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ध्याय -7 बैंकिंग: वाणिज्यिक बैंक तथा केंद्रीय बैंक

(Banking: Commercial Banks and The Central Bank) 

■वाणिज्यिक बैंक

■ वाणिज्यिक बैंकों के कार्य

■ केंद्रीय बैंक – अर्थ एवं कार्य

■ मौद्रिक नीति के उपाय- साख नियंत्रण के मात्रात्मक एवं गुणात्मक उपाय

वाणिज्यिक बैंक किसे कहते है (Commercial Banks):-

वाणिज्यिक बैंक वह वित्तीय संस्था है जो लोगों के रुपये को अपने पास जमा के रूप में स्वीकार करती है और उनको उपभोग अथवा निवेश के लिये उधार देती है।

इसके अतिरिक्त आजकल बैंक और भी कई कार्य करते हैं जैसे साख निर्माण, रुपये को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हस्तांतरित करना, एजेंसी कार्य तथा सामान्य सेवाएँ ।

परिभाषा (Definition):-

  • भारतीय बैंकिंग कम्पनी एक्ट के अनुसार, “बैंकिंग कम्पनी वह है जो वैंकिंग का कार्य करती है। वैकिंग से अभिप्राय उधार देना अथवा निवेश के उद्देश्य से जमा रूप में जनता से मुद्रा स्वीकार करना और इनका भुगतान माँगने पर चेक, ड्राफ्ट, आदेश या अन्य किसी प्रकार के भुगतान करना है” (

Banking company is one which transacts the business of banking which means the accepting for the purpose of lending or investment of deposits of money from the public repayable on demand or otherwise and withdrawable by cheque, draft, order or otherwise. — Indian Banking Companies Act.) 

एक आवश्यक वात (An Important Note ):-

एक वित्तीय संस्था को बैंकिंग संस्था नहीं कहा जाएगा यदि इसके द्वारा दो प्राथमिक कार्य नहीं किये जाते: (i) चेक द्वारा निकाली जाने वाली जमाओं को स्वीकार करना तथा

(ii) उधार देना ।

इस प्रकार,

* LIC एक वित्तीय संस्था है, किंतु इसे बैंक नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह उधार तो देती है किंतु लोगों की चेक द्वारा निकाली जाने वाली जमाओं को स्वीकार नहीं करती।

* डाकखाने भी बैंक नहीं हैं यद्यपि वे लोगों से जमा स्वीकार करते हैं लेकिन वे ऋण नहीं देते।

इसलिए इन्हें गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्था (Non-Banking Financial Institution) कहा जाता है।

  1. वाणिज्यिक बैंकों के कार्यों कि व्याख्या कीजिए (Functions of Commercial Banks) 

वाणिज्यिक बैंकों के कार्यों को तीन भागों में बांटा जाता है:-

 (1) मुख्य कार्य (Primary Functions),

(2) गौण कार्य, (Secondary Functions),

(3) सामाजिक कार्य (Social Functions)। 

2.1 मुख्य कार्य (Primary Functions) 

बैंकों के दो मुख्य कार्य हैं–

(1) जमा स्वीकार करना

(2) ऋण देना।

(1) जमा स्वीकार करना (Accepting Deposits) 

एक बैंक जनता के धन को जमा करता है। लोग अपनी सुविधा और शक्ति के अनुसार निम्नलिखित खातों में रुपया जमा कर सकते हैं:-

(i) निश्चितकालीन या सावधि जमा खाता (Fixed or Time Deposit Account):-

इस खाते में एक निश्चित अवधि के लिए रुपया जमा किया जाता है। जमाकर्ता को जमा की रक़म की रसीद (Fixed Deposit Receipts) दे दी जाती है। इसमें जमाकर्ता का नाम, जमा की राशि, ब्याज की दर तथा जमा की अवधि लिखी होती है। यह रसीद हस्तांतरणीय (Transferable) नहीं होती। यदि जमाकर्ता को अपनी रकम की आवश्यकता, अवधि पूर्ण होने से पहले पड़ जाती है तो कुछ कटौती या व्याज (Discount or Interest ) काट कर बैंक उसे रकम लौटा देता है। इस खाते में जमा पर बैंक अधिक ब्याज देता है। जमा की अवधि जितनी लम्बी होती है ब्याज की दर भी उतनी अधिक होती है। इसका कारण यह हैं कि बैंक इस रकम का लम्बे समय तक प्रयोग कर सकते हैं। इस खाते में जमा रकम को बैंक की सावधि देनदारी (Time Liability) कहा जाता है।

