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अध्याय-11 पूर्ण प्रतियोगिता में पूर्ति का सिद्वांत   (Theory of Supply in Perfect Competition) 

इस अध्याय मे हम अध्ययन करेंगे :-
  1. पूर्ति की धारणा
  2. व्यक्तिगत पूर्ति तथा बाजार पूर्ति
  3. पूर्ति अनुसूची पूर्ति वक्र
  4. पूर्ति फलन या पूर्ति के निर्धारक तत्त्व
  5. पूर्ति का नियम
  6. पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन तथा पूर्ति में परिवर्तन
  7. समय अवधि  तथा पूर्ति का व्यवहार
  8. पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के पूर्ति वक्र का व्युत्पन्न
  9. पूर्ति की कीमत लोच 
  1. पूर्ति की धारणा(Concept of Supply)

किसी वस्तु की पूर्ति से अभिप्राय वस्तु की उन मात्राओं से है जिन्हें एक विक्रेता विभिन्न संभव कीमतों पर निश्चित समय में बेचने के लिए तैयार होता है ।

परिभाषा ( Definition):-

→ थॉमस के अनुसार, “वस्तुओं की पूर्ति वह मात्रा है जो एक बाजार में किसी निश्चित समय पर विभिन्न कीमतों पर बिकने के लिए प्रस्तुत की जाती है।”

(The supply of goods is the quantity offered for sale in a given market at a given time at various prices. —Thomas) 

1.1 पूर्ति तथा स्टॉक में अंतर (Distinction between Stock and Supply):-

किसी वस्तु का स्टॉक उस वस्तु की कुल मात्रा को बतलाता है जो किसी समय में बाजार में विक्रेता के पास मौजूद होती है,

पूर्ति स्टॉक का वह भाग है जो कि विक्रेता एक निश्चित समय अवधि में तथा निश्चित कीमत पर बेचने को तैयार रहता है

मान लीजिए मण्डी में जनवरी, 2014 को गेहूँ का स्टॉक 100 टन है तथा कीमत ₹500 प्रति क्विंटल है। अगर इस कीमत पर विक्रेता 10 टन गेहूं बेचने को तैयार है तो गेहूं की पूर्ति केवल 10 टन होगी । इसी प्रकार यदि कीमत ₹600 प्रति क्विंटल हो जाने पर विक्रेता 50 टन गेहूं बेचने को तैयार हो तो पूर्ति केवल 50 टन होगी ।

1.2 किसी वस्तु की पूर्ति तथा पूर्ति की मात्रा में अंतर 

(Distinction between Supply and Quantity Supplied of a Commodity) 

जिस प्रकार माँग तथा माँगी गई मात्रा में अंतर पाया जाता है उसी प्रकार हम पूर्ति तथा पूर्ति की मात्रा में भी अंतर कर सकते हैं।

पूर्ति की मात्रा (Quantity Supplied):-

पूर्ति की मात्रा से अभिप्राय किसी वस्तु की उस विशेष मात्रा से है जो एक निश्चित समय में एक निश्चित कीमत पर बिक्री के लिये प्रस्तुत की जाती है।

परिभाषा ( Definition):- 

  • एनातोल मुराद के अनुसार, “किसी वस्तु की पूर्ति की मात्रा से अभिप्राय वस्तु की उस मात्रा से है जिसे उस वस्तु का विक्रेता एक निश्चित कीमत पर एक निश्चित बाजार में निश्चित समय पर बेचने के लिए तैयार हैं।”

(The quantity supplied refers to the quantity of a commodity offered for sale at a given price in a given market at a given time. — Anatol Murad ) 

पूर्ति (Supply):-

इसके विपरीत पूर्ति से अभिप्राय किसी वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं से है जो एक निश्चित समय में विभिन्न कीमतों पर बिक्री के लिये प्रस्तुत की जाती है।

परिभाषा ( Definition):- 

  • पार्किंग के अनुसार, “पूर्ति की धारणा से अभिप्राय किसी वस्तु की कीमत तथा पूर्ति की जाने वाली मात्रा में पाए जाने वाले कुल संबंध से है । “

