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अध्याय -7 बैंकिंग: वाणिज्यिक बैंक तथा केंद्रीय बैंक

(Banking: Commercial Banks and The Central Bank) 

■ वाणिज्यिक बैंक

■  वाणिज्यिक बैंकों के कार्य

■ केंद्रीय बैंक – अर्थ एवं कार्य

■ मौद्रिक नीति के उपाय- साख नियंत्रण के मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपाय

वाणिज्यिक बैंक किसे कहते है (Commercial Banks):-

वाणिज्यिक बैंक वह वित्तीय संस्था है जो लोगों के रुपये को अपने पास जमा के रूप में स्वीकार करती है और उनको उपभोग अथवा निवेश के लिये उधार देती है।

इसके अतिरिक्त आजकल बैंक और भी कई कार्य करते हैं जैसे साख निर्माण, रुपये को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हस्तांतरित करना, एजेंसी कार्य तथा सामान्य सेवाएँ ।

परिभाषा (Definition):-

  • भारतीय बैंकिंग कम्पनी एक्ट के अनुसार, “बैंकिंग कम्पनी वह है जो वैंकिंग का कार्य करती है। वैकिंग से अभिप्राय उधार देना अथवा निवेश के उद्देश्य से जमा रूप में जनता से मुद्रा स्वीकार करना और इनका भुगतान माँगने पर चेक, ड्राफ्ट, आदेश या अन्य किसी प्रकार के भुगतान करना है।”

Banking company is one which transacts the business of banking which means the accepting for the purpose of lending or investment of deposits of money from the public repayable on demand or otherwise and withdrawable by cheque, draft, order or otherwise. — Indian Banking Companies Act.) 

एक आवश्यक वात (An Important Note ):-

एक वित्तीय संस्था को बैंकिंग संस्था नहीं कहा जाएगा यदि इसके द्वारा दो प्राथमिक कार्य नहीं किये जाते:-

(i) चेक द्वारा निकाली जाने वाली जमाओं को स्वीकार करना

(ii) उधार देना ।

इस प्रकार,

* LIC एक वित्तीय संस्था है, किंतु इसे बैंक नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह उधार तो देती है किंतु लोगों की चेक द्वारा निकाली जाने वाली जमाओं को स्वीकार नहीं करती।

* डाकखाने भी बैंक नहीं हैं यद्यपि वे लोगों से जमा स्वीकार करते हैं लेकिन वे ऋण नहीं देते।

इसलिए इन्हें गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्था (Non-Banking Financial Institution) कहा जाता है।

वाणिज्यिक बैंकों के कार्यों कि व्याख्या कीजिए (Functions of Commercial Banks) 

वाणिज्यिक बैंकों के कार्यों को तीन भागों में बांटा जाता है:-

 (1) मुख्य कार्य (Primary Functions),

(2) गौण कार्य, (Secondary Functions),

(3) सामाजिक कार्य (Social Functions)। 

2.1 मुख्य कार्य (Primary Functions) 

बैंकों के दो मुख्य कार्य हैं–

(1) जमा स्वीकार करना

(2) ऋण देना।

(1) जमा स्वीकार करना (Accepting Deposits) 

एक बैंक जनता के धन को जमा करता है। लोग अपनी सुविधा और शक्ति के अनुसार निम्नलिखित खातों में रुपया जमा कर सकते हैं:-

(i) निश्चितकालीन या सावधि जमा खाता (Fixed or Time Deposit Account):-

इस खाते में एक निश्चित अवधि के लिए रुपया जमा किया जाता है। जमाकर्ता को जमा की रक़म की रसीद (Fixed Deposit Receipts) दे दी जाती है। इसमें जमाकर्ता का नाम, जमा की राशि, ब्याज की दर तथा जमा की अवधि लिखी होती है। यह रसीद हस्तांतरणीय (Transferable) नहीं होती। यदि जमाकर्ता को अपनी रकम की आवश्यकता, अवधि पूर्ण होने से पहले पड़ जाती है तो कुछ कटौती या व्याज (Discount or Interest ) काट कर बैंक उसे रकम लौटा देता है। इस खाते में जमा पर बैंक अधिक ब्याज देता है। जमा की अवधि जितनी लम्बी होती है ब्याज की दर भी उतनी अधिक होती है। इसका कारण यह हैं कि बैंक इस रकम का लम्बे समय तक प्रयोग कर सकते हैं। इस खाते में जमा रकम को बैंक की सावधि देनदारी (Time Liability) कहा जाता है।

(ii) चालू जमा खाता (Current or Demand Deposit Account):-

इस खाते में जमाकर्ता जितनी बार चाहे रुपया जमा कर सकता है और कभी भी आवश्यकतानुसार निकाल सकता है। इस खाते में साधारणतया व्यापारी वर्ग रुपया जमा करवाता है। साधारणतः बैंक इस प्रकार की जमा पर ब्याज नहीं देता। यदि जमा की रकम एक न्यूनतम आवश्यक राशि से कम होती है तो जमाकर्ता से बैंक कुछ सेवा व्यय (Service Charge) वसूल कर सकता है। इस खाते से रुपया प्रायः चेक बुक द्वारा निकलवाया जाता है। इस खाते में जमा राशि को बैंक की माँग देनदारी (Demand Liability) कहा जाता है। अमेरिका में इस खाते को चेक खाता (Checking Account) कहा जाता है।

(iii) वचत जमा खाता (Saving Deposit Account):-

यह खाता छोटी-छोटी बचतों को प्रोत्साहन देने के लिए होता है। इस खाते से एक निश्चित मात्रा तक ही रुपया निकलवाया जा सकता है। निश्चित मात्रा से अधिक रुपया निकलवाने के लिए बैंक को पहले सूचित करना पड़ता है। इस खाते पर बैंक ब्याज भी देता है जो कि निश्चितकालीन जमा खाते की तुलना में कम होता है।

(iv) होम सेफ वचत खाता ( Home Safe Saving Account ):-

बैंकों ने इस खाते का प्रचलन अभी हाल में किया है। इसमें जमाकर्ता के घर पर बैंक एक गुल्लक (Small Safe) प्रदान करता है जिसकी चाबी बैंक के पास रहती है। जमाकर्ता इस गुल्लक में थोड़ी-थोड़ी बचत डालता रहता है तथा कुछ समय के बाद बैंक में जाकर उसमें जमा राशि को जमाकर्ता अपने खाते में जमा करा देता है। बहुत सारे बैंक इस प्रकार बचाई गई रकम को जमाकर्ता के घर से अपने एजेन्ट भेज कर मंगवा लेते हैं तथा गुल्लक की राशि को जमाकर्ता के खाते में जमा कर लेते हैं। इस प्रकार के खाते पर बचत जमा खाते की तुलना में कम ब्याज दिया जाता है।

(v) आवर्ती जमा खाता (Recurring Deposit Account):-

इस प्रकार के खाते में जमाकर्ता एक निश्चित समय जैसे भी 12, 24, 36, या 60 महीनों के लिए प्रतिमास निश्चित रकम जमा करते हैं। यह रकम कुछ विशेष परिस्थितियों के अलावा साधारणतया निर्धारित समय से पहले नहीं निकाली जा सकती। जमाकर्ता की जमाराशि पर मिलने वाली ब्याज खाते में जमा होती जाती है। इस खाते में सावधि खाते की तरह ही अन्य सभी खातों की तुलना में अधिक ब्याज प्राप्त होता है।

* चेक जमाएँ और गैर-चेक जमाएँ व्यापारिक बैंकों में सभी जमाओं को चेक जमाओं (Chequeable Deposits) तथा गैर-चेक जमाओं (Non-Chequeable Deposits) में वर्गीकृत किया ता है।

चेक वाली जमाएं वे जमाएं हैं जिनके बदले में किसी भी समय चेक लिखा / जारी किया जा सकता है। (और इस प्रकार मुद्रा को निकलवाया जा सकता है।)

गैर-चेक वाली जमाएं वे हैं जिनके बदले में किसी भी समय चेक नहीं लिखा जा सकता। (और यह मुद्रा निकलवाई भी नहीं जा सकती।) इन जमाओं को बैंकों के पास एक निश्चित समय अवधि तक के लिए सुरक्षित कोष के रूप में रखा जाता है। इसलिए इन जमाओं को निश्चित सावधि जमाएं (Fixed Deposits) भी कहा जाता है।

(2) ऋण देना (Advancing of Loans ):-

बैंक का दूसरा मुख्य कार्य लोगों को रुपया उधार देना है। बैंक के पास जो रुपया जमा के रूप में है उसमें से एक निश्चित राशि नकद कोष में रखकर बाकी रुपया बैंक द्वारा उधार दे दिया जाता है। ये बैंक प्रायः उत्पादक कार्यों के लिए ऋण देते हैं तथा उचित जमानत (Security) की माँग करते हैं। ऋण की रकम प्रायः जमानत के मूल्य से कम होती है। बैंक निम्नलिखित प्रकार के ऋण प्रदान करते हैं:

