधि जमाओं तथा माँग जमाओं में अंतर
– सावधि जमाएँ (Fixed Deposits) सदा समय की एक निश्चित अवधि के लिए होती हैं जैसे एक वर्ष के लिए निश्चित अवधि जमा।
– माँग जमाएँ (Demand Deposits) समय की एक निश्चित अवधि के लिए नहीं होती।
– निश्चित अवधि जमाओं में से जमाकर्ता जब चाहें मुद्रा निकलवा नहीं सकते हैं जबकि माँग जमाओं में से वे जब चाहें मुद्रा निकलवा सकते हैं। – सावधि जमाएँ चेक द्वारा निकाली जाने वाली जमाएँ नहीं हैं। आप इन जमाओं को चेक द्वारा नहीं निकलवा सकते; जबकि माँग जमाओं को चेक द्वारा निकलवाया जा सकता है।
केवल शुद्ध माँग जमाएँ मुद्रा की पूर्ति में सम्मिलित की जाती हैं
(Only Net Demand Deposits are included in Money Supply)
वाणिज्य बैंकों की कुल (Gross ) माँग जमाओं तथा शुद्ध (Net) माँग जमाओं में अंतर होता है। कुल माँग जमाओं में अंतर- बैंकिंग दावे: एक बैंक का दूसरे बैंक पर दावा, सम्मिलित होते हैं। शुद्ध-माँग जमाओं में कोई अंतर – बैंकिंग दावें नहीं होते । अंतर- बैंकिंग (Inter- Banking) दावे लोगों की माँग जमाओं का भाग नहीं होते। अतः केवल शुद्ध माँग जमाओं को ही मुद्रा की पूर्ति का एक भाग माना जाता है।
7.1 मुद्रा की पूर्ति के माप (Measurement of Money Supply)
भारत में मुद्रा पूर्ति के चार वैकल्पिक माप हैं; जैसे M1, M2, M3 और Ma |
M1 माप (M, Measurement)
M1 = जनता के पास करेंसी + माँग जमाएँ + रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाएँ
(C + DD + OD)
C = जनता के पास करेंसी (Currency with the Public) जिसमें सिक्के तथा कागजी नोट सम्मिलित होते हैं।
DD = जनता की माँग जमाएँ (Demand Deposits) जो व्यापारिक बैंकों में जमा होती है। इन जमाओं को माँगने पर चेकों द्वारा या तो निकलवाया जाता है या किसी को हस्तांतरित किया जाता है।
OD = अन्य जमाएँ (Other Deposits)। इसमें निम्नलिखित जमाएँ सम्मिलित होती हैं:-
(i) RBI के पास सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं जैसे IDBI की माँग जमाएँ।
(ii) विदेशी केंद्रीय बैंकों तथा विदेशी सरकारों की माँग जमाएँ ।
(iii) अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं; जैसे – IMF तथा विश्व बैंक (World Bank) की माँग जमाएँ ।
विशेषकर OD में निम्नलिखित को शामिल नहीं किया जाता :-
(i) देश की सरकार की RBI के पास जमाएँ ।
(ii) देश की बैंकिंग व्यवस्था की RBI के पास जमाएँ ।
M2 माप (M2 Measurement):-
M1 की तुलना में यह मुद्रा की पूर्ति की व्यापक धारणा है। M1 के सभी घटकों के अतिरिक्त इसमें डाकखानों में लोगों की बचतों को भी शामिल किया जाता
अतः
M2 = M1 + डाकखानों के बचत बैंक खातों में जमाएँ
M3 माप (M3 Measurement)
M1 की तुलना में यह भी मुद्रा की पूर्ति की व्यापक धारणा है। इसमें M1 के सभी घटकों के अतिरिक्त व्यापारिक बैंकों के पास लोगों की (निवल) सावधि जमाओं को शामिल किया जाता है। अतः
M3 = M1 + व्यापारिक बैंकों की निवल सावधि जमाएँ
देश के कुल मौद्रिक साधन
यदि देश की मुद्रा पूर्ति को M3 माप द्वारा मापा जाता है तो इन्हें ही देश के कुल मौद्रिक साधन (Aggregate Monetary Resources of the Country) कहा जाता है।
M4 माप (M4 Measurement)
यह मुद्रा पूर्ति की और भी अधिक व्यापक धारणा है- वास्तव में यह M3 से भी अधिक व्यापक है। M3 के सभी घटकों के अतिरिक्त इसमें डाकखानों की जमाओं (राष्ट्रीय बचत सर्टीफिकेट (NSC) के अतिरिक्त) को सम्मिलित किया जाता है। अत:
M4 = M3 + डाकखानों की कुल जमाएँ (NSC को छोड़कर)
मुद्रा पूर्ति की संकुचित तथा विस्तृत अवधारणाएँ:-
(Narrow Money and Broad Money Concepts of Money Supply)