(The term supply refers to the entire relationship between the quantity supplied of a goods and its prices. -Parking)

2.व्यक्तिगत पूर्ति तथा बाजार पूर्ति( Individual Supply and Market Supply):- 

व्यक्तिगत पूर्ति से अभिप्राय है किसी वस्तु की एक फर्म द्वारा बाजार में की गई पूर्ति ।

बाजार पूर्ति से अभिप्राय है किसी वस्तु की वाजार में उन सभी फर्मों द्वारा की गई पूर्ति जो उस वस्तु का उत्पादन या विक्री करती हैं।

उदाहरण के लिए, यदि किसी निश्चित कीमत पर फर्म ‘A’ किसी वस्तु की 100 इकाइयों की पूर्ति करती है तथा फर्म ‘B’ 200 इकाइयों की पूर्ति करती है तथा बाजार में केवल ये दो फर्में उस वस्तु का उत्पादन करती हैं तो बाजार पूर्ति (उद्योग पूर्ति) 300 इकाइयाँ होगी ।

3.पूर्ति अनुसूची(Supply Schedule):-

पूर्ति अनुसूची वह तालिका है जो किसी वस्तु की विभिन्न संभव कीमतों पर बिक्री के लिए प्रस्तुत की जाने वाली पूर्ति की विभिन्न मात्राओं को प्रकट करती है। यह दी प्रकार की होती है : (i) व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची तथा (ii) बाजार पूर्ति अनुसूची ।

3.1 व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची (Individual Supply Schedule):-

व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची से अभिप्राय बाजार में किसी एक फर्म की पूर्ति अनुसूची से है । व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची एक फर्म द्वारा विभिन्न कीमतों पर की जाने वाली पूर्ति को प्रकट करती है । तालिका 1 व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची है।

                                                                                   तालिका 1. व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची 

आइसक्रीम की कीमत (₹) मात्रा (इकाइयाँ)
5 0
10 10
15 20
20 30

 

तालिका 1 से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे वस्तु की कीमत बढ़ रही है उसकी पूर्ति भी बढ़ रही है। ₹5 प्रति इकाई कीमत पर उत्पादक आइसक्रीम की कोई मात्रा बेचने को तैयार नहीं होगा। जब कीमत 10 है तो आइसक्रीम की पूर्ति 10 इकाइयाँ होगी तथा इसी प्रकार कीमत ₹ 20 होने पर आइसक्रीम की पूर्ति बढ़कर 30 इकाइयाँ हो जायेगी । अतएव व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूची वह अनुसूची है जो अन्य वातें समान रहने पर एक फर्म द्वारा किसी वस्तु की कीमत तथा वेची जाने वाली मात्रा के संबंध को प्रकट करती है।

3.2 बाजार पूर्ति अनुसूची (Market Supply Schedule):-

बाजार पूर्ति अनुसूची से अभिप्राय बाजार में किसी विशेष वस्तु का उत्पादन या पूर्ति करने वाली सभी फर्मों की पूर्ति के जोड़ से है। किसी वस्तु का उत्पादन करने वाली सभी फर्मों के जोड़ को उद्योग कहते हैं । अतएव बाजार पूर्ति अनुसूची समस्त उद्योग की पूर्ति अनुसूची होती है। इसके द्वारा बाजार में विभिन्न कीमतों पर सभी फर्मों की किसी विशेष वस्तु की कुल पूर्ति प्रकट होती है ।

इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिये किसी बाजार में A तथा B दो फर्में हैं जो वस्तु X का उत्पादन करती हैं। इन फर्मों की व्यक्तिगत पूर्ति अनुसूचियों को जोड़ कर बाजार पूर्ति अनुसूची बनाई गई है। बाजार पूर्ति अनुसूची निम्नलिखित है:

तालिका 2. बाजार पूर्ति अनुसूची (Market Supply Schedule) 

आइसक्रीम की कीमत (₹) फर्म A द्वारा की गई पूर्ति फर्म B द्वारा की गई पूर्ति बाजार पूर्ति

 

5 0 0 0
10 10 5 15
15 20 10 30
20 30 20 50

 