(ii) चालू जमा खाता (Current or Demand Deposit Account):-

इस खाते में जमाकर्ता जितनी बार चाहे रुपया जमा कर सकता है और कभी भी आवश्यकतानुसार निकाल सकता है। इस खाते में साधारणतया व्यापारी वर्ग रुपया जमा करवाता है। साधारणतः बैंक इस प्रकार की जमा पर ब्याज नहीं देता। यदि जमा की रकम एक न्यूनतम आवश्यक राशि से कम होती है तो जमाकर्ता से बैंक कुछ सेवा व्यय (Service Charge) वसूल कर सकता है। इस खाते से रुपया प्रायः चेक बुक द्वारा निकलवाया जाता है। इस खाते में जमा राशि को बैंक की माँग देनदारी (Demand Liability) कहा जाता है। अमेरिका में इस खाते को चेक खाता (Checking Account) कहा जाता है।

(iii) वचत जमा खाता (Saving Deposit Account):-

यह खाता छोटी-छोटी बचतों को प्रोत्साहन देने के लिए होता है। इस खाते से एक निश्चित मात्रा तक ही रुपया निकलवाया जा सकता है। निश्चित मात्रा से अधिक रुपया निकलवाने के लिए बैंक को पहले सूचित करना पड़ता है। इस खाते पर बैंक ब्याज भी देता है जो कि निश्चितकालीन जमा खाते की तुलना में कम होता है।

(iv) होम सेफ वचत खाता ( Home Safe Saving Account ):-

बैंकों ने इस खाते का प्रचलन अभी हाल में किया है। इसमें जमाकर्ता के घर पर बैंक एक गुल्लक (Small Safe) प्रदान करता है जिसकी चाबी बैंक के पास रहती है। जमाकर्ता इस गुल्लक में थोड़ी-थोड़ी बचत डालता रहता है तथा कुछ समय के बाद बैंक में जाकर उसमें जमा राशि को जमाकर्ता अपने खाते में जमा करा देता है। बहुत सारे बैंक इस प्रकार बचाई गई रकम को जमाकर्ता के घर से अपने एजेन्ट भेज कर मंगवा लेते हैं तथा गुल्लक की राशि को जमाकर्ता के खाते में जमा कर लेते हैं। इस प्रकार के खाते पर बचत जमा खाते की तुलना में कम ब्याज दिया जाता है।

(v) आवर्ती जमा खाता (Recurring Deposit Account):-

इस प्रकार के खाते में जमाकर्ता एक निश्चित समय जैसे भी 12, 24, 36, या 60 महीनों के लिए प्रतिमास निश्चित रकम जमा करते हैं। यह रकम कुछ विशेष परिस्थितियों के अलावा साधारणतया निर्धारित समय से पहले नहीं निकाली जा सकती। जमाकर्ता की जमाराशि पर मिलने वाली ब्याज खाते में जमा होती जाती है। इस खाते में सावधि खाते की तरह ही अन्य सभी खातों की तुलना में अधिक ब्याज प्राप्त होता है।

चेक जमाएँ और गैर-चेक जमाएँ व्यापारिक बैंकों में सभी जमाओं को चेक जमाओं (Chequeable Deposits) तथा गैर-चेक जमाओं (Non-Chequeable Deposits) में वर्गीकृत किया ता है।

चेकवाली जमाएं वे जमाएं हैं जिनके बदले में किसी भी समय चेक लिखा / जारी किया जा सकता है। (और इस प्रकार मुद्रा को निकलवाया जा सकता है।)

गैर-चेक वाली जमाएं वे हैं जिनके बदले में किसी भी समय चेक नहीं लिखा जा सकता। (और यह मुद्रा निकलवाई भी नहीं जा सकती।) इन जमाओं को बैंकों के पास एक निश्चित समय अवधि तक के लिए सुरक्षित कोष के रूप में रखा जाता है। इसलिए इन जमाओं को निश्चित सावधि जमाएं (Fixed Deposits) भी कहा जाता है।