संकुचित मुद्रा तथा विस्तृत मुद्रा में अंतर इस बात का है कि देश में कुल मुद्रा पूर्ति का अनुमान किस मापक द्वारा लगाया जाता है । यदि यह मापक M, अथवा M2 है तो इसे संकुचित मुद्रा पूर्ति की अवधारणा कहा जाता है। यदि यह मापक M3 अथवा M4 है तो यह विस्तृत मुद्रा पूर्ति की अवधारणा है।
‘मुद्रा’ तथा ‘उच्च शक्ति मुद्रा’ में अंतर (Difference between ‘Money’ and ‘High Powered Money’)
विस्तृत रूप से मुद्रा तथा उच्च शक्ति मुद्रा में अंतर यह है कि मुद्रा में करेंसी तथा माँग जमाएँ सम्मिलित होती है जबकि ‘उच्च शक्ति मुद्रा में करेंसी तथा बैंकों के नकद कोष शामिल होते हैं।
मुद्रा = R+D
यहाँ, R: जनता के पास करेंसी (नोट + सिक्के),D: माँग जमाएँ ।
उच्च शक्ति मुद्रा = R + C
यहाँ, R: जनता के पास करेंसी (नोट + सिक्के),C: बैंकों के नकद कोष ।
लोग मुद्रा की माँग क्यों करते हैं? (Why People Demand Money?)
अथवा
मुद्रा की माँग के तीन उद्देश्य (Three Motives of Demand for Money)
अनेक आधुनिक अर्थशास्त्र सिद्धांतों के जनक जे०एम० केन्ज ने अपनी पुस्तक “ The General Theory of Employment, Interest and Money” में मुद्रा की माँग का ‘तरलता अधिमान’ के रूप में वर्णन किया है। लोग मुद्रा को अपने पास इसलिए रखना चाहते हैं क्योंकि इसकी प्रकृति संपूर्ण तरल है। मुद्रा किसी वस्तु को खरीदने में प्रयोग होती है जबकि दूसरी परिसंपत्तियों द्वारा कुछ खरीदने के लिए पहले इसे मुद्रा में परिवर्तित करना पड़ेगा। मुद्रा की माँग अथवा तरलता अधिमान का अर्थ है लोगों की नकद अथवा चेक के रूप में माँग जमा को अपने पास रखने की इच्छा। केन्ज के अनुसार, लोगों द्वारा मुद्रा की माँग निम्नलिखित तीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती है :
(1) लेन-देन उद्देश्य (Transaction Motive):-
लोग अपने सामान्य लेन-देन (अर्थात क्रय-विक्रय) के लिए मुद्रा की माँग करते हैं। इसका कारण यह है कि आय तथा व्यय के बीच समय का अंतर (Time – lag) होता है। आय की प्राप्ति एक मास या पंद्रह दिन के बाद होती है जबकि व्यय व्यक्तियों/फर्मों/परिवारों द्वारा प्रतिदिन किया जाता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति (अथवा फर्म) आय का कुछ भाग क्रय-विक्रय के लिए नकदी के रूप में रखना पसंद करता है। इस उद्देश्य के लिए रखी गई नकदी की मात्रा तीन बातों पर निर्भर करती है : (i) आय का आकार (ii) आय कितने समय के बाद प्राप्त होती है तथा (iii) खर्च करने का ढंग । आय का आकार बड़ा होने, आय लंबे समय के बाद प्राप्त होने तथा नकदी के रूप में खर्च (Cash Payment) करने की अवस्था में लेन-देन ( क्रय-विक्रय) उद्देश्यों के लिए नकदी की माँग अधिक होगी। संक्षेप में, लेन-देन उद्देश्य के लिए नकदी की माँग आय का फलन है (अर्थात लेन-देन उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग आय के स्तर पर निर्भर करती है) । अतः
Lt=f(Y)
(यहाँ, Lt : लेन-देन (क्रय-विक्रय) उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग; Y : आय ।)
लेन-देन उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग एवं आय स्तर के बीच प्रत्यक्ष संबंध है, जबकि बाजार ब्याज दर में परिवर्तन लेन-देन उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग पर कोई प्रभाव नहीं डालता। इस प्रकार लेन-देन उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग आय स्तर का प्रत्यक्ष फलन है जबकि ब्याज दर का निरपेक्ष फलन है।
(2) सावधानी उद्देश्य (Precautionary Motive):-
भविष्य में आने वाली कई प्रकार की कठिनाइयाँ जैसे बेरोजगारी, बीमारी, दुर्घटना आदि का सामना करने के लिए लोग (व्यक्ति एवं