तालिका 2 से ज्ञात होता है कि जब आइसक्रीम की कीमत ₹5 है तो फर्में आइसक्रीम की पूर्ति नहीं करेंगी। परंतु जब कीमत बढ़कर ₹ 10 हो जाती है तो फर्म ‘A’ आइसक्रीम की 10 इकाइयों तथा फर्म ‘B’ 5 इकाइयों की पूर्ति करती है। अतएव ₹10 कीमत पर बाजार पूर्ति 10 इकाइयाँ + 5 इकाइयाँ = 15 इकाइयाँ हो जाती है। जैसे-जैसे कीमत बढ़ती जाती है बाजार पूर्ति भी बढ़ती जाती है।

4.पूर्ति वक्र(Supply Curve):-

पूर्ति वक्र पूर्ति अनुसूची को आलेख (ग्राफ) के रूप में प्रकट करता है। इसके द्वारा किसी वस्तु की कीमत तथा पूर्ति की मात्रा में धनात्मक संबंध प्रकट होता है ।

( Supply curve is the graphic presentation of supply schedule indicating positive relationship between price of a commodity and quantity supplied.)

पूर्ति अनुसूची की तरह यह भी दो प्रकार की होती है :-

(i) व्यक्तिगत पूर्ति वक्र तथा (ii) बाजार पूर्ति वक्र ।

4.1 व्यक्तिगत पूर्ति वक्र (Individual Supply Curve):-

व्यक्तिगत पूर्ति वक्र बाजार में एक फर्म की पूर्ति अनुसूची का ग्राफिक प्रस्तुतीकरण है। इस वक्र के नीचे से ऊपर की ओर ढलान से ज्ञात होता है कि वस्तु की कीमत तथा उसकी पूर्ति में धनात्मक संबंध है।

चित्र 1 में व्यक्तिगत पूर्ति वक्र प्रकट किया गया है। पूर्ति तालिका 1 के आधार पर यह पूर्ति वक्र बनाया गया है। चित्र 1 में SS पूर्ति वक्र है जो बायें से दायें ऊपर को जा रहा है। SS पूर्ति वक्र के धनात्मक ढलान (Positive Slope) से ज्ञात होता है कि कीमत के बढ़ने पर पूर्ति बढ़ती है। इस चित्र से ज्ञात होता है कि यदि कीमत ₹5 या इससे कम होगी तो विक्रेता वस्तु बेचने को तैयार नहीं होगा। जिस कीमत से नीचे विक्रेता वस्तु को बेचने को तैयार नहीं होता उसे सुरक्षित कीमत (Reserve Price) अथवा न्यूनतम पूर्ति कीमत कहते हैं।

Figure―1

पूर्ति वक्र (SS) का ढलान ऊपर की ओर है। यह प्रकट करता है कि ऊँची कीमत पर वस्तु की अधिक मात्रा की पूर्ति की जाती है। सरलता की दृष्टि से इसे एक सरल रेखा के रूप में खींचा गया है।

बाजार पूर्ति वक्र (Market Supply Curve):-

वक्र वाजार पूर्ति अनुसची का ग्राफिक प्रस्तुकीकरण है। यह संपूर्ण उद्योग का पूर्ति वक्र है। उद्योग की सभी फर्मों के पूर्ति वक्रों के समस्तर जोड़ द्वारा बाजार पूर्ति वक्र ज्ञात की जाती है। चित्र 2 में बाजार पूर्ति वक्र को प्रकट किया गया है।

Figure-2

 

बाजार पूर्ति वक्र व्यक्तिगत पूर्ति वक्रों का समस्तरीय जोड़ होता है। यह किसी वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं को प्रकट करता है जो सभी फर्मे उस वस्तु की विभिन्न संभव कीमतों पर बेचने के लिए तैयार होती हैं।