(i) नकद साख (Cash Credit):-

इसके अंतर्गत ऋणी को एक निश्चित जमानत के आधार पर एक निश्चित राशि निकलवाने का अधिकार दे दिया जाता है। इस सीमा के अन्दर ही ऋणी आवश्यकतानुसार रुपया निकलवाता रहता है तथा जमा भी करता रहता है। इस अवस्था में बैंक केवल वास्तव में निकलवाई गई राशि पर ही ब्याज लेता है । इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऋणी द्वारा निकलवाई जाने वाली ऋण की रकम का बैंक द्वारा निर्धारण ऋणी के स्टॉक विवरण तथा उसकी उत्पादन क्रिया की मात्रा के आधार पर किया जाता है।

(ii) ओवर ड्राफ्ट (Overdraft):-

बैंक में चालू जमा रखने वाले ग्राहक बैंक से एक समझौते के अनुसार अपनी जमा से अधिक रकम निकलवाने की अनुमति ले लेते हैं । निकाली गई रकम को ओवर ड्राफ्ट कहते हैं। यह सुविधा अल्पकाल के लिए विश्वसनीय ग्राहकों को ही मिलती है। मान लीजिए एक व्यक्ति के ₹10,000 जमा हैं और उसको बैंक ₹12,000 तक के चेक काटने का अधिकार दे देता है तो ₹2,000 ओवर ड्राफ्ट कहलाएगा।

(iii) माँग ऋण (Demand Loans):-

ये ऋण एक निश्चित रकम के रूप में दिए जाते हैं। इन्हें वापिस करने की कोई निश्चित परिपक्वता अवधि नहीं होती। इन ऋणों पर ऋण की स्वीकृति के तुरंत बाद ही ब्याज लगना आरंभ हो जाता है, चाहे ऋणी चेक द्वारा उस खाते में से कुल ऋण का केवल एक भाग निकाले। ये ऋण व्यक्तिगत जमानत पर या वित्तीय परिसंपत्ति या टिकाऊ वस्तुओं की जमानत पर दिए जाते हैं।

(iv) अल्प अवधि ऋण ( Short-term Loans ):-

अल्पकालीन ऋणों में सामान्यत: (i) व्यक्तिगत ऋण तथा (ii) कार्यकारी पूंजी ऋण सम्मिलित किए जाते हैं। इस प्रकार के ऋणों की सारी राशि पर ब्याज लगना उसी दिन से आरंभ हो जाता है जिस दिन से ये ऋणी व्यक्ति के खाते में लिखा जाता है। सामान्यतः इस प्रकार के ऋण जमानत पर दिये जाते हैं। अतः ये सुरक्षित ऋण होते हैं।

साख निर्माण (Credit Creation):-

आजकल बैंकों का एक मुख्य कार्य साख का निर्माण करना है। बैंक अपनी प्रारंभिक जमा से अधिक रुपया लोगों को उधार देकर साख का निर्माण करते हैं।

बैंक साख का सृजन कैसे करते हैं अथवा देश में मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि कैसे करते हैं। 

ऋण राशि कभी भी नकद नहीं दी जाती। सभी ऋणों को बैंकों की जमाओं में जोड़ दिया जाता है। चूँकि सभी जमाओं को 100 प्रतिशत निकाला नहीं जाता, कुल माँग जमाओं का केवल थोड़ा प्रतिशत ही बैंक नकद कोष के रूप में रखते हैं। इस प्रकार बैंकों द्वारा अपने नकद कोषों की तुलना में ऋण कहीं अधिक दे दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया ही है जिसके द्वारा बैंक साख का सृजन करते हैं अथवा देश में मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि करते हैं।

2.2 गौण कार्य(Secondary Functions):-

बैंक उपरोक्त प्राथमिक कार्यों के अतिरिक्त कई गौण कार्य भी करते हैं। जैसे-

(1) एजेंट के रूप में कार्य

(2) सामान्य उपयोगिता की सेवाएँ।

(1) एजेंट के रूप में कार्य (Agency Functions) 

बैंक अपने ग्राहकों के लिए विभिन्न तरीकों से एजेंट के कार्य करता है:

(i) विभिन्न मदों का एकत्रीकरण और भुगतान (Collection and Payment of Various Items):–

बैंक अपने ग्राहकों की ओर से चेक, किराया, ब्याज इत्यादि एकत्र करता है और इसी प्रकार उनकी ओर से करों, बीमों की किस्तों इत्यादि की अदायगी करता है।

(ii) प्रतिभूतियों की खरीद तथा विक्री (Purchase and Sale of Securities):–

बैंक अपने ग्राहकों के लिए विभिन्न प्रकार के शेयर्स तथा स्टॉक की जानकारी प्राप्त करके उनकी ओर से प्रतिभूतियों को खरीदने, बेचने तथा उनको सुरक्षित रखने का कार्य भी करता है।

(iii) ट्रस्टी तथा प्रबंधक (Trustee and Executor ):–

बैंक अपने ग्राहकों के आदेश पर उनकी संपत्ति के ट्रस्टी तथा प्रबंधक का कार्य भी करते हैं ।

(iv) रुपया भेजना (Remitting of Money):–

एक स्थान से दूसरे स्थान पर रुपया भेजना भी बैंकों का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। यह काम बैंक ड्राफ्ट द्वारा किया जाता है।

(v) विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय (Purchase and Sale of Foreign Exchange):–

बैंक विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देते हैं। अधिकतर यह कार्य विदेशी विनिमय बैंकों द्वारा किया जाता है।

(vi) संदर्भ पत्र (Letter of References):–

बैंक अपने ग्राहकों की आर्थिक स्थिति की सूचना देश – विदेश के व्यापारियों को देते हैं तथा देश-विदेश के व्यापारियों की आर्थिक स्थिति की सूचना अपने ग्राहकों को देते हैं।

(vii) नये शेयरों के अविक्रित अंशों के खरीदने का आश्वासन (Underwriting):–

बिना बिके हुए नये शेयरों को खरीदने का बैंक आश्वासन देते हैं। बैंक निजी आधार पर चुने हुए निवेशकों के बीच प्रतिभूतियों की बिक्री की व्यवस्था भी करते हैं।

(2) सामान्य उपयोति की सेवाएँ (General Utility Services):-

व्यापारिक बैंक कुछ इस प्रकार के अन्य कार्य भी करते हैं जिनसे समाज के लोगों को काफी लाभ होता है। ये कार्य निम्नलिखित हैं:-

 (i) लॉकर की सुविधा (Locker Facilities):–

बैंक अपने ग्राहकों को लॉकर की सुविधा भी प्रदान करता है, जिनमें लोग अपने सोने-चांदी के जेवर तथा अन्य आवश्यक कागजात सुरक्षित रख सकते हैं। इसका वार्षिक किराया बहुत कम होता है।

(ii) यात्री चेक तथा साख प्रमाण पत्र ( Traveller’s Cheques and Letters of Credit):–

बैंक अपने ग्राहकों को यात्रा पर जाते समय नकद राशि साथ न ले जाकर सुविधा और सुरक्षा की दृष्टि से यात्री चेक तथा साख प्रमाण पत्रों की सुविधा प्रदान करता है। इसके फलस्वरूप यात्री निश्चिन्त होकर यात्रा कर सकते हैं।

(iii) वाणिज्यिक सूचनाएँ एवं आँकड़े (Business Information and Statistics):–

बैंक आर्थिक स्थिति से परिचित होने के कारण व्यापार संबंधी सूचनाएं एवं आँकड़े एकत्रित करके अपने ग्राहकों को वित्तीय मामलों पर सलाह देते हैं।

(iv) वस्तुओं के वाहन में सहायता (Help in Transportation of Goods ):–

बड़े-बड़े व्यापारी अपने ग्राहकों को माल भेजकर उसकी बिल्टी बैंक में भेज देते हैं। खरीददार बैंक में रुपये जमा करवाकर उस बिल्टी को छुड़वा लेते हैं और रेलवे स्टेशन तथा ट्रांसपोर्टर से माल ले लेते हैं। इस प्रकार बैंक वस्तुओं को उत्पादन केंद्रों से उपभोग केंद्रों तक पहुँचाने में सहायता देते हैं।

सामाजिक कार्य या बैंकों का आर्थिक विकास में योगदान 

(Social Functions or Role of Banks in Economic Development) 

आधुनिक समय में व्यापारिक बैंक देश के आर्थिक विकास तथा सामाजिक कल्याण के लिए निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य भी करते हैं:

(1) पूँजी निर्माण (Capital Formation):–

व्यापारिक बैंक लोगों की निष्क्रिय जमा (Idle Saving) को एकत्रित करते हैं तथा उन्हें उत्पादक कार्यों में निवेश करते हैं। इसके फलस्वरूप वे पूँजी निर्माण की दर को बढ़ाने में सहायता देते हैं । पूँजी निर्माण के फलस्वरूप आर्थिक विकास की दर तीव्र होती है।

बैंक निवेश के महत्त्वपूर्ण एजेंट हैं बचतकर्ताओं तथा निवेशकर्ताओं के बीच बैंक एक कड़ी का कार्य करते हैं। जमाकर्ता अपनी बचतों या कोषों को बैंकों में जमा करवाते हैं और निवेशकर्ता बैंकों से इन कोषों को उधार के रूप में लेते हैं। यदि बैंकिंग प्रणाली न होती तो बचतों की अधिकांश मात्रा निवेशकर्ताओं तक पहुँच न पातीं। अतएव बैंक निवेश के महत्वपूर्ण एजेंटों के रूप में कार्य करते हैं।