फर्म) वर्तमान में मुद्रा की माँग करते हैं। इस प्रकार की जाने वाली मुद्रा की माँग सावधानी उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग कहलाती है। इस प्रकार की मुद्रा की माँग भी आय स्तर का एक प्रत्यक्ष फलन होती है और इसका ब्याज दर से कोई संबंध नहीं होता है। सावधानी उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग आय स्तर का एक फलन है जिसका सांकेतिक रूप निम्न है:
Lp = f (Y)
( यहाँ, Lp = सावधानी उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग; Y = आय का स्तर ।)
सावधानी उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग एवं आय स्तर के बीच में प्रत्यक्ष आनुपातिक संबंध है। वास्तव में ऊँची आय एक व्यक्ति को अपनी आय का एक भाग सुरक्षित भविष्य के लिए रखने के लिए प्रेरित करती है एवं इसके विपरीत भी है। लेन-देन उद्देश्य की तरह सावधानी उद्देश्य के लिए भी मुद्रा की माँग ब्याज दर के साथ बेलोचदार होती है। अर्थात ब्याज दर में उतार-चढ़ाव सावधानी उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग पर कोई प्रभाव नहीं डालता।
( 3 ) सट्टा उद्देश्य या मुद्रा परिसंपत्ति माँग (Speculative Motive or Asset Demand for Money):-
यह अवधारणा संपूर्ण रूप से केन्ज द्वारा दी गई है, सट्टा उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग बॉण्ड् एवं दूसरे परिसंपत्ति बाजारों में, जहाँ ब्याज दर एवं कीमत परिवर्तित होते है, मुद्रा निवेश को दर्शाती है। परंपरावादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मुद्रा की माँग लेन-देन उद्देश्य या सावधानी उद्देश्य के लिए होती है। लेकिन केन्ज ने यह वकालत की है कि लेन-देन या सावधानी उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग आवश्यकता पूरी होने के बाद यदि लोगों के पास नकदी बच जाती है तो यह मुद्रा बॉण्ड खरीदने में प्रयोग होती है जिसका प्रतिफल निश्चित है। सट्टा के लिए मुद्रा की माँग व्याज दर का एक फलन है । जब लोगों को भविष्य में ब्याज की दर के बढ़ने की आशा होगी, तो वे वर्तमान में मुद्रा उधार नहीं देंगे बल्कि उसे नकद रूप में रखना अधिक पसंद करेंगे। अतः सट्टा उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग ब्याज दर के साथ विपरीत रूप से संबंधित है। केन्ज के अनुसार, “भविष्य के संबंध में, बाजार की तुलना में, अधिक जानकारी द्वारा लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य को सट्टा उद्देश्य कहा जाता है ।
” ( Speculative motive is the motive of earning profit from knowing better than the market what the future will bring forth.-Keynes)
उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग को ब्याज दर के एक फलन के रूप में निम्न रूप में लिखा जा सकता है:
Ls = f (Y)
(यहाँ, Ls = सट्टा उद्देश्य के लिए मुद्रा की माँग; r = ब्याज दर ।)
- मुद्रा की पूर्ति कौन करता है ? (Who Supplies Money?):-
आधुनिक युग में मुद्रा की पूर्ति सरकार, केंद्रीय बैंक तथा व्यापारिक बैंक करते हैं। भारत में सरकार का वित्त मंत्रालय एक रुपये के नोट जारी करता है तथा सिक्के ढालता है। भारत में मुद्रा जारी करने का कार्य मुख्य रूप से केंद्रीय बैंक करता है। भारत का केंद्रीय बैंक (रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया) न्यूनतम मुद्रा कोष प्रणाली (Minimum Reserve System) के आधार पर करेंसी जारी करता है। रिज़र्व बैंक को ₹200 करोड़ का सोना तथा विदेशी प्रतिभूतियाँ कोष में रखनी पड़ती हैं। इनमें से ₹115 करोड़ का सोना होना आवश्यक है। व्यापारिक बैंक माँग जमा (Demand Deposits) के आधार पर साख अथवा मुद्रा की पूर्ति का निर्माण करते हैं।