चित्र 2 (A) तथा 2(B) व्यक्तिगत पूर्ति वक्र को प्रकट करता है। चित्र 2(C) बाजार पूर्ति वक्र को प्रकट कर रहा है। यह व्यक्तिगत पूर्ति वक्रों के समस्तरीय जोड़ से बनाया गया है। इससे ज्ञात होता है कि जब कीमत ₹10 है तो बाजार पूर्ति (10 + 5 = 15) 15 इकाइयाँ है, जब कीमत ₹ 15 है तो बाजार पूर्ति (20 + 10 = 30 ) 30 इकाइयाँ है । जब कीमत बढ़कर ₹20 हो जाती है तो बाजार पूर्ति (30 + 20 = 50 ) 50 इकाइयाँ है । बाजार पूर्ति वक्र बाजार में किसी एक वस्तु का उत्पादन करने वाली सभी फर्मों के पूर्ति वक्रों का समस्तरीय जोड़ है।

5.पूर्ति फलन या पूर्ति के निर्धारक तत्त्व(Supply Function or Determinants of Supply):-

पूर्ति फलन किसी स्तु की पूर्ति तथा उसके निर्धारक तत्वों के संबंध को प्रकट करता है। इससे प्रकट होता है कि किसी वस्तु की पूर्ति मुख्य रूप से फर्म के उद्देश्य, वस्तु की कीमत, फर्मों की संख्या, उत्पादन के साधनों की कीमतों, तकनीक की स्थिति तथा संभावित कीमतों आदि पर निर्भर करती है । पूर्ति के फलन को निम्नलिखित समीकरण के रूप में भी स्पष्ट किया जा सकता है:-

Sx = f (Px, Po,Pf,Gp G,Nf T, Ex,) 

(यहाँ, Sx = वस्तु-X की पूर्ति; f = फलन; P = वस्तु – X की अपनी कीमत ; Po = अन्य वस्तुओं की कीमत N = फर्मों की संख्या; G = फर्मों का उद्देश्य; PF = उत्पादन के साधनों की कीमत ; T = तकनीक; Ex = भविष्य में कीमत संभावना; Gp सरकारी नीति

() वस्तु की अपनी कीमत (Own Price of the Commodity):-

किसी वस्तु की अपनी कीमत तथा पूर्ति में प्रत्यक्ष संबंध होता है। सामान्यतः किसी वस्तु की अपनी कीमत बढ़ने से पूर्ति बढ़ती है तथा अपनी कीमत कम होने से पूर्ति कम होती है।

(2) अन्य सभी वस्तुओं की कीमतें (Prices of all other Goods):-

किसी वस्तु की पूर्ति अन्य सभी वस्तुओं की कीमतों पर भी निर्भर करती है। अन्य सभी वस्तुओं की कीमत में होने वाली वृद्धि के फलस्वरूप वे फर्मों के लिए अधिक लाभदायक हो जायेंगी। इसके फलस्वरूप फर्में उनकी अधिक पूर्ति करेंगी। इसके विपरीत जिस वस्तु की कीमत में वृद्धि नहीं होती वह अपेक्षाकृत कम लाभदायक होगी। इसलिए फर्म उसकी पूर्ति कम करेगी।

(3) फर्मों की संख्या (Number of Firms):-

किसी वस्तु की बाजार पूर्ति फर्मों की संख्या पर भी निर्भर करती है। फर्मों की संख्या अधिक होने पर पूर्ति अधिक होती है। इसके विपरीत फर्मों की संख्या कम होने पर पूर्ति कम हो जाती है।

(4) फर्म के उद्देश्य (Goal of the Firms):-

यदि फर्म का उद्देश्य लाभ को अधिकतम करना है तो केवल अधिक कीमत पर ही धिक पूर्ति की जाएगी। इसके विपरीत यदि फर्म का उद्देश्य बिक्री या उत्पादन या रोजगार को अधिकतम करना है तो वर्तमान कीमत पर भी अधिक पूर्ति की जायेगी।

(5) उत्पादन के साधनों की कीमत (Price of Factors of Production):-

वस्तुओं की पूर्ति पर उत्पादन के उन साधनों की कीमत का भी प्रभाव पड़ता है जिनका प्रयोग उनके उत्पादन के लिये किया जाता है । उत्पादन के साधनों की कीमत कम होने पर उत्पादन की लागत कम हो जाती है तथा पूर्ति में वृद्धि होती है। इसके विपरीत उत्पादन के साधनों की कीमत में वृद्धि होने पर उत्पादन लागत बढ़ जाती है तथा पूर्ति में कमी होती है ।