(2) ऋण देना (Advancing of Loans ):-

बैंक का दूसरा मुख्य कार्य लोगों को रुपया उधार देना है। बैंक के पास जो रुपया जमा के रूप में है उसमें से एक निश्चित राशि नकद कोष में रखकर बाकी रुपया बैंक द्वारा उधार दे दिया जाता है। ये बैंक प्रायः उत्पादक कार्यों के लिए ऋण देते हैं तथा उचित जमानत (Security) की माँग करते हैं। ऋण की रकम प्रायः जमानत के मूल्य से कम होती है। बैंक निम्नलिखित प्रकार के ऋण प्रदान करते हैं:

(i) नकद साख (Cash Credit):-

इसके अंतर्गत ऋणी को एक निश्चित जमानत के आधार पर एक निश्चित राशि निकलवाने का अधिकार दे दिया जाता है। इस सीमा के अन्दर ही ऋणी आवश्यकतानुसार रुपया निकलवाता रहता है तथा जमा भी करता रहता है। इस अवस्था में बैंक केवल वास्तव में निकलवाई गई राशि पर ही ब्याज लेता है । इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऋणी द्वारा निकलवाई जाने वाली ऋण की रकम का बैंक द्वारा निर्धारण ऋणी के स्टॉक विवरण तथा उसकी उत्पादन क्रिया की मात्रा के आधार पर किया जाता है।

(ii) ओवर ड्राफ्ट (Overdraft):-

बैंक में चालू जमा रखने वाले ग्राहक बैंक से एक समझौते के अनुसार अपनी जमा से अधिक रकम निकलवाने की अनुमति ले लेते हैं । निकाली गई रकम को ओवर ड्राफ्ट कहते हैं। यह सुविधा अल्पकाल के लिए विश्वसनीय ग्राहकों को ही मिलती है। मान लीजिए एक व्यक्ति के ₹10,000 जमा हैं और उसको बैंक ₹12,000 तक के चेक काटने का अधिकार दे देता है तो ₹2,000 ओवर ड्राफ्ट कहलाएगा।

(iii) माँग ऋण (Demand Loans):-

ये ऋण एक निश्चित रकम के रूप में दिए जाते हैं। इन्हें वापिस करने की कोई निश्चित परिपक्वता अवधि नहीं होती। इन ऋणों पर ऋण की स्वीकृति के तुरंत बाद ही ब्याज लगना आरंभ हो जाता है, चाहे ऋणी चेक द्वारा उस खाते में से कुल ऋण का केवल एक भाग निकाले। ये ऋण व्यक्तिगत जमानत पर या वित्तीय परिसंपत्ति या टिकाऊ वस्तुओं की जमानत पर दिए जाते हैं।

(iv) अल्प अवधि ऋण ( Short-term Loans ):-

अल्पकालीन ऋणों में सामान्यत: (i) व्यक्तिगत ऋण तथा (ii) कार्यकारी पूंजी ऋण सम्मिलित किए जाते हैं। इस प्रकार के ऋणों की सारी राशि पर ब्याज लगना उसी दिन से आरंभ हो जाता है जिस दिन से ये ऋणी व्यक्ति के खाते में लिखा जाता है। सामान्यतः इस प्रकार के ऋण जमानत पर दिये जाते हैं। अतः ये सुरक्षित ऋण होते हैं।

साख निर्माण (Credit Creation):-

आजकल बैंकों का एक मुख्य कार्य साख का निर्माण करना है। बैंक अपनी प्रारंभिक जमा से अधिक रुपया लोगों को उधार देकर साख का निर्माण करते हैं।

बैंक साख का सृजन कैसे करते हैं अथवा देश में मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि कैसे करते हैं। 

ऋण राशि कभी भी नकद नहीं दी जाती। सभी ऋणों को बैंकों की जमाओं में जोड़ दिया जाता है। चूँकि सभी जमाओं को 100 प्रतिशत निकाला नहीं जाता, कुल माँग जमाओं का केवल थोड़ा प्रतिशत ही बैंक नकद कोष के रूप में रखते हैं। इस प्रकार बैंकों द्वारा अपने नकद कोषों की तुलना में ऋण कहीं अधिक दे दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया ही है जिसके द्वारा बैंक साख का सृजन करते हैं अथवा देश में मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि करते हैं।