(2) नव प्रवर्तन को प्रोत्साहन (Inducement to Innovations):–

बैंक उद्यमियों को साख प्रदान करके नव प्रवर्तन को प्रोत्साहित करते हैं। इसके फलस्वरूप नई वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि होती है। इसका आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

(3) निवेश – सहायक व्याज दर ढांचा (Investment-friendly Interest-rate Structure):–

बैंक ब्याज की दर को इस प्रकार निर्धारित करते हैं कि जिससे उद्यमियों एवं व्यवसायियों को निवेश करने के लिये प्रोत्साहन मिलता है। इसके फलस्वरूप उत्पादन तथा व्यापार में वृद्धि होती है। इसका आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

( 4 ) ग्रामीण क्षेत्र के विकास में योगदान (Contribution in the Development of Rural Sector ):– व्यापारिक बैंक, ग्रामीण क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं । वे किसानों को उन्नत कृषि, भूमि सुधार, यंत्र आदि खरीदने के लिये रियायती ब्याज की दर (Concessional Rate of Interest) पर उचित मात्रा में ऋण देते हैं। इसके फलस्वरूप किसान कृषि उत्पादन बढ़ाने में सफल होते हैं। बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी शाखाएँ खोलकर वहाँ से निष्क्रिय बचत एकत्रित करते हैं तथा उसका उत्पादक कार्यों में प्रयोग करते हैं। बैंकों के इस कार्य का देश के आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

(5) बाजार माँग में वृद्धि (Increasing Market Demand):–

अल्पविकसित देशों में लोगों की आय कम होती है। उनका जीवन स्तर नीचा होता है। वे उपभोक्ता वस्तुओं की माँग कम करते हैं। बैंक अपने ग्राहकों को टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ जैसे: टी० वी०, फ्रिज आदि खरीदने के लिये साख (Consumer Credit) उपलब्ध कराते हैं। इसके फलस्वरूप टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की माँग बढ़ती है। उनके उत्पादन में वृद्धि होती है नये उद्योग स्थापित किये जाते हैं। परिणामस्वरूप रोज़गार, आय एवं जीवन स्तर में वृद्धि होती है। अतएव बैंक, उपभोक्ता साख उपलब्ध कराकर माँग वृद्धि में सहायक होते हैं जिसके फलस्वरूप लोगों के जीवन स्तर में वृद्धि होती है तथा आर्थिक विकास की गति तीव्र होती है।

(6) मौद्रिक नीति लागू करना (Implementation of Monetary Policy):–

प्रत्येक अल्पविकसित देश की सरकार एवं केंद्रीय बैंक को अपनी मौद्रिक नीति प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करने के लिये एक व्यवस्थित बैकिंग प्रणाली की आवश्यकता होती है। देश की मौद्रिक नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने में व्यापारिक बैंकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है । वे केंद्रीय बैंक के निर्देश के अनुसार साख का विस्तार एवं संकुचन करते हैं। इसके फलस्वरूप मौद्रिक नीति प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करके आर्थिक विकास के लक्ष्य को बिना अर्थव्यवस्था पर स्फीतिक या अवस्फीतिक अंतराल के प्रभाव के प्राप्त करना संभव हो जाता है।

(7) रोज़गार के अवसर (Employment Opportunities):–

बेरोज़गार युवा वर्ग व्यापारिक बैंकों से उचित ब्याज की दर पर पर्याप्त मात्रा में साख प्राप्त करके स्वरोज़गार ( Self-employment ) की व्यवस्था कर सकते हैं। स्वरोज़गार के अवसर बढ़ाने के फलस्वरूप रोज़गार तथा उत्पादन दोनों में वृद्धि होती है। इसका देश के आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

संक्षेप में, बैंक केवल रुपया जमा करने तथा उधार देने की संस्था मात्र नहीं रह गई है वल्कि यह आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण का एक महत्वपूर्ण साधन वन गई है।

क्रेडिट कार्ड उपभोक्ता मांग को बढ़ाते हैं 

बैंकों द्वारा जारी किए गए क्रेडिट कार्ड उपभोक्ता व्यय को बढ़ाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में कुल माँग के स्तर में वृद्धि होती है। इससे निवेश, संवृद्धि तथा विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

वाणिज्यिक बैंकों का वर्गीकरण (Classification of Commercial Banks) 

भारत में वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks in India) 

अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (Scheduled Commercial Banks)

गैर-अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (Non-Scheduled Commercial Banks)

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (Public Sector Banks) 

उदाहरण: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) तथा अन्य राष्ट्रीयकृत बैंक जैसे- बैंक ऑफ इंडिया और केनरा बैंक

निजी क्षेत्र के बैंक (Private Sector Banks) उदाहरण: एच० डी०एफ० सी० बैंक (HDFC Bank)

विदेशी बैंक (Foreign Banks) उदाहरण : सिटी बैंक (CITI Bank)

(A अनुसूचित बैंक गैर-अनुसूचित बैंकों की तुलना में सापेक्षतया बड़े बैंक होते हैं।

(B) अनुसूचित बैंकों को RBI की द्वितीय सूची में शामिल किया जाता है, जबकि गैर-अनुसूचित बैंकों को नहीं ।

वाणिज्यिक बैंकों द्वारा साख का निर्माण (Credit Creation by the Commercial Banks) 

वाणिज्यिक बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। वे साख सृजन करके मुद्रा पूर्ति में योगदान देते हैं। वाणिज्यिक बैंक माँग जमा के रूप में साख सृजन करते हैं। वाणिज्यिक बैंकों की माँग जमाएँ उनके नकद कोषों (Cash Reserves) से कई गुना अधिक होती हैं।

यदि यह मान लें कि उनके नकद कोषों की राशि ₹ 1,000 है तथा माँग जमा ₹10,000 है। तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति वाणिज्यिक बैंकों के नकद कोषों से दस गुना अधिक हो जाएगी। इस प्रकार नकद कोष ₹ 1,000 के आधार पर वाणिज्यिक बैंकों ने मुद्रा की पूर्ति में ₹10,000 का योगदान किया। यहाँ मूल प्रश्न यह है कि बैंकों के पास जो ₹ 1.006 नकद कोष होता है वह कैसे ₹ 10,000 मूल्य की माँग जमा के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यह कैसे होता है इसका संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित है:-

(i) बैंकों को अपने ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर यह ज्ञात होता है कि सभी जमाकर्ता, एक ही समय, अपनी जमा राशि को निकलवाने के लिए नहीं आएँगे।

(ii) यदि बैंक का अनुभव यह कहता है कि, सामान्यतः जमाकर्ता अपनी जमा राशियों का लगभग 10 प्रतिशत ही निकलवाते हैं। तो बैंक को उनकी माँग पूरी करने के लिए कुल जमा का केवल 10 प्रतिशत ही अपने पास नकद कोष के रूप में रखना होगा। इसे नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR) कहते हैं।

(ii) यदि CRR = 10 प्रतिशत, तब ₹ 1,000 के कुल नकद कोषों के आधार पर बैंक ₹ 10,000 मूल्य के ऋण निम्नलिखित सूत्र के अनुसार दे सकता है:

माँग जमाएँ  = 1/CRR × नकद कोष (Cash Deposits) 

1/10% × 1,000 = 10 × 1,000 = 10,000 

यहाँ नोट करना महत्वपूर्ण है कि ऋण राशि कभी भी नकदी के रूप में नहीं दी जाती। इस राशि को बैंक उधार लेने वालों खाते में माँग जमा के रूप में प्रदर्शित करते हैं। इसके अनुसार जब ₹10,000 का ऋण दिया जाता है तब बैंकों की माँग जमाएँ ₹ 10,000 बढ़ जाती हैं।

उपरोक्त समीकरण में माँग जमाएँ वास्तव में ऋण को सूचित करती हैं।

(iv) अतः हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि CRR = 10% की मान्यता के अनुसार, यदि बैंकों के नकद कोष में ₹ 1,000 की वृद्धि होती है. तो अर्थव्यवस्था में साख की पूर्ति (अथवा मुद्रा की पूर्ति) ₹10,000 (= 100 × 10) होगी।

हम पहले पढ़ चुके हैं कि बैंकों का नकद कोष मुद्रा पूर्ति का एक भाग नहीं है (इसका सरल कारण यह है कि मुद्रा पूर्ति करने वाले अधिकारियों के पास रहने वाली नकद मुद्रा पूर्ति का एक भाग नहीं है)।

माँग जमाएँ मुद्रा पूर्ति का एक भाग है (इसका सरल कारण यह है कि ये जमाएँ चैक द्वारा निकाली जा सकती हैं तथा इन जमाओं के धारक चैक जारी करके इन जमाओं का उपयोग कर सकते हैं) ।

साख गुणक (Credit Multiplier):-

उपरोक्त उदाहरण में जब बैंकों के पास नकद कोष ₹ 1,000 था यह माँग जमा के रूप में ₹10,000 मूल्य के साख सृजन करता है। इस प्रकार