(6)तकनीक में परिवर्तन (Change in Technology):-

उत्पादन की तकनीक में परिवर्तन होने का भी पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है। उत्पादन तकनीक में सुधार होने के फलस्वरूप प्रति इकाई उत्पादन लागत में कमी होती है तथा लाभ में वृद्धि होती है। इसके फलस्वरूप पूर्ति में वृद्धि होती है।

(7) भविष्य में संभावित कीमत (Expected Future Price):-

भविष्य में वस्तु की कीमत में होने वाले परिवर्तन की संभावना का पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है।यदि भविष्य में वस्तु की कीमत बढ़ने की संभावना हो तो वर्तमान पूर्ति घट जाती है। इसके विपरीत यदि भविष्य में कीमत घटने की संभावना हो तो वर्तमान पूर्ति बढ़ जाती है।

(8) सरकारी नीति (Government Policy):-

सरकार की कर तथा अनुदान ( Subsidies) संबंधी नीतियों का वस्तु की बाजार पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है । अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि होने के फलस्वरूप सामान्यतः पूर्ति कम होती है। इसके विपरीत अनुदानों के कारण पूर्ति में वृद्धि होती है।

6.पूर्ति का नियम(Law of Supply):-

पूर्ति के नियम से ज्ञात होता है कि ‘अन्य बातें समान रहने पर किसी वस्तु की अपनी कीमत तथा उसकी पूर्ति में धनात्मक संबंध है। पूर्ति के नियम के अनुसार, अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की अपनी कीमत बढ़ने पर पूर्ति बढ़ जाती है तथा अपनी कीमत कम होने पर पूर्ति भी कम हो जाती है।

परिभाषा ( Definition):-

  • डूले के अनुसार, “पूर्ति का नियम यह बतलाता है कि अन्य बातें समान रहने पर जितनी कीमत अधिक होती है उतनी ही पूर्ति अधिक होती है या जितनी कीमत कम होती है उतनी ही पूर्ति कम होती है।

” (The law of supply states, that other things being equal, the higher the price, the greater the quantity supplied or the lower the price, the smaller the quantity supplied. —Dooley)

6.1 पूर्ति के नियम की व्याख्या (Explanation of the Law of Supply) 

इस नियम की व्याख्या तालिका 3 तथा चित्र 3 की सहायता से की जा सकती है:

तालिका 3. पूर्ति अनुसूची ( Supply Schedule) 

कीमत (Px) (₹) पूर्ति (Sx) (इकाइयाँ)
10 100
11 200
12 300

 

पूर्ति तालिका से ज्ञात होता है कि जब कीमत ₹10 से बढ़कर ₹11 हो जाती है तो पूर्ति 100 इकाइयों से बढ़कर 200 इकाइयाँ हो जाती है। चित्र 3 में पूर्ति वक्र SS के ऊपर की ओर ढलान से ज्ञात होता है कि वस्तु की कीमत बढ़ने पर पूर्ति भी बढ़ रही है। जब कीमत OP से बढ़कर OP, हो जाती है तो पूर्ति OL से बढ़कर OL, हो जाती है।

Figure-

SS वक्र का ढलान बाएँ से दाएँ ऊपर की ओर होता है। यह वस्तु की अपनी कीमत तथा पूर्ति की गई मात्रा में धनात्मक संबंध को दर्शाता है: जैसे-जैसे कीमत बढ़ती है पूर्ति की गई मात्रा भी बढ़ती है।

6.2 पूर्ति के नियम की मान्यताएँ (Assumptions of the Law of Supply)

पूर्ति के नियम की मुख्य मान्यताएँ निम्नलिखित हैं:-

(1) उत्पादन के कारकों की पूर्ति तथा कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता।

(2) उत्पादन की तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होता ।

(3) फर्म के उद्देश्य (Goal) में परिवर्तन नहीं होता ।

(4) अन्य वस्तुओं की कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता ।

(5) भविष्य में वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने की संभावना नहीं है।