2.2 गौण कार्य(Secondary Functions):-

बैंक उपरोक्त प्राथमिक कार्यों के अतिरिक्त कई गौण कार्य भी करते हैं। जैसे-

(1) एजेंट के रूप में कार्य

(2) सामान्य उपयोगिता की सेवाएँ।

(1) एजेंट के रूप में कार्य (Agency Functions) 

बैंक अपने ग्राहकों के लिए विभिन्न तरीकों से एजेंट के कार्य करता है:

(i) विभिन्न मदों का एकत्रीकरण और भुगतान (Collection and Payment of Various Items):

बैंक अपने ग्राहकों की ओर से चेक, किराया, ब्याज इत्यादि एकत्र करता है और इसी प्रकार उनकी ओर से करों, बीमों की किस्तों इत्यादि की अदायगी करता है।

(ii) प्रतिभूतियों की खरीद तथा विक्री (Purchase and Sale of Securities):

बैंक अपने ग्राहकों के लिए विभिन्न प्रकार के शेयर्स तथा स्टॉक की जानकारी प्राप्त करके उनकी ओर से प्रतिभूतियों को खरीदने, बेचने तथा उनको सुरक्षित रखने का कार्य भी करता है।

(iii) ट्रस्टी तथा प्रबंधक (Trustee and Executor ):

बैंक अपने ग्राहकों के आदेश पर उनकी संपत्ति के ट्रस्टी तथा प्रबंधक का कार्य भी करते हैं ।

(iv) रुपया भेजना (Remitting of Money):

एक स्थान से दूसरे स्थान पर रुपया भेजना भी बैंकों का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। यह काम बैंक ड्राफ्ट द्वारा किया जाता है।

(v) विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय (Purchase and Sale of Foreign Exchange):

बैंक विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देते हैं। अधिकतर यह कार्य विदेशी विनिमय बैंकों द्वारा किया जाता है।

(vi) संदर्भ पत्र (Letter of References):

बैंक अपने ग्राहकों की आर्थिक स्थिति की सूचना देश – विदेश के व्यापारियों को देते हैं तथा देश-विदेश के व्यापारियों की आर्थिक स्थिति की सूचना अपने ग्राहकों को देते हैं।

(vii) नये शेयरों के अविक्रित अंशों के खरीदने का आश्वासन (Underwriting):

बिना बिके हुए नये शेयरों को खरीदने का बैंक आश्वासन देते हैं। बैंक निजी आधार पर चुने हुए निवेशकों के बीच प्रतिभूतियों की बिक्री की व्यवस्था भी करते हैं।

(2) सामान्य उपयोति की सेवाएँ (General Utility Services):-

व्यापारिक बैंक कुछ इस प्रकार के अन्य कार्य भी करते हैं जिनसे समाज के लोगों को काफी लाभ होता है। ये कार्य निम्नलिखित हैं:-

 (i) लॉकर की सुविधा (Locker Facilities):

बैंक अपने ग्राहकों को लॉकर की सुविधा भी प्रदान करता है, जिनमें लोग अपने सोने-चांदी के जेवर तथा अन्य आवश्यक कागजात सुरक्षित रख सकते हैं। इसका वार्षिक किराया बहुत कम होता है।

(ii) यात्री चेक तथा साख प्रमाण पत्र ( Traveller’s Cheques and Letters of Credit):

बैंक अपने ग्राहकों को यात्रा पर जाते समय नकद राशि साथ न ले जाकर सुविधा और सुरक्षा की दृष्टि से यात्री चेक तथा साख प्रमाण पत्रों की सुविधा प्रदान करता है। इसके फलस्वरूप यात्री निश्चिन्त होकर यात्रा कर सकते हैं।

(iii) वाणिज्यिक सूचनाएँ एवं आँकड़े (Business Information and Statistics):

बैंक आर्थिक स्थिति से परिचित होने के कारण व्यापार संबंधी सूचनाएं एवं आँकड़े एकत्रित करके अपने ग्राहकों को वित्तीय मामलों पर सलाह देते हैं।

(iv) वस्तुओं के वाहन में सहायता (Help in Transportation of Goods ):

बड़े-बड़े व्यापारी अपने ग्राहकों को माल भेजकर उसकी बिल्टी बैंक में भेज देते हैं। खरीददार बैंक में रुपये जमा करवाकर उस बिल्टी को छुड़वा लेते हैं और रेलवे स्टेशन तथा ट्रांसपोर्टर से माल ले लेते हैं। इस प्रकार बैंक वस्तुओं को उत्पादन केंद्रों से उपभोग केंद्रों तक पहुँचाने में सहायता देते हैं।