जब व्यापारिक बैंक लोगों को साख प्रदान करते हैं तो इससे मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि होती है। इसके विपरीत जब वे साख का संकुचन करते हैं तो मुद्रा की पूर्ति कम हो जाती है। रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति के अनुसार ही व्यापारिक बैंकों को मुद्रा की पूर्ति का विस्तार या संकुचन करना पड़ता है।
आप यह अवश्य जानें व्यापारिक बैंक करेंसी / मुद्रा (पत्र मुद्रा या सिक्के) जारी नहीं करते, परंतु वे मुद्रा की पूर्ति में अपना योगदान अवश्य देते हैं, कैसे ? यह साख निर्माण की प्रक्रिया द्वारा संभव होता है। अपनी नकद जमाओं की तुलना में बैंक कई गुना अधिक मुद्रा ऋणों के रूप में उधार दे देते हैं। सभी ऋण माँग जमाओं के रूप में प्रतिबिंबित होते हैं जो मुद्रा पूर्ति (M1) का एक भाग है। ये जमाएँ नकद जमाओं की तुलना में कहीं अधिक हो जाती है क्योंकि बैंक अपने अनुभव से जानते हैं कि एक निश्चित समय में कुल जमा का एक अल्प प्रतिशत ही निकाला जाता है और यह भुगतान बैंक अपने वर्तमान नकद जमाओं अथवा रोज की एकत्रित राशि में से कर देते हैं।
- 1 मुद्रा की आदर्श पूर्ति(Ideal Supply of Money):-
मुद्रा की पूर्ति का कुल व्यय पर प्रभाव पड़ता है। इसके फलस्वरूप व्यापारिक क्रियाएँ, उत्पादन तथा रोज़गार भी प्रभावित होते हैं। अतएव यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि देश में पूर्ण रोज़गार की स्थिति में बिना किसी साधन को खाली (Idle) रखे हुए जितना उत्पादन होता है उसे खरीदने के लिए कितनी मुद्रा की आवश्यकता होगी। मुद्रा की यह पूर्ति ही आदर्श पूर्ति कहलाएगी।
इस पूर्ति के फलस्वरूप देश की उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग करना संभव होता है। यदि मुद्रा की पूर्ति आदर्श पूर्ति से अधिक होगी तो पूर्ण रोजगार की स्थिति में कीमतें बढ़ने लगेंगी तथा मुद्रा-स्फीति (Inflation) की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इसके विपरीत, यदि मुद्रा की पूर्ति आदर्श पूर्ति से कम है तो कीमतें कम हो जाएँगी, मंदी (Depression) की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी तथा देश में बरोजगारी फैलेगी। अतएव मुद्रा की पूर्ति केवल इतनी होनी चाहिए जिससे देश में उत्पादित सभी वस्तुओं की बिक्री हो सके तथा मुद्रा-स्फीति य अवस्फीति की स्थिति उत्पन्न न हो। देश के केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति का एक मुख्य उद्देश्य मुद्रा की पूर्ति के उचित स्तर को बनाए रखना है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि मुद्रा की पूर्ति में किए जाने वाले परिवर्तन का कुल व्यय पर तभी प्रभाव पड़ेगा जब जनता मुद्रा को नकद रूप में अपने पास न रखकर उसे खर्च कर देती है। वास्तव में मुद्रा की पूर्ति में परिवर्तन होने के फलस्वरूप जनता के नकद कोषों (Liquidity) में परिवर्तन होता है।
जनता अपनी परिसंपत्ति को मौद्रिक (Monetary ), वित्तीय (Financial) तथा वास्तविक (Real) संपत्ति के रूप में रखती है। मुद्रा की पूर्ति में परिवर्तन होने पर जनता की मौद्रिक परिसंपत्ति में परिवर्तन हो जाता है। यदि जनता मौद्रिक परिसंपत्ति में परिवर्तन होने पर वास्तविक संपत्ति जैसे मकान या कार या टेलीविजन पर अधिक धन खर्च करना चाहती है तो व्यय में वृद्धि होगी तथा राष्ट्रीय आय बढ़ेगी। इसके विपरीत, यदि जनता अपनी मौद्रिक संपत्ति या नकदी को वित्तीय संपत्ति जैसे शेयर, प्रतिभूतियाँ आदि खरीदने पर खर्च करती है तो इनकी कीमत बढ़ेगी तथा व्याज की दर कम हो जाएगी। व्याज की दर कम होने पर निवेश में वृद्धि होगी तथा राष्ट्रीय आय बढ़ेगी। परंतु यदि मुद्रा की पूर्ति बढ़ने के फलस्वरूप जनता की मौद्रिक संपत्ति में जो वृद्धि होती है वह उसे नकदी (Liquidity) के रूप में ही रखना