6.3 पूर्ति के नियम के अपवाद (Exceptions to the Law of Supply):-

वस्तु की पूर्ति की मात्रा तथा कीमत के बीच धनात्मक संबंध निम्नलिखित स्थितियों के अंतर्गत सही नहीं हो सकताः

(1) प्राकृतिक तत्वों पर आधारित कृषि उत्पादित वस्तुओं पर यह नियम दृढ़ता से लागू नहीं होता। गेहूँ की कीमत बढ़ने पर भी उसकी पूर्ति कम रह सकती है यदि प्राकृतिक प्रकोपों के कारण गेहूँ का उत्पादन ही सीमित हुआ हो।

(2) कुछ सामाजिक प्रतिष्ठा की वस्तुओं की अधिक कीमत मिलने पर भी उनकी सीमित मात्रा में ही पूर्ति की जाती है ।

(3) नाशवान वस्तुओं की कीमतें कम होने पर भी विक्रेता उनकी अधिक मात्रा बेचने का प्रयत्न करते हैं।

ध्यान देने योग्य वात पूर्ति के नियम की पूर्व धारणाओं से अभिप्राय वस्तु की अपनी कीमत के अतिरिक्त उन सभी निर्धारक तत्वों से है जो पूर्ति को निर्धारित करते हैं। अन्य सभी निर्धारक तत्वों को स्थिर मान लिया जाता है।

7.पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन तथा पूर्ति में परिवर्तन(Change in Quantity Supplied and Change in the Supply):-

अन्य बातें समान रहने पर, पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन से अभिप्राय किसी स्तु की अपनी कीमत में वृद्धि या कमी के फलस्वरूप उस वस्तु की मात्रा में वृद्धि या कमी से है। इसे पूर्ति वक्र पर संचलन के रूप में व्यक्त किया जाता है।

इसके विपरीत पूर्ति में परिवर्तन से अभिप्राय, वस्तु की अपनी कीमत के अतिरिक्त, पूर्ति के अन्य निर्धारक तत्त्वों में परिवर्तन के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में होने वाली वृद्धि या कमी से है । इसे पूर्ति वक्र के खिसकाव के रूप में व्यक्त किया जाता है- आगे की ओर खिसकाव ( Forward Shift) या पीछे की ओर खिसकाव (Backward Shift ) ।

(1) पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन (Change in Quantity Supplied ):-

जब वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप, इसकी पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन होता है, इसे पूर्ति वक्र के विभिन्न बिंदुओं पर व्यक्त किया जाता है इसे पूर्ति वक्र पर संचलन (Movement along a Supply Curve) या पूर्ति की मात्रा में परिवर्तन भी कहा जाता है। वस्तु की अपनी कीमत में वृद्धि के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में वृद्धि पूर्ति का विस्तार (Extension of Supply) कहलाता है और वस्तु की अपनी कीमत में कमी के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में कमी पूर्ति का संकुचन (Contraction of Supply) कहलाता है।

(2) पूर्ति में परिवर्तन (Change in Supply):-

इस स्थिति में नया पूर्ति वक्र प्रारंभिक पूर्ति वक्र के बाईं ओर ऊपर या दाईं ओर नीचे खिसक जाता है। पूर्ति वक्र का खिसकाव किसी वस्तु की अपनी कीमत स्थिर रहने पर उसकी पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य तत्त्वों (जैसे तकनीक में परिवर्तन अथवा साधन – कीमत में परिवर्तन) में परिवर्तन होने के फलस्वरूप उत्पन्न होता है । यह परिवर्तन पूर्ति के स्तर में परिवर्तन कहलाता है। इसके फलस्वरूप पूर्ति वक्र बाईं या दाईं ओर खिसक जाता है। इस प्रकार के परिवर्तनों को पूर्ति में वृद्धि (Increase in Supply) या पूर्ति में कमी (Decrease in Supply) कहा जाता है । यह कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्वों में परिवर्तन के कारण होता है ।

7.1 पूर्ति का विस्तार तथा संकुचन अथवा पूर्ति की गई मात्रा में परिवर्तन 

(Extension and Contraction of Supply or Change in Quantity Supplied) 

(1) पूर्ति का विस्तार (Extension of Supply):-

अन्य बातें समान’ रहने पर जब किसी वस्तु की अपनी कीमत बढ़ने के फलस्वरूप उसकी पूर्ति अधिक हो जाती है तो इस बढ़ी हुई पूर्ति को पूर्ति का विस्तार कहा जाता है। (Other things being equal, when quantity supplied of a commodity increases due to rise in its own price, it is called extension of supply.)