सामाजिक कार्य या बैंकों का आर्थिक विकास में योगदान 

(Social Functions or Role of Banks in Economic Development) 

आधुनिक समय में व्यापारिक बैंक देश के आर्थिक विकास तथा सामाजिक कल्याण के लिए निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कार्य भी करते हैं:

(1) पूँजी निर्माण (Capital Formation):

व्यापारिक बैंक लोगों की निष्क्रिय जमा (Idle Saving) को एकत्रित करते हैं तथा उन्हें उत्पादक कार्यों में निवेश करते हैं। इसके फलस्वरूप वे पूँजी निर्माण की दर को बढ़ाने में सहायता देते हैं । पूँजी निर्माण के फलस्वरूप आर्थिक विकास की दर तीव्र होती है।

बैंक निवेश के महत्त्वपूर्ण एजेंट हैं बचतकर्ताओं तथा निवेशकर्ताओं के बीच बैंक एक कड़ी का कार्य करते हैं। जमाकर्ता अपनी बचतों या कोषों को बैंकों में जमा करवाते हैं और निवेशकर्ता बैंकों से इन कोषों को उधार के रूप में लेते हैं। यदि बैंकिंग प्रणाली न होती तो बचतों की अधिकांश मात्रा निवेशकर्ताओं तक पहुँच न पातीं। अतएव बैंक निवेश के महत्वपूर्ण एजेंटों के रूप में कार्य करते हैं।

(2) नव प्रवर्तन को प्रोत्साहन (Inducement to Innovations):

बैंक उद्यमियों को साख प्रदान करके नव प्रवर्तन को प्रोत्साहित करते हैं। इसके फलस्वरूप नई वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि होती है। इसका आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

(3) निवेश – सहायक व्याज दर ढांचा (Investment-friendly Interest-rate Structure):

बैंक ब्याज की दर को इस प्रकार निर्धारित करते हैं कि जिससे उद्यमियों एवं व्यवसायियों को निवेश करने के लिये प्रोत्साहन मिलता है। इसके फलस्वरूप उत्पादन तथा व्यापार में वृद्धि होती है। इसका आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

( 4 ) ग्रामीण क्षेत्र के विकास में योगदान (Contribution in the Development of Rural Sector ): व्यापारिक बैंक, ग्रामीण क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं । वे किसानों को उन्नत कृषि, भूमि सुधार, यंत्र आदि खरीदने के लिये रियायती ब्याज की दर (Concessional Rate of Interest) पर उचित मात्रा में ऋण देते हैं। इसके फलस्वरूप किसान कृषि उत्पादन बढ़ाने में सफल होते हैं। बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी शाखाएँ खोलकर वहाँ से निष्क्रिय बचत एकत्रित करते हैं तथा उसका उत्पादक कार्यों में प्रयोग करते हैं। बैंकों के इस कार्य का देश के आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

(5) बाजार माँग में वृद्धि (Increasing Market Demand):

अल्पविकसित देशों में लोगों की आय कम होती है। उनका जीवन स्तर नीचा होता है। वे उपभोक्ता वस्तुओं की माँग कम करते हैं। बैंक अपने ग्राहकों को टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएँ जैसे: टी० वी०, फ्रिज आदि खरीदने के लिये साख (Consumer Credit) उपलब्ध कराते हैं। इसके फलस्वरूप टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की माँग बढ़ती है। उनके उत्पादन में वृद्धि होती है नये उद्योग स्थापित किये जाते हैं। परिणामस्वरूप रोज़गार, आय एवं जीवन स्तर में वृद्धि होती है। अतएव बैंक, उपभोक्ता साख उपलब्ध कराकर माँग वृद्धि में सहायक होते हैं जिसके फलस्वरूप लोगों के जीवन स्तर में वृद्धि होती है तथा आर्थिक विकास की गति तीव्र होती है।

(6) मौद्रिक नीति लागू करना (Implementation of Monetary Policy):