साख गुणक = माँग जमाएँ /नकद कोष = 10,000 /1,000 = 10 

अथवा 

साख गुणक = 1/ CRR  =1/ 10% = 10 

 यहाँ, CRR = नकद आरक्षित अनुपात 

उदाहरण (Illustration):-

साख सृजन की प्रक्रिया का वर्णन एक उदाहरण द्वारा किया जा सकता है। सरलता के लिए हम मान लेते हैं कि (i) अर्थव्यवस्था में एकल बैंकिंग प्रणाली ( Single Banking System) पाई जाती है, अर्थात अर्थव्यवस्था में केवल एक ही बैंक कार्यरत है।

(ii) नकद आरक्षित अनुपात (CRR) 10 प्रतिशत है और इसमें परिवर्तन नही होता। हम देखते हैं कि इस बैंकिंग प्रणाली में क्या होता है

प्राथमिक तथा गौण जमाएँ किसे कहते हैं ? (Primary and Secondary Deposits) 

प्राथमिक जमाएँ (Primary Deposits) लोगों द्वारा वाणिज्यिक बैंकों में कराई गई नकद जमा । इन्हें बैंकों के खातों में ‘माँग जमाओं’ के एक भाग के रूप में दर्शाया जाता है।

गौण जमाएँ (Secondary Deposits) उन जमाओं को कहते हैं जिनकी उत्पत्ति तब होती है जब बैंकों द्वारा लोगों को ऋण एक भाग के रूप में दिखाया जाता है। दिया जाता है। इन्हें भी बैंकों के खाते में ‘माँग जमाओं’  के एक भाग के रूप में दिखाया जाता है

संक्षेप में, जबकि प्राथमिक जमाएँ बैंकों के पास जमाकर्ताओं की बचतें होती हैं; गौण जमाएँ बैंकों से जमाकर्ताओं द्वारा लिए गए ऋणों की सूचक होती हैं। गौण जमाओं को व्युत्पन्न जमाएँ (Derivative Deposits) भी कहते हैं। बैंक की बैलेंसशीट इस प्रकार होगी:-

बैंक की वैलेंसशीट (Bank’s Balance Sheet) 

(₹ 1,000 की प्रारंभिक नकद जमा पर )

दायित्व (Liabilities)परिसंपत्तियाँ (Assets)
माँग जमाएँ (Demand Deposits)

अथवा   

(प्राथमिक जमाएँ)                        =1000

नकदी (Cash)                         =1,000
कुल                                            =1000कुल                                      =1000

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बैंक के पास कुल नकद कोष (Cash Reserve) = ₹ 1000 है, किंतु आवश्यक = 1000 × 10% = ₹ 100 है। अत: बैंक के पास ₹900 अधिशेष (Required) नकद कोष माँग जमा का केवल 10 प्रतिशत नकद कोष (Excess Cash Reserves) है। बैंक बिना किसी जोखिम के ₹900 ऋण के रूप में दे सकता है। जब इस अधिशेष कोष को ऋण में बदला जाता है तब बैंक की बैलेंसशीट निम्न प्रकार की हो जाएगी ।

बैंक की वैलेंसशीट (Bank’s Balance Sheet) 

(जब प्रारंभिक अधिशेष कोष को ऋण में बदला जाता है)

दायित्व (Liabilities) परिसंपत्तियाँ (Assets) 
(I) माँग जमाएँ (Demand Deposits)

(प्राथमिक जमाएँ)                      =1000

(II)माँग जमाएँ (Demand Deposits)

(गौण जमाएँ                             =900

नकदी (Cash)                          =1,000 

 

(ii) ऋण (Loans )                      =900 

कुल                                  =1900कुल                                    =1900

₹ 900 ऋण की राशि कहाँ जाती है? यदि उधार लेने वाला (मिस्टर Y) ₹ 900 का चैक मिस्टर X को जारी करता है तब मुद्रा बैंक में वापिस आ जाती है। तदनुसार, बैंक के ₹ 1,000 के नकद कोष बने रहेंगे। किंतु अब बैंक की माँग जमाएँ बढ़कर ₹1,900 हो जाती है जिसके लिए आवश्यक नकद कोष (Required Cash Reserves) केवल 10/100 × 1900 = ₹ 190 चाहिए ।

बैंक का अधिशेष कोष (Excess Reserves) अब ₹ 1,000 – ₹ 190 = ₹ 810 मैं बदलेगा। इससे बैंक की गौण जमाएँ (Secondary Deposits) बढ़कर ₹ 900 + ₹ 810 हो जाएँगी तथा माँग जमाएँ हो जाएगी। बैंक एक बार फिर ₹ 810 को ऋण ₹ 1,000 + ₹ 900 + ₹ 810 = ₹2,710 हो जाएंगी। बैंक के नकद कोष (Cash Reserves) ₹ 1000 उसी प्रकार बने रहेंगे यदि ऋणी को जारी किया गया ₹ 810 का चैक एक बार फिर बैंक में जमा कराया जाता है। अब आवश्यक नकद कोष = माँग जमाओं का 10%।

अधिशेष कोष (Excess Reserves) 

= ₹ 2,710 का 10% =271 

= 1,000 – 271 =729 

फिर, ऋण दिए जाएँगे और माँग जमाएँ बढ़ेंगी। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक अधिशेष कोष समाप्त नहीं हो जाते। अंत में बैंक की बैलेंस शीट निम्नलिखित प्रकार की होगी:

बैंक की वैलेंसशीट (Bank’s Balance Sheet) 

( जब अधिशेष कोष पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं)

दायित्व (Liabilities) परिसंपत्तियाँ (Assets) 
माँग जमाएँ (Demand Deposits)

 (i) (प्राथमिक जमाएँ)                  =1000

(ii) गौण जमाएँ                          =900

                                                       810

                                                     729

                                                 …………

(i) नकदी (Cash)                         = 1,000 

(ii) ऋण (Loans )                         =900 

                                                        810

                                                       729

                                                …………….

( और इसी प्रकार, जब तक अधिशेष कोष समाप्त नहीं हो जाते) 
कुल                           =10000कुल                          =10000

इस प्रकार ₹ 1,000 नकद कोष के आधार पर बैंक ₹ 10,000 की माँग जमाओं (Demand Deposits) का निर्माण करता है। इसे ही बैंकिंग व्यवस्था द्वारा साख निर्माण (Credit Creation) कहा जाता है। इस प्रकार से वाणिज्यिक बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति में अंशदान देते हैं।

केंद्रीय बैंक (The Central Bank) 

केंद्रीय बैंक देश का सर्वोच्च (Apex ) बैंक है जो देश की संपूर्ण बैंकिंग प्रणाली को नियंत्रित करता है। इस बैंक का कार्य अल्पविकसित देशों के संदर्भ में आर्थिक विकास के कार्य को संभव बनाना होता है। यह बैंक देश में सभी प्रकार के नोट छापता है. सरकार के बैंक का कार्य करता है। यह बैंक देश में मुद्रा की पूर्ति को नियंत्रित करता है ।

भारत में रिजर्व बैंक, इंग्लैंड में बैंक ऑफ इंग्लैंड और अमेरिका में फेडरल रिजर्व सिस्टम, केंद्रीय बैंक हैं। यद्यपि संसार का सबसे पहला केंद्रीय बैंक 1668 में स्वीडन में स्थापित हुआ था परंतु वास्तव में केंद्रीय बैंक का आरंभ सन 1694 में वैंक ऑफ इंग्लैंड की स्थापना के बाद हुआ है।

परिभाषा (Definition) 

  • सैम्युअलसन के अनुसार, “केंद्रीय बैंक का एक कार्य है। यह अर्थव्यवस्था, मुद्रा की पूर्ति तथा साख को नियंत्रित करने का कार्य करता है।” (Central bank has one function. It operates to control economy, supply of money and credit. – Samuelson)
  • डी. कॉक के शब्दों में, “केंद्रीय बैंक वह वैंक है जो देश की मौद्रिक तथा बैकिंग प्रणाली के शिखर पर होता है। ” (A Central bank is a bank which constitutes the apex of the monetary and banking structure of its country.- De Kock) 

संक्षेप में, केंद्रीय बैंक एक ऐसी संस्था है जो कि देश की मौद्रिक व वैंकिंग व्यवस्था का संचालन करती है।

3.1 केंद्रीय बैंक तथा व्यापारिक बैंक में अंतर बताओ ?