चाहती है तो कुल व्यय में तथा राष्ट्रीय आय में कोई परिवर्तन नहीं होगा । अतएव केवल मुद्रा की पूर्ति में होने वाले परिवर्तन से ही कीमत स्थिरता या रोज़गार के उद्देश्य को पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए जनता की मुद्रा के लिए माँग क अनुमान लगाना भी आवश्यक है । मुद्रा की पूर्ति तथा उसके व्यय का अनुमान मुद्रा की चलन गति (Velocity of Money) i लगाया जाता है। अतएव मुद्रा की आदर्श पूर्ति का अनुमान मुद्रा की माँग तथा मुद्रा की चलन गति पर निर्भर करता है। मुद्रा कं आदर्श पूर्ति वह है जिस पर मुद्रा की पूर्ति तथा चलन गति की गुना (MV) मुद्रा की माँग (PT) के बराबर हो जाती है।
सारांश विवरण (Summary Statements):-
वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System of Exchange): मुद्रा की अनुपस्थिति में, वस्तुओं का आदान-प्रदान वस्तुओं से किया जाता था। इसे वस्तु विनिमय प्रणाली कहते हैं। जिस अर्थव्यवस्था में वस्तु विनिमय प्रणाली पायी जाती है उसे ‘वस्तु-वस्तु अर्थव्यवस्था’ (C-C Economy) कहा जाता है।
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ (Difficulties of Barter System): वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयाँ इस प्रकार हैं
(i) इसके लिए दोहरे संयोग की जरूरत होती है जो बहत कठिन है।
- मुद्रा के किन्हीं दो कार्यों की व्याख्या करें। (BSEH 2012)
उत्तर : (i) मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करती है। विनिमय के माध्यम से अभिप्राय है कि मुद्रा के रूप में एक व्यक्ति अपनी वस्तुओं को बेचता है तथा दूसरी वस्तुओं को खरीदता है ।
(ii) मुद्रा का दूसरा कार्य वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य को मापना है। मुद्रा लेखे की इकाई के रूप में मूल्य का माप करती है।
- नोट जारी करने की न्यूनतम कोष प्रणाली की व्याख्या करें।(BSEH 2012 )
उत्तर: भारत में भारतीय रिजर्व बैंक न्यूनतम मुद्रा कोष प्रणाली के आधार पर मुद्रा जारी करती है। रिजर्व बैंक को 200 करोड़ का
सोना तथा विदेशी प्रतिभूतियाँ कोष में रखनी पड़ती हैं। इनमें से 115 करोड़ का सोना होना आवश्यक है। 32. असीमित विधिग्राह्य मुद्रा क्या होती है ? (BSEH 2013)
उत्तर : असीमित विधिग्राह्य मुद्रा वह मुद्रा होती है जो किसी भी सीमा तक एक ही समय में किसी भुगतान के लिए कानूनन स्वीकार की जाती है। कोई भी व्यक्ति असीमित मात्रा में इस प्रकार की मुद्रा को लेने से इंकार नहीं कर सकता । उदाहरण के लिए भारत में 50 पैसे तथा ₹1 के सिक्के तथा सभी प्रकार के कागजी नोट असीमित विधिग्राह्य मुद्रा हैं।
- अपरिवर्तनशील पत्र – मुद्रा से क्या अभिप्राय है? (BSEH 2013)
उत्तर:-
अपरिवर्तनशील पत्र मुद्रा उस पत्र मुद्रा को कहते है जिससे बदले में सोना, चांदी अथवा कोई भी अन्य धातु देने का सरकार आश्वासन नहीं देती है। अन्य शब्दों में, नोटों को धातु या सिक्कों में बदलने की सरकार कोई गारंटी नहीं देती है। इस पत्र मुद्रा के पीछे किसी भी धातुओं के सुरक्षित कोष नहीं रखे जाते है । यह पत्र मुद्रा पूर्ण रुप से सरकार की साख पर प्रचलित रहती है।
III. लघु और दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Short and Long Answer Type Questions)
- मुद्रा के किन्हीं चार कार्यों की व्याख्या कीजिए ।(BSEH 2017)
अथवा
मुद्रा के प्राथमिक कार्य क्या हैं? इनमें से किसी एक का वर्णन करें। (BSEH 2007)
- वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों की व्याख्या कीजिए ।(BSEH 2017)
अथवा
वस्तु विनिमय प्रणाली के किन्हीं चार दोषों की संक्षिप्त व्याख्या करें। (BSEH 2014)
- मुद्रा पूर्ति में किसे सम्मिलित नहीं किया जाता ?