प्रत्येक अल्पविकसित देश की सरकार एवं केंद्रीय बैंक को अपनी मौद्रिक नीति प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करने के लिये एक व्यवस्थित बैकिंग प्रणाली की आवश्यकता होती है। देश की मौद्रिक नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने में व्यापारिक बैंकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है । वे केंद्रीय बैंक के निर्देश के अनुसार साख का विस्तार एवं संकुचन करते हैं। इसके फलस्वरूप मौद्रिक नीति प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करके आर्थिक विकास के लक्ष्य को बिना अर्थव्यवस्था पर स्फीतिक या अवस्फीतिक अंतराल के प्रभाव के प्राप्त करना संभव हो जाता है।

(7) रोज़गार के अवसर (Employment Opportunities):

बेरोज़गार युवा वर्ग व्यापारिक बैंकों से उचित ब्याज की दर पर पर्याप्त मात्रा में साख प्राप्त करके स्वरोज़गार ( Self-employment ) की व्यवस्था कर सकते हैं। स्वरोज़गार के अवसर बढ़ाने के फलस्वरूप रोज़गार तथा उत्पादन दोनों में वृद्धि होती है। इसका देश के आर्थिक विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

संक्षेप में, बैंक केवल रुपया जमा करने तथा उधार देने की संस्था मात्र नहीं रह गई है वल्कि यह आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण का एक महत्वपूर्ण साधन वन गई है।

क्रेडिट कार्ड उपभोक्ता मांग को बढ़ाते हैं 

बैंकों द्वारा जारी किए गए क्रेडिट कार्ड उपभोक्ता व्यय को बढ़ाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में कुल माँग के स्तर में वृद्धि होती है। इससे निवेश, संवृद्धि तथा विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

 

वाणिज्यिक बैंकों का वर्गीकरण (Classification of Commercial Banks) 

भारत में वाणिज्यिक बैंक (Commercial Banks in India) 

(i) अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (Scheduled Commercial Banks)

(ii) गैर-अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (Non-Scheduled Commercial Banks)

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (Public Sector Banks) 

उदाहरण: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) तथा अन्य राष्ट्रीयकृत बैंक जैसे- बैंक ऑफ इंडिया और केनरा बैंक

निजी क्षेत्र के बैंक (Private Sector Banks) उदाहरण: एच० डी०एफ० सी० बैंक (HDFC Bank)

विदेशी बैंक (Foreign Banks) उदाहरण : सिटी बैंक (CITI Bank)

(A अनुसूचित बैंक गैर-अनुसूचित बैंकों की तुलना में सापेक्षतया बड़े बैंक होते हैं।

(B) अनुसूचित बैंकों को RBI की द्वितीय सूची में शामिल किया जाता है, जबकि गैर-अनुसूचित बैंकों को नहीं ।

वाणिज्यिक बैंकों द्वारा साख का निर्माण (Credit Creation by the Commercial Banks) 

वाणिज्यिक बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। वे साख सृजन करके मुद्रा पूर्ति में योगदान देते हैं। वाणिज्यिक बैंक माँग जमा के रूप में साख सृजन करते हैं। वाणिज्यिक बैंकों की माँग जमाएँ उनके नकद कोषों (Cash Reserves) से कई गुना अधिक होती हैं।

यदि यह मान लें कि उनके नकद कोषों की राशि ₹ 1,000 है तथा माँग जमा ₹10,000 है। तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति वाणिज्यिक बैंकों के नकद कोषों से दस गुना अधिक हो जाएगी। इस प्रकार नकद कोष ₹ 1,000 के आधार पर वाणिज्यिक बैंकों ने मुद्रा की पूर्ति में ₹10,000 का योगदान किया। यहाँ मूल प्रश्न यह है कि बैंकों के पास जो ₹ 1.006 नकद कोष होता है वह कैसे ₹ 10,000 मूल्य की माँग जमा के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यह कैसे होता है इसका संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित है:-

(i) बैंकों को अपने ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर यह ज्ञात होता है कि सभी जमाकर्ता, एक ही समय, अपनी जमा राशि को निकलवाने के लिए नहीं आएँगे।

(ii) यदि बैंक का अनुभव यह कहता है कि, सामान्यतः जमाकर्ता अपनी जमा राशियों का लगभग 10 प्रतिशत ही निकलवाते हैं। तो बैंक को उनकी माँग पूरी करने के लिए कुल जमा का केवल 10 प्रतिशत ही अपने पास नकद कोष के रूप में रखना होगा। इसे नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR) कहते हैं।