(Difference between Central Bank and Commercial Bank) 

एक देश का केंद्रीय बैंक निम्नलिखित बातों में व्यापारिक बैंकों से भिन्न है:-

(1) केंद्रीय बैंक का मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा (Public Welfare) होता है जबकि वाणिज्यिक बैंकों का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना (Profit-Motive) होता है। डी. कॉक के शब्दों में, “केंद्रीय बैंक का मार्गदर्शक सिद्धांत (Guiding Principle) यह है कि इनको जनता के हित तथा समूचे देश की भलाई के लिए काम करना चाहिए और इसका मुख्य उद्देश्य लाभ प्राप्ति नहीं होना चाहिए | ”

(2) केंद्रीय बैंक का जनता के साथ सीधा (Direct ) लेन-देन नहीं होता है जबकि वाणिज्यिक बैंकों का जनता के साथ सीधा लेन-देन होता है ।

(3) केंद्रीय बैंक एक सरकारी संस्था होती है जबकि व्यापारिक बैंकों का स्वामित्व गैर-सरकारी व सरकारी भी हो सकता है।

(4) केंद्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों से प्रतियोगिता नहीं करता बल्कि वह बैंकों के बैंक व अंतिम ऋणदाता का काम करता है।

(5) केंद्रीय बैंक को नोट जारी करने का पूर्ण एकाधिकार होता है जबकि व्यापारिक बैंक नोट जारी नहीं कर सकते ।

(6) केंद्रीय बैंक देश की बैंकिंग प्रणाली का नियंत्रण करता है। व्यापारिक बैंक, केंद्रीय बैंक के नियंत्रण में कार्य करते हैं।

(7) केंद्रीय बैंक देश के विदेशी विनिमय का संरक्षक (Custodian) होता है। व्यापारिक बैंक विदेशी विनिमय संबंधी कार्यों के लिए केंद्रीय बैंक की स्वीकृति पर निर्भर करते हैं।

(8) केंद्रीय बैंक देश की सरकार का बैंक (Banker of the Government) है। सरकार के सारे बैंकिंग कार्य केंद्रीय बैंक द्वारा संपन्न किए जाते हैं। व्यापारिक बैंक सरकार के कार्यों के लिए केंद्रीय बैंक के प्रतिनिधि के रूप में काम कर सकते हैं।

(9) केंद्रीय बैंक अन्य व्यापारिक बैंकों का बैंक (Banker’s Bank) होता है। व्यापारिक बैंकों को अपनी कुल जमा का कुछ प्रतिशत केंद्रीय बैंक के पास नकद कोष के रूप में रखना पड़ता है।

(10) केंद्रीय बैंक साख नियंत्रण (Credit Control) करता है, तथा बैंकों के समाशोधन गृह (Clearing House) का काम करता है। अन्य बैंक ये काम केंद्रीय बैंक के प्रतिनिधि के रूप में कर सकते हैं।

महत्त्वपूर्ण टिप्पणी 

वाणिज्यिक बैंक मुद्रा को जारी नहीं कर सकते, ये बैंक साख निर्माण की क्रिया के द्वारा देश में मुद्रा की पूर्ति में अपना योगदान देते हैं।

3.2 केंद्रीय बैंक के कार्य कि व्याख्या कीजिए (Functions of Central Bank) 

एक केंद्रीय बैंक द्वारा किए जाने वाले मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:-

(1) नोट जारी करना (Issuing of Notes ):–

वर्तमान समय में संसार के प्रत्येक देश में नोट छापने का एकाधिकार केवल केंद्रीय बैंक को ही प्राप्त होता है और केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किए गए नोट सारे देश में असीमित विधिग्राह्म (Unlimited Legal Tender) के रूप में घोषित होते हैं। डी. कॉक (De Kock) के अनुसार, लगभग हर जगह नोट जारी करने का विशेषाधिकार केंद्रीय बैंक के उद्गम और विकास के साथ जुड़ा हुआ था। वास्तव में 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ होने तक साधारणतः इन्हें निर्गमन बैंक (Bank of Issue) कहा जाता था।

(2) सरकार का वैंक (Banker to the Government ):-

केंद्रीय बैंक सभी देशों में सरकार के बैंकर, एजेन्ट एवं वित्तीय परामर्शदाता के रूप में कार्य करते हैं । सरकारी बैंकर के रूप में यह सरकारी विभागों के खाते रखता है तथा सरकारी कोषों की व्यवस्था करता है। यह सरकार के लिए उसी प्रकार कार्य करता है जिस प्रकार व्यापारिक बैंक अपने ग्राहकों के लिए करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर सरकार को बिना ब्याज के ॠण दिया जाता है तथा केंद्रीय बैंक सरकारी कोष का भी स्थानांतरण (Transfer) करता है। यह सरकार के लिए प्रतिभूतियों, ट्रेजरी बिलों आदि का भी क्रय विक्रय करता है। देश का सर्वोच्च बैंक होने के नाते यह सरकार के आर्थिक, वित्तीय एवं मौद्रिक विषयों पर समय-समय पर सलाह देता रहता है। डी. कॉक (De Kock) के शब्दों में, “सरकारी बैंकर के रूप में केंद्रीय बैंक केवल इसलिए कार्य नहीं करता कि वह सरकार के लिए सुविधाजनक एवं मितव्ययी है, वल्कि इसलिए भी कार्य करता है क्योंकि सार्वजनिक वित्त तथा मौद्रिक मामलों से इसका गहरा संबंध होता है । ”

(3) बैंकों का बैंक (Banker’s Bank):–

केंद्रीय बैंक देश के अन्य बैंको के लिए बैंकर का कार्य करता है। केंद्रीय बैंक का अन्य बैंकों के साथ लगभग वही संबंध होता है जो एक साधारण बैंक का अपने ग्राहकों के साथ होता है। केंद्रीय बैंक अन्य बैंकों के नकद कोष (Cash Reserves) का कुछ भाग अपने पास जमा के रूप में रखता है, ताकि ग्राहकों की माँग होने पर वह उनके धन की अदायगी कर सकें। व्यापारिक बैंक इस प्रकार के नकद कोष को दो प्रकार से रखते हैं। प्रथम अपने पास नकद कोष, के रूप में, दूसरे केंद्रीय बैंक के पास जमा के रूप में रखते हैं। ये बैंक केंद्रीय बैंक के पास रखे गए कोष को भी नकद कोष मानते हैं। डी. कॉक (De Kock) के शब्दों में, “केंद्रीय बैंकों में नकद कोषों का केंद्रीयकरण किसी भी देश की बैंकिंग प्रणाली के लिए एक बड़ी शक्ति का कारण होता है। अलग-अलग बैंकों में बिखरे हुए पड़े रहने की तुलना में केंद्रीय नकद कोष कम से कम एक बड़े और अधिक लोचशील ढांचे के आधार के रूप में उपयोगी हो सकते हैं। ”

(4) बैंकों का निरीक्षण (Supervision of the Banks):–

बैंकों का बैंक होने के कारण, केंद्रीय बैंक, व्यापारिक बैंकों का निरीक्षण भी करता है। इसके लिए उसे ये कार्य करने होते हैं: (i) व्यापारिक बैंकों को लाइसेंस जारी करना। (ii) देश के विभिन्न भागों तथा विदेशों में व्यापारिक बैंकों की शाखाएं खुलवा कर उनका विस्तार करना । (iii) व्यापारिक बैंकों का विलियन (Merger) तथा (iv) बैंकों का परिसमापन (Liquidation)।

(5) अंतिम ऋणदाता (Lender of the Last Resort):–

देश के अन्य बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक अंतिम ऋणदाता के रूप में भी कार्य करता है। इसका अर्थ यह है कि जब किसी व्यापारिक बैंक को कहीं से भी ऋण प्राप्त नहीं होता है तब वह केंद्रीय बैंक से ऋण की माँग करता है और केंद्रीय बैंक उचित प्रतिभूतियों के आधार पर उसे ऋण दे देता है। इस प्रकार केंद्रीय बैंक अंतिम ऋणदाता के रूप में देश की बैंकिंग व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करता है।

(6) देश के विदेशी मुद्रा कोषों का संरक्षक (Custodian of the Nation’s Reserves of Foreign Exchange):–

केंद्रीय बैंक अंतर्राष्ट्रीय कोष के संरक्षक के रूप में भी कार्य करता है । देश की मुद्रा इकाई के बाहरी मूल्य को स्थिर रखना केंद्रीय बैंक का महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसको सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्राओं के कोष संचित रखता है। इनके अतिरिक्त केंद्रीय बैंक अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के विकास तथा विनिमय दर की स्थिरता के लिए भी विदेशी कोषों को उचित मात्रा में बनाए रखता है।

(7) समाशोधन गृह का कार्य (Clearing House Function ):–

केंद्रीय बैंक समाशोधन गृह का कार्य भी करता है। इसका अर्थ है कि केंद्रीय बैंक दूसरे बैंकों का हिसाब-किताब भी रखता है। हर एक बैंक का केंद्रीय बैंक में खाता होता है। अतएव इन बैंकों के पास एक-दूसरे के चेक आते हैं, उनका भुगतान केंद्रीय बैंक द्वारा होता है। इसको एक उदाहरण द्वारा समझाया जा सकता है। मान लीजिए A बैंक के पास B बैंक के नाम का लिखा ₹10,000 का चेक आता है और B के पास A के नाम का ₹ 15,000 का चेक आता है। दोनों दावों के निपटारे या समाशोधन का सबसे सरल तरीका यह है कि A बैंक B बैंक को केंद्रीय बैंक का ₹ 5,000 का चेक दे दे। इस हस्तांतरण के फलस्वरूप A बैंक के खाते में से ₹5,000 कम कर दिए जाएँगे तथा B बैंक के खाते में ₹5,000 जमा हो जाएंगे। इस प्रकार नकद लेन-देन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके अतिरिक्त समाशोधन गृह का एक अन्य लाभ यह भी है कि इसके कारण व्यापारिक बैंक बहुत कम मात्रा में नकद कोष रख कर काफी बड़ी मात्रा में साख का निर्माण कर सकते हैं क्योंकि समाशोधन गृह के कारण नकदी की माँग बहुत कम हो जाती है।