- पूर्ण- काय मुद्रा किस प्रकार साख मुद्रा से भिन्न है ?
- कानूनी मुद्रा किस प्रकार न्यास मुद्रा से भिन्न है ?
- एक अर्थव्यवस्था में आदर्श मुद्रा पूर्ति किसे कहते हैं ?
- माँग जमाएँ किस प्रकार सावधि जमाओं से भिन्न होती हैं ?
- मुद्रा स्टॉक के विभिन्न माप कौन से है ? (BSEH 2016)
- वस्तु विनिमय प्रणाली के दोषों की व्याख्या कीजिए । मुद्रा इन दोषों को दूर करने में किस प्रकार सहायक होती हैं ?
- निम्न की संक्षिप्त व्याख्या करें: (i) मुद्रा तथा निकट मुद्रा, (ii) उच्च शक्ति प्राप्त मुद्रा
- मुद्रा क्या है ? मुद्रा के गौण कार्यों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए ।(BSEH 2013)
- ‘मुद्रा’ की परिभाषा दें। इसके प्राथमिक कार्यों की संक्षिप्त व्याख्या करें।
अथवा
मुद्रा के प्राथमिक कार्यों का वर्णन करें। (BSEH 2011)
- ‘मुद्रा की पूर्ति’ की परिभाषा दीजिए। इसके कौन-से मुख्य निर्धारक तत्त्व होते हैं? (BSEH 2014, 2015)
- मुद्रा पूर्ति के अंगों की व्याख्या कीजिए ।(BSEH 2009) (BSEH 2011, 2014)
- निबंधात्मक प्रश्न(Essay Type Questions )
- वस्तु विनिमय प्रणाली की सीमाएं बताओ । मुद्रा के आगमन ने इन सीमाओं को कैसे दूर किया है? (BSEH 2006)
State the limitations of barter system of exchange. How are these limitations removed with
the introduction of money?
- RBI ने मुद्रा की पूर्ति का कैसे वर्गीकरण किया है ?
How does RBI classify the supply of money?
- भारत में मुद्रा की पूर्ति कौन करता है आदर्श मुद्रा पूर्ति की अवधारणा की व्याख्या करें ?
Who supplies money in India and explain the concept of ideal money supply?
- मुद्रा के प्राथमिक, सहायक एवं आकस्मिक कार्यों की व्याख्या करें।
Explain the primary, secondary and contingent functions of money.
- मुद्रा के मुख्य कार्य कौन-से हैं ?
What are the main functions of money?
अथवा
मुद्रा की परिभाषा दीजिए। इसके मुख्य कार्य क्या हैं?
Define money. What are its main functions?
- मुद्रा की परिभाषा दीजिए। इसके गौण कार्यों का वर्णन कीजिए।
Define money. What are its secondary functions?
- निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट कीजिए:
(i) करेंसी मुद्रा तथा बैंक मुद्रा, (ii) मुद्रा तथा निवल मुद्रा ।
Distinguish between the following:
(i) Currency money and bank money, (ii) Money and near money.
- “ मुद्रा उसे कहते हैं जो मुद्रा का कार्य करें।” व्याख्या करें।
“Money is what money does.” Explain.
- भारतीय मौद्रिक प्रणाली की व्याख्या कीजिए ।
Explain the Indian Monetary System.
- वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों की व्याख्या कीजिए । What are the difficulties of barter system?
अथवा
वस्तु विनिमय प्रणाली की कठिनाइयों की व्याख्या कीजिए ।
Explain difficulties of barter system of exchange.
- मुद्रा पूर्ति से क्या अभिप्राय है? मुद्रा पूर्ति की विभिन्न धारणओं की व्याख्या करें।
What is money supply? Explain its various concepts.
- ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ तथा ‘मौद्रिक प्रणाली’ में क्या अंतर है? मुद्रा के कोई चार कार्य लिखें।
Distinguish between ‘barter system of exchange’ and ‘monetary exchange’. Write any functions of money.