(ii) यदि CRR = 10 प्रतिशत, तब ₹ 1,000 के कुल नकद कोषों के आधार पर बैंक ₹ 10,000 मूल्य के ऋण निम्नलिखित सूत्र के अनुसार दे सकता है:

माँग जमाएँ  = 1/CRR × नकद कोष (Cash Deposits)

1/10% × 1,000 = 10 × 1,000 = 10,000

यहाँ नोट करना महत्वपूर्ण है कि ऋण राशि कभी भी नकदी के रूप में नहीं दी जाती। इस राशि को बैंक उधार लेने वालों खाते में माँग जमा के रूप में प्रदर्शित करते हैं। इसके अनुसार जब ₹10,000 का ऋण दिया जाता है तब बैंकों की माँग जमाएँ ₹ 10,000 बढ़ जाती हैं।

उपरोक्त समीकरण में माँग जमाएँ वास्तव में ऋण को सूचित करती हैं।

(iv) अतः हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि CRR = 10% की मान्यता के अनुसार, यदि बैंकों के नकद कोष में ₹ 1,000 की वृद्धि होती है. तो अर्थव्यवस्था में साख की पूर्ति (अथवा मुद्रा की पूर्ति) ₹10,000 (= 100 × 10) होगी।

हम पहले पढ़ चुके हैं कि बैंकों का नकद कोष मुद्रा पूर्ति का एक भाग नहीं है (इसका सरल कारण यह है कि मुद्रा पूर्ति करने वाले अधिकारियों के पास रहने वाली नकद मुद्रा पूर्ति का एक भाग नहीं है)।

माँग जमाएँ मुद्रा पूर्ति का एक भाग है (इसका सरल कारण यह है कि ये जमाएँ चैक द्वारा निकाली जा सकती हैं तथा इन जमाओं के धारक चैक जारी करके इन जमाओं का उपयोग कर सकते हैं) ।

साख गुणक (Credit Multiplier):-

उपरोक्त उदाहरण में जब बैंकों के पास नकद कोष ₹ 1,000 था यह माँग जमा के रूप में ₹10,000 मूल्य के साख सृजन करता है। इस प्रकार

साख गुणक = माँग जमाएँ /नकद कोष = 10,000 /1,000 = 10

अथवा

साख गुणक = 1/ CRR  =1/ 10% = 10

यहाँ, CRR = नकद आरक्षित अनुपात

उदाहरण (Illustration):-

साख सृजन की प्रक्रिया का वर्णन एक उदाहरण द्वारा किया जा सकता है। सरलता के लिए हम मान लेते हैं कि (i) अर्थव्यवस्था में एकल बैंकिंग प्रणाली ( Single Banking System) पाई जाती है, अर्थात अर्थव्यवस्था में केवल एक ही बैंक कार्यरत है।

(ii) नकद आरक्षित अनुपात (CRR) 10 प्रतिशत है और इसमें परिवर्तन नही होता। हम देखते हैं कि इस बैंकिंग प्रणाली में क्या होता है

प्राथमिक तथा गौण जमाएँ स्पस्ट् करे (Primary and Secondary Deposits) 

प्राथमिक जमाएँ (Primary Deposits) लोगों द्वारा वाणिज्यिक बैंकों में कराई गई नकद जमा । इन्हें बैंकों के खातों में ‘माँग जमाओं’ के एक भाग के रूप में दर्शाया जाता है।

गौण जमाएँ (Secondary Deposits) उन जमाओं को कहते हैं जिनकी उत्पत्ति तब होती है जब बैंकों द्वारा लोगों को ऋण एक भाग के रूप में दिखाया जाता है। दिया जाता है। इन्हें भी बैंकों के खाते में ‘माँग जमाओं’  के एक भाग के रूप में दिखाया जाता है

संक्षेप में, जबकि प्राथमिक जमाएँ बैंकों के पास जमाकर्ताओं की बचतें होती हैं; गौण जमाएँ बैंकों से जमाकर्ताओं द्वारा लिए गए ऋणों की सूचक होती हैं। गौण जमाओं को व्युत्पन्न जमाएँ (Derivative Deposits) भी कहते हैं। बैंक की बैलेंसशीट इस प्रकार होगी:-

बैंक की वैलेंसशीट (Bank’s Balance Sheet) 