(8) साख मुद्रा का नियंत्रण ( Control of Credit) :-

वास्तव में केंद्रीय बैंकों का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य व्यापारिक बैंकों की साख संबंधी क्रियाओं का नियंत्रण करना है । साख नियंत्रण से अभिप्राय साख मुद्रा की मात्रा में देश की मौद्रिक आवश्यकताओं के अनुसार कमी या वृद्धि करने से है। साख मुद्रा का आवश्यकता से अधिक प्रसार होने पर मुद्रा-स्फीति की दशा उत्पन्न हो जाती है और कम होने पर मुद्रा अवस्फीति के दोष पैदा हो जाते हैं। यही कारण है कि केंद्रीय बैंक साख मुद्रा को निश्चित सीमाओं के अंदर रखने का प्रयास करता है। केंद्रीय बैंक द्वारा साख मुद्रा का उचित नियंत्रण करने से देश के सामान्य कीमत स्तर में स्थिरता लाई जा सकती है तथा उत्पादन एवं रोज़गार में वृद्धि की जा सकती है।

(9) आँकड़े इकट्ठा करना (Collection of Data):-

केंद्रीय बैंक आर्थिक सूचनाओं एवं आँकड़ों को इकट्ठा करता है और उन्हें समय-समय पर प्रकाशित करता है। केंद्रीय बैंक देश में बैंकिंग, मुद्रा तथा विदेशी विनिमय संबंधी जो आँकड़े प्रकाशित करता है उनसे देश की आर्थिक प्रगति की गति का बहुत कुछ ज्ञान हो जाता है। देश में आर्थिक योजनाओं को सफल बनाने के लिए ये सूचनाएँ तथा आँकड़े और भी आवश्यक होते हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न देशों की आर्थिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन इन आँकड़ों की सहायता से बहुत आसानी से किया जा सकता है।

(10) अन्य कार्य (Other Functions ):–

उपरोक्त कार्यों के अतिरिक्त केंद्रीय बैंक कुछ अन्य कार्य भी करता है जो इस प्रकार हैं:-

(i) कृषि वित्त (Agricultural Credit):– कई देशों के केंद्रीय बैंक जैसे- भारत का रिजर्व बैंक कृषि के विकास के

लिए साख सुविधाओं की व्यवस्था भी करता है।

(ii) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन (International Monetary Conferences):–

केंद्रीय बैंक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन जैसे- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) या विश्व बैंक (World Bank) तथा अन्य सम्मेलनों में अपने देश का प्रतिनिधित्व करता है ।

(iii) मुद्रा तथा विल वाजार ( Money and Bill Market ):– केंद्रीय बैंक मुद्रा तथा बिल बाजार संगठित करने का कार्य भी करता है।

(iv) फटे-पुराने नोट वापिस लेना (Return of Torn Notes ):- केंद्रीय बैंक फटे-पुराने नोटों को वापिस लेकर उनके स्थान पर नये नोट दे देता है।

संक्षेप में, केंद्रीय बैंक कई महत्त्वपूर्ण कार्य करता है जैसे- नोट जारी करना, बैंकों का बैंक, सरकार का बैंकर, अंतिम ऋणदाता, साख का नियंत्रण इत्यादि । इसका किसी देश के आर्थिक विकास में बहुत महत्त्व है।

देश के केंद्रीय बैंक, को नोट जारी करने का एकाधिकार प्राप्त है ,कैसे ?

(Central Bank of the Country enjoys Monopoly Right of Note Issuing) 

यह निम्नलिखित लाभों के कारणों से प्राप्त हुआ था: (i) केंद्रीय बैंक को नोट जारी करने का अधिकार प्राप्त होने से मौद्रिक प्रणाली में समरूपता (Uniformity) आती है। (ii) इससे देश की मुद्रा में जनता का विश्वास सुदृढ़ हो जाता है क्योंकि बैंक को सरकार का संरक्षण प्राप्त होता है। (iii) देश में मुद्रा की पूर्ति पर एक केंद्रीय नियंत्रण संभव हो जाता है। (iv) नोट जारी करने के एकाधिकार द्वारा कागजी मुद्रा को आवश्यकता के अनुसार घटा-बढ़ा कर मुद्रा प्रणाली में पर्याप्त लोच बनाई रखी जा सकती है । (v) नोट जारी करना एक लाभदायक व्यवसाय है। नोट जारी करने का कार्य केंद्रीय बैंक के नियंत्रण में होने के कारण इससे प्राप्त लाभ को सरकारी कोष में जमा कराया जा सकता है।

केंद्रीय बैंक के पास केंद्रीयकृत नकद कोषों का क्या महत्त्व है ? 

(i) वाणिज्यिक बैंक छोटे नकद कोषों द्वारा निर्वाह कर सकते हैं।

(ii) संकट के समय बैंकों को वित्तीय सहायता प्राप्त होती है।

(iii) केंद्रीय बैंक को देश की बैकिंग प्रणाली पर नियंत्रण रखने का अवसर प्राप्त होता है।

4.  केंद्रीय बैंक मुद्रा की पूर्ति अथवा अर्थव्यवस्था में साख के प्रवाह को कैसे नियंत्रित करता है ? 

(How does the Central Bank Control Money Supply or Flow of Credit in the Economy?) 

अथवा 

केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के मुख्य उपकरण क्या हैं? 

(What are the Principal Instruments of Monetary Policy of the Central Bank?) 

साख नियंत्रण से अभिप्राय देश के केंद्रीय बैंक द्वारा निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साख के संकुचन तथा साख के विस्तार का नियंत्रण करना है।

मौद्रिक नीति या साख नियंत्रण नीति के मुख्य उपकरणों (उपायों) को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है:

(A) मात्रात्मक उपकरण (Quantitative Instruments )

(B) गुणात्मक उपकरण (Qualitative Instruments)

इनका विस्तृत वर्णन इस प्रकार है:-

  • (A) साख नियंत्रण के मात्रात्मक उपकरण (Quantitative Instruments of Credit Control) 

मात्रात्मक उपकरण (Quantitative Instruments) साख नियंत्रण के वे उपकरण हैं जो एक अर्थव्यवस्था की कुल मुद्रा पूर्ति/साख को प्रभावित करते हैं।

मुद्रा-स्फीति से निपटने के लिए मुद्रा की पूर्ति को कम किया जाता है और अवस्फीति से निपटने के लिए मुद्रा की पूर्ति को बढ़ाया जाता है। इन उपकरणों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं:

(1) बैंक दर (Bank Rate):–

वैंक दर से अभिप्राय उस दर से है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) व्यापारिक बैंकों को मुद्रा उधार देता है।

(Bank rate refers to the rate of interest at which the RBI lends money to the commercial banks.)

इसका संबंध व्यापारिक बैंकों की तुरंत (instant or immediate) ऋण आवश्यकता से है।

बैंक दर में वृद्धि (या कमी) होने से अकसर ब्याज की बाजार दर में वृद्धि (या कमी) होती है। (ब्याज की बाजार दर वह दर है जो व्यापारिक बैंकों द्वारा सामान्य जनता से वसूली जाती है ।) तदनुसार, बाजार में साख की लागत (जिसे पूँजी की लागत भी कहा जाता है) में परिवर्तन होता है। जब बैंक दर बढ़ती है, तब ब्याज की बाजार दर भी बढ़ती है। तदनुसार, पूँजी की लागत बढ़ जाती है (अर्थात ऋण महँगा हो जाता है)।

इसके फलस्वरूप साख की माँग कम हो जाती है और इस कारण मुद्रा की पूर्ति में कमी की प्रवृत्ति होती है। तदनुसार, मुद्रा-स्फीति नियंत्रित होती है। इसके विपरीत, जब बैंक दर घटती है, तब ब्याज की बाजार दर भी घटती है। तदनुसार, पूँजी की लागत घट जाती है (अर्थात ऋण सस्ता हो जाता है)। इसके फलस्वरूप साख की माँग बढ़ जाती है और इस कारण मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि की प्रवृत्ति होती है। तदनुसार, अवस्फीति नियंत्रित होती है।

संक्षेप में, मुद्रा-स्फीति के समय जब साख का संकुचन जरूरी होता है तब केंद्रीय बैंक महँगी साख नीति (Dear Money Policy) को अपनाता है। इसके विपरीत, अवस्फीति के समय, जब साख का विस्तार करना जरूरी होता है तब केंद्रीय बैंक सस्ती साख नीति (Cheap Money Policy) को अपनाता है अर्थात बैंक दर को कम कर देता है।

बैंक दर नीति की सफलता निम्नलिखित तत्वों पर निर्भर करती है 

(Success of Bank Rate Policy Depends on the Following Factors) 

(i) ऋणों के लिए व्यापारिक बैंकों की केंद्रीय बैंक पर निर्भरता की मात्रा (Degree of Dependence of the Commercial Banks upon the Central Bank for Loans ) :–

यदि व्यापारिक बैंकों के पास अपने आधिक्य कोष ग्राहकों की उधार की जरूरत पूरी करने के लिए काफी हैं तो उनकी केंद्रीय बैंक पर निर्भरता बहुत कम होगी।