(₹ 1,000 की प्रारंभिक नकद जमा पर )

दायित्व (Liabilities)परिसंपत्तियाँ (Assets)
()माँग जमाएँ (Demand Deposits) अथवा

(प्राथमिक जमाएँ) =1000

नकदी (Cash) =1,000
कुल =1000कुल =1000

 

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बैंक के पास कुल नकद कोष (Cash Reserve) = ₹ 1000 है, किंतु आवश्यक = 1000 × 10% = ₹ 100 है। अत: बैंक के पास ₹900 अधिशेष (Required) नकद कोष माँग जमा का केवल 10 प्रतिशत नकद कोष (Excess Cash Reserves) है। बैंक बिना किसी जोखिम के ₹900 ऋण के रूप में दे सकता है। जब इस अधिशेष कोष को ऋण में बदला जाता है तब बैंक की बैलेंसशीट निम्न प्रकार की हो जाएगी ।

बैंक की वैलेंसशीट (Bank’s Balance Sheet) 

(जब प्रारंभिक अधिशेष कोष को ऋण में बदला जाता है)

दायित्व (Liabilities) परिसंपत्तियाँ (Assets) 
माँग जमाएँ (Demand Deposits)

(I) (प्राथमिक जमाएँ) =1000

(II)माँग जमाएँ (Demand Deposits) (गौण जमाएँ  =900

नकदी (Cash) =1,000

 

 

(ii) ऋण (Loans ) =900

कुल =1900कुल =1900

₹ 900 ऋण की राशि कहाँ जाती है? यदि उधार लेने वाला (मिस्टर Y) ₹ 900 का चैक मिस्टर X को जारी करता है तब मुद्रा बैंक में वापिस आ जाती है। तदनुसार, बैंक के ₹ 1,000 के नकद कोष बने रहेंगे। किंतु अब बैंक की माँग जमाएँ बढ़कर ₹1,900 हो जाती है जिसके लिए आवश्यक नकद कोष (Required Cash Reserves) केवल 10/100 × 1900 = ₹ 190 चाहिए ।

बैंक का अधिशेष कोष (Excess Reserves) अब ₹ 1,000 – ₹ 190 = ₹ 810 मैं बदलेगा। इससे बैंक की गौण जमाएँ (Secondary Deposits) बढ़कर ₹ 900 + ₹ 810 हो जाएँगी तथा माँग जमाएँ हो जाएगी। बैंक एक बार फिर ₹ 810 को ऋण ₹ 1,000 + ₹ 900 + ₹ 810 = ₹2,710 हो जाएंगी। बैंक के नकद कोष (Cash Reserves) ₹ 1000 उसी प्रकार बने रहेंगे यदि ऋणी को जारी किया गया ₹ 810 का चैक एक बार फिर बैंक में जमा कराया जाता है। अब आवश्यक नकद कोष = माँग जमाओं का 10%।

अधिशेष कोष (Excess Reserves) 

= ₹ 2,710 का 10% =271

= 1,000 – 271 =729

फिर, ऋण दिए जाएँगे और माँग जमाएँ बढ़ेंगी। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक अधिशेष कोष समाप्त नहीं हो जाते। अंत में बैंक की बैलेंस शीट निम्नलिखित प्रकार की होगी:

बैंक की वैलेंसशीट (Bank’s Balance Sheet) 

( जब अधिशेष कोष पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं)

दायित्व (Liabilities) परिसंपत्तियाँ (Assets) 
माँग जमाएँ (Demand Deposits)

(i) (प्राथमिक जमाएँ) =1000

(ii) गौण जमाएँ =900

810

72

………………

(i) नकदी (Cash) =1,000

(ii) ऋण (Loans ) =900

810

729

 

……………………

( और इसी प्रकार, जब तक अधिशेष कोष समाप्त नहीं हो जाते)
कुल =10000कुल =10000

 

इस प्रकार ₹ 1,000 नकद कोष के आधार पर बैंक ₹ 10,000 की माँग जमाओं (Demand Deposits) का निर्माण करता है। इसे ही बैंकिंग व्यवस्था द्वारा साख निर्माण (Credit Creation) कहा जाता है। इस प्रकार से वाणिज्यिक बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की पूर्ति में अंशदान देते हैं।

3.केंद्रीय बैंक(The Central Bank):-

 

 

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