(ii) व्यापारिक वैंकों की केंद्रीय बैंक से फंडस की माँग की संवेदनशीलता की मात्रा (Degree of Sensitivity of Bank’s Demand for Funds from the Central Bank):–

बाजार की दशाओं को देखते हुए, व्यापारिक बैंक, बैंक दर में छोटी सी वृद्धि या कमी के प्रति यदि संवेदनशील नहीं हैं तो ऐसी परिस्थिति में बैंक दर की नीति को विशेष सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।

(iii) मुद्रा वाजार में व्याज दर का ढाँचा (Structure of Interest Rates in the Money Market):–

यदि बाजार में गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाएँ अपनी ब्याज दर में उसी प्रकार परिवर्तन कर दें जैसा कि केंद्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों से आशा करता है, तो बैंक दर की नीति सफल नहीं हो पाएगी।

(iv) वाजार में फंडस की पूर्ति ( Supply of Funds in the Market):–

बैंक दर की नीति तब भी सफल नहीं होगी यदि बैंकिंग साधनों की अपेक्षा गैर-बैंकिंग फंडस के साधन अधिक महत्व रखते हैं।

(2) खुले वाजार की क्रियाएँ (Open Market Operations):–

खुले बाजार की क्रियाओं से अभिप्राय भारतीय रिजर्व वैंक (केंद्रीय बैंक) द्वारा सरकार की ओर से प्रतिभूतियों का खुले बाजार में वेचना तथा खरीदना है | (Open market operations refer to the sale and purchase of securities in the open market by the RBI central bank.) खुले बाजार में प्रतिभूतियों (जैसे- राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र – NSCS को बेचने से केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था से तरलता (नकदी ) को सोख ( Soak) लेता है और प्रतिभूतियों को खरीदने से केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में तरलता छोड़ता (Release) है।

जब तरलता को सोख लिया जाता है (मुद्रा-स्फीति के दौरान ) तब व्यापारिक बैंकों के नकद कोष सिकुड़ जाते हैं अर्थात कम हो जाते हैं। इसका अर्थ है उनकी साख सृजित करने की क्षमता में कटौती होना । दूसरी ओर, जब तरलता को छोड़ा जाता है (अवस्फीति/मंदी के दौरान) तब बैंकों के नकद कोषों में वृद्धि होती है। इसका अर्थ है व्यापारिक बैंकों की साख सृजित करने की क्षमता में वृद्धि होना ।

अतः प्रतिभूतियों को बेचकर तथा तरलता को सोख कर मुद्रा-स्फीति को ठीक किया जाता है, जबकि प्रतिभूतियों को खरीदकर तथा तरलता को छोड़ कर (Releasing Liquidity) अवस्फीति को ठीक किया जाता है।

बाजार की क्रियाओं की सफलता निम्नलिखित तत्वों पर निर्भर करती है

(Success of OMO Depends on the Following Factors) 

(i) प्रतिभूतियों के वाजार का पाया जाना (Existence of Securities Market):–

प्रतिभूतियों के क्रय तथा विक्रय के लिए सुव्यवस्थित बाजार का पाया जाना बहुत जरूरी है। इसके अभाव में खुले बाजार की क्रियाओं का सफल होना सन्देहयुक्त है।

(ii) बैंकों के पास कोष ( Reserves with the Banks):–

यदि व्यापारिक बैंक अपने पास काफी अधिक कोष स्वयं रखना चाहते हों तो उन्हें प्रतिभूतियों को खरीदने की आवश्यकता नहीं है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में ऐसा ही होता है। जिसके कारण खुले बाजार की क्रियाएँ वहां सफल नहीं हैं।

(3) रेपो दर (Repo Rate):–

वह दर जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक (केंद्रीय बैंक) खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों को खरीद कर व्यापारिक वैंकों को अल्पकालीन ऋण प्रदान करता है ‘रेपो दर ‘ कहलाती है। वास्तव में यह एक पुनःखरीद दर (Repurchase Rate) है । पुनः खरीद समझौते (Repurchase Aggrement ) पर दोनों पक्षदारों द्वारा हस्ताक्षर किए जाते हैं जिस पर यह लिखा होता है कि व्यापारिक बैंक द्वारा पूर्व-निर्धारित कीमत पर एक दी गई तिथि को प्रतिभूतियाँ पुनः खरीदी जाएँगी।

अन्य शब्दों में, केंद्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों से सरकारी प्रतिभूतियों को खरीद कर उन्हें एक ऋण चेक जारी करता है। परंतु इसमें व्यापारिक बैंक द्वारा पूर्व-निर्धारित तिथि पर तथा पूर्व-निर्धारित कीमत पर प्रतिभूतियों को पुनः खरीदने का समझौता होता है।

मुद्रा-स्फीति के समय, रेपो दर को बढ़ाकर पूँजी की लागत को बढ़ाया जाता है। इससे साख की माँग कम हो जाती है और तदनुसार, अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति भी कम हो जाती है, जिसकी आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, अवस्फीति के समय रेपो दर को कम करके पूँजी की लागत को घटाया जाता है। इससे साख की माँग बढ़ जाती है और तदनुसार, अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति भी बढ़ जाती है, जिसकी आवश्यकता होती है।

(4) विपरीत रेपो दर (Reverse Repo Rate):–

वह दर जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक (केंद्रीय वैंक) व्यापारिक बैंकों से जमाएँ स्वीकार करता है (सरकारी प्रतिभूतियों के माध्यम से) ‘विपरीत रेपो दर ‘ कहलाती है। इसे विपरीत पुनःखरीद दर (Reverse Repurchase Rate) भी कहते हैं । इस स्थिति में, एक विपरीत पुनः खरीद समझौते पर दोनों पक्षदारों द्वारा हस्तांक्षर किए जाते हैं जिस पर यह लिखा होता है कि प्रतिभूतियों को पूर्व-निर्धारित कीमत पर तथा एक दी हुई तिथि पर पुनःखरीदा जाएगा। विपरीत रेपो दर व्यापारिक बैंकों को ब्याज आय (Interest Income) सृजित करने की अनुमति देती है।

जब विपरीत रेपो दर कम हो जाती है तो बैंक अपने आधिक्य कोषों (Surplus Funds) को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास रखने के लिए हतोत्साहित होते हैं। इसके स्थान पर, बैंक इन कोषों को RBI के पास CRR – कोषों के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। इसके कारण व्यापारिक बैंकों की साख पूर्ति (मुद्रा पूर्ति) में वृद्धि होती है। तदनुसार, अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि होती है, जिसकी अवस्फीति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, रेपो दर में वृद्धि ब्याज आय सृजित करने के लिए व्यापारिक बैंकों को RBI के पास अधिक कोष रखने के लिए प्रेरित कर सकती है। यह साख निर्माण के लिए RBI को CRR – कोष प्रदान करने की उसकी क्षमता को कम करता है। तदनुसार, अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति में कमी होती है, जिसकी मुद्रा-स्फीति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यकता होती है।

(5) नकद निधि अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR ):–

इसका अर्थ बैंक की कुल जमाओं का वह न्यूनतम अनुपात है जो उसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास जमा रखना पड़ता है । ( It refers to the minimum percentage of a bank’s total deposits required to be kept with the RBI) व्यापारिक बैकों को कानूनी तौर पर अपनी जमाओं का एक निश्चित प्रतिशत RBI के पास नकद निधि के रूप में रखना पड़ता है। इसे RBI द्वारा निर्धारित किया जाता है तथा अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति को नियंत्रित करने के लिए इसमें समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है। उदाहरण के लिए, यदि न्यूनतम आरक्षित अनुपात 10 प्रतिशत है और किसी बैंक की कुल जमाएँ ₹ 100 करोड़ हैं तो इस बैंक को ₹10 करोड़ RBI के पास रखने होंगे। यदि न्यूनतम आरक्षित अनुपात को बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया जाता है तो बैंक को ₹ 20 करोड़ RBI के पास रखने होंगे। यदि RBI को मुद्रा की पूर्ति या साख प्रवाह का संकुचन करना होगा तो वह न्यूनतम नकद निधि अनुपात बढ़ा देगा और यदि उसको मुद्रा की पूर्ति या साख प्रवाह का विस्तार करना होगा तो वह इसे घटा देगा।

( 6 ) वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR ) :–

प्रत्येक बैंक को अपनी परिसंपत्तियों के निश्चित प्रतिशत को अपने पास नकद रूप में या अन्य तरल परिसंपत्तियों के रूप में रखना पड़ता है जिसे वैधानिक तरलता अनुपात कहते हैं । (Every bank is required to maintain a fixed percentage of its assets in the अनुपात form of cash or other liquid assets, called SLR.) वैधानिक तरलता अनुपात की दर को (नकद निधि की दर की भाँति) RBI द्वारा निर्धारित किया जाता है तथा इसमें समय-समय पर परिवर्तन होता रहता है । मुद्रा की पूर्ति को कम करने के लिए (मुद्रा-स्फीति के दौरान), केंद्रीय बैंक वैधानिक तरलता अनुपात को बढ़ा देता है। इसके विपरीत, अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि करने के लिए (अवस्फीति के दौरान) केंद्रीय बैंक वैधानिक तरलता अनुपात को कम कर देता है।

नकद निधि अनुपात (CRR ) तथा वैधानिक तरलता अनुपात (SLR ) की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यापारिक बैंकों के अपने पास कितनी मात्रा में आधिक्य नकद निधि (Excess Cash Reserves) पड़ी हुई है। यदि व्यापारिक बैंकों के पास आधिक्य नकद निधि बड़ी मात्रा में मौजूद है तो CRR और SLR दोनों उपाय अर्थहीन हो जाते हैं।

  • (B) साख नियंत्रण के गुणात्मक उपकरण (Qualitative Instruments of Credit Control) 

गुणात्मक उपकरण (Qualitative Instruments) साख नियंत्रण के वे उपकरण हैं जो किसी विशेष उद्देश्यों के लिए दी जाने वाली तथा विशेष बैंकों द्वारा दी जाने वाली साख को नियंत्रित करते हैं। इसे चयनात्मक साख नियंत्रण (Selective Credit Control) भी कहा जाता है। इसका प्रभाव साख की कुल मात्रा पर नहीं पड़ता है। इसका उद्देश्य साख के विभिन्न क्षेत्रों को नियंत्रित करना है। गुणात्मक साख नियंत्रण के मुख्य उपकरणों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं:

(1) सीमांत आवश्यकता ( Margin Requirement ) :–

सीमांत आवश्यकता से अभिप्राय, वैंक द्वारा किसी वस्तु की जमानत पर दिए गए ऋण तथा जमानत वाली वस्तु के वर्तमान मूल्य के अंतर से है। (The margin requirement refers to the difference between the current value of the security offered for loans and the value of loans granted.) मान लीजिए किसी व्यक्ति ने ₹80 लाख के ऋण के लिए ₹1 करोड़ मूल्य का अपना मकान बैंक के पास जमानत के रूप में रखा है। इस स्थिति में सीमांत आवश्यकता ₹20 लाख होगी। सीमांत आवश्यकता को बढ़ा दिया जाता है जब मुद्रा की पूर्ति को कम करने की आवश्यकता होती है। सीमांत आवश्यकता को कम कर दिया जाता है जब मुद्रा की पूर्ति को बढ़ाने की आवश्यकता होती है। बहुधा सट्टे (व्यावसायिक) की क्रियाओं के लिए सीमांत आवश्यकता को ऊँचा रखा जाता है।

(2) साख की राशनिंग ( Rationing of Credit) :–

साख राशनिंग से अभिप्राय विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं के लिए साख की मात्रा का कोटा निर्धारित करना है । ( Rationing of credit refers to fixation of credit quotas for different business activities) साख की राशनिंग तब की जाती है जब अर्थव्यवस्था में विशेष रूप से सट्टे की क्रियाओं के लिए दिए जाने वाले ऋणों पर रोक लगानी होती है। RBI विभिन्न व्यावसायिक क्रियाओं के लिए साख का कोटा निर्धारित कर देता है। ऋण देते समय व्यापारिक बैंक कोटे की सीमा से अधिक ऋण नहीं दे सकते। इससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति प्रतिबंधित होती है तथा मुद्रा-स्फीति नियंत्रित होती है। दूसरी ओर, साख की राशनिंग (यदि पहले से विद्यमान है) मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि करने के लिए हटा दी जाती है। इससे अवस्फीति नियंत्रित होती है।

(3) प्रत्यक्ष कार्यवाही (Direct Action):–

केंद्रीय बैंक को उन बैंकों के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्यवाही करनी पड़ती है जो उसकी साख नीति का पालन नहीं करते। प्रत्यक्ष कार्यवाही के अंतर्गत ऐसे व्यापारिक बैंकों की देश की बैंकिंग प्रणाली के सदस्यों के रूप में मान्यता को रद्द कर दिया जाता है।

(4) नैतिक प्रभाव (Moral Suasion):–

कभी-कभी केंद्रीय बैंक सदस्य बैंकों पर नैतिक प्रभाव डालकर उन्हें साख नियंत्रण के लिए अपनाई गई नीति के अनुसार काम करने के लिए सहमत कर लेता है। केंद्रीय बैंक का लगभग सभी व्यापारिक बैंकों पर नैतिक प्रभाव होता है। अतः सामान्यतया ये बैंक केंद्रीय बैंक द्वारा साख के विस्तार या संकुचन करने की सलाह को मान लेते हैं । मुद्रा-स्फीति के दौरान बैंकों को ऋणों को सीमित करने तथा अवस्फीति के दौरान उदारता से ऋण देने का परामर्श दिया जाता है।

नैतिक प्रभाव में ‘मनाने’ तथा ‘दबाव’ डालने का मिश्रण पाया जाता है। केंद्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों को अपनी मौद्रिक नीति का पालन करने के लिए मनाता है। अन्यथा उन पर दबाव डालकर अपनी नीति को मनवाता है। उनके विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्यवाही करता है। उनकी मान्यता को रद्द कर देता है। मौद्रिक नीति के एक उपकरण होने के कारण, ‘नैतिक प्रभाव’ एक मात्रात्मक उपाय भी है और एक गुणात्मक उपाय भी, यद्यपि इसे गुणात्मक उपाय की श्रेणी में रखा जाता है।

निम्नलिखित सारणी में साख नियंत्रण के मात्रात्मक तथा गुणात्मक उपकरणों को संक्षिप्त रूप में दिखाया गया है:–

मौद्रिक नीति के उपकरण (Instruments of Monetary Policy)

(मात्रात्मक उपकरण / Quantitative Instruments​(गुणात्मक उपकरण / Qualitative Instruments
बैंक दर (Bank Rate)​सीमांत आवश्यकता (Margin Requirement)
​खुले बाजार की क्रियाएँ (Open Market Operations)​साख की राशनिंग (Rationing of Credit)
​रेपो दर (Repo Rate)​प्रत्यक्ष कार्यवाही (Direct Action)
​विपरीत रेपो दर (Reverse Repo Rate)​नैतिक प्रभाव (Moral Suasion)
​नकद निधि अनुपात (Cash Reserve Ratio)​Right Column (गुणात्मक उपकरण / Qualitative Instruments):
​वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio)​सीमांत आवश्यकता (Margin Requirement)

1. निबंधात्मक प्रश्न(Essay Type Questions) 

  1. वाणिज्यिक बैंक किसे कहते हैं? इसके मुख्य कार्यों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए ।

What is a commercial bank? Explain in brief its main functions.

  1. केंद्रीय बैंक की परिभाषा दीजिए। केंद्रीय बैंक के कौन से कार्य हैं ?

Define a central bank. What are the functions of central bank?

(BSEH 2005, 2006, 2014)

  1. केंद्रीय बैंक की परिभाषा दीजिए। केंद्रीय बैंक के ‘सरकार का बैंकर’ कार्य की व्याख्या कीजिए ।

(BSEH 2010)

  1. केंद्रीय बैंक की परिभाषा दीजिए। केंद्रीय बैंक के ‘अन्तिम ऋणदाता’ कार्य की व्याख्या कीजिए।

Define central bank. Explain ‘banker to the government’ function of central bank.

(BSEH 2010)

Define central bank. Explain ‘lender of last resort’ function of central bank.

  1. केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा पूर्ति नियंत्रण या साख नियंत्रण के लिए कौन-सी विधियाँ अपनाई जाती हैं?

What are the methods adopted by the central bank to control credit or money supply?

(BSEH 2006) (BSEH 2006)

  1. निम्न की व्याख्या करें: (i) व्यापारिक बैंकों के प्राथमिक कार्य (ii) वस्तु विनियम प्रणाली के दोष ।

Explain the following: (i) Primary functions of commercial banks. (ii) Defect of barter system.

  1. वाणिज्यिक बैंक संवृद्धि और विकास की प्रक्रिया में कैसे अंशदान देते हैं ?

How do commercial banks contribute to the process of growth and development?

  1. व्यापारिक बैंक के कार्यों की व्याख्या कीजिए ।

Explain functions of commercial banks.

  1. साख नियंत्रण क्या होता है? इसे कैसे नियंत्रित किया जाता है ?

What is credit control? How credit is controlled?

(BSEH 2015) (BSEH 2012, 2013) (BSEH 2012)

  1. केंद्रीय बैंक के कार्यों की व्याख्या कीजिए ।

Explain functions of central bank.

अथवा

केंद्रीय बैंक के मुख्य कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

Describe briefly the main functions of central bank.

  1. साख नियंत्रण की मात्रात्मक विधियों की व्याख्या कीजिए ।

Explain quantitative methods for controlling credit.

  1. साख नियंत्रण की चयनात्मक विधियों की व्याख्या करें।

Explain selective methods of credit control.

  1. केंद्रीय बैंक की परिभाषा दीजिए। केंद्रीय बैंक तथा वाणिज्यिक बैंकों में कोई तीन अंतर लिखिए।

(BSEH 2013) (BSEH 2015, 2016) (BSEH 2013) (BSEH 2013) (BSEH 2014) 

Define central bank. State any three differences between central bank and commercial

banks.

  1. व्यापारिक बैंक से क्या अभिप्राय है? केंद्रीय बैंक तथा व्यापारिक बैंक में अंतर लिखें।

(BSEH 2014)

What is meant by commercial bank? Distinguish between central bank and commercial

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