पूर्ति के विस्तार को तालिका 4 तथा चित्र 4 की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है।

                                                                            तालिका 4. पूर्ति का विस्तार (Expansion of Supply)  

कीमत पूर्ति की मात्रा वर्णन
1 1 कीमत में वृद्धि
5 5 पूर्ति की मात्रा का विस्तार

 

पूर्ति के विस्तार की पूर्ति वक्र पर बिंदु A से B तक संचलन द्वारा दिखाया गया है। वस्तु की कीमत में वृद्धि के फलस्वरूप अधिक पूर्ति की जाती है।

तालिका 4 से ज्ञात होता है कि जब आइसक्रीम की कीमत ₹1 है तो एक आइसक्रीम की पूर्ति की जाती है। यदि कीमत बढ़कर ₹ 5 हो जाती है तो पूर्ति का विस्तार होकर 5 हो जाता है । पूर्ति के विस्तार को चित्र 4 द्वारा प्रकट किया जा सकता है। SS आइसक्रीम की पूर्ति वक्र है। जब आइसक्रीम की कीमत ₹ 1 है तो उसकी पूर्ति एक है। उत्पादक पूर्ति वक्र के A बिंदु पर है। जब आइसक्रीम की कीमत बढ़कर ₹ 5 हो जाती है तो उसकी पूर्ति का विस्तार होकर 5 हो जाता है । उत्पादक पूर्ति वक्र के A बिंदु से B बिंदु पर पहुँच जाता है। अतएव एक पूर्ति वक्र के नीचे बिंदु से ऊँचे बिंदु पर पहुँचना पूर्ति के विस्तार को प्रकट करता है।

(2) पूर्ति का संकुचन (Contraction of Supply) 

‘अन्य बातें समान’ रहने पर जब किसी वस्तु की अपनी कीमत के कम होने के फलस्वरूप उसकी पूर्ति कम हो जाती है तो पूर्ति में होने वाली कमी को पूर्ति का संकुचन कहते हैं। (Other things being equal, when quantity supplied of a commodity decreases due to fall in its own price, it is called contraction of supply) पूर्ति के संकुचन को तालिका 5 तथा चित्र 5 की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है।

                                                                                            तालिका 5. पूर्ति का संकुचन 

कीमत पूर्ति की मात्रा वर्णन
5 5 कीमत में कमी
1 11 पूर्ति की मात्रा का संकुचन

 

पूर्ति के संकुचन को पूर्ति वक्र पर बिंदु B से A तक संचलन द्वारा दिखाया गया है। वस्तु की कीमत में कमी के फलस्वरूप कम पूर्ति की जाती है।

तालिका 5 से ज्ञात होता है कि जब आइसक्रीम की कीमत ₹5 है तो 5 आइसक्रीम की पूर्ति की जाती है। यदि आइसक्रीम की कीमत कम होकर ₹ 1 हो जाती है तो आइसक्रीम की पूर्ति का संकुचन होकर 1 हो जाता है । पूर्ति के संकुचन को चित्र 5 द्वारा प्रकट किया जा सकता है। SS आइसक्रीम का पूर्ति वक्र है। जब आइसक्रीम की कीमत ₹5 है तो उसकी पूर्ति 5 है। उत्पादक पूर्ति वक्र के B बिंदु पर है। इसके विपरीत जब आइसक्रीम की कीमत कम होकर ₹1 हो जाती है तो उसकी पूर्ति का संकुचन होकर 1 हो जाता है। उत्पादक पूर्ति वक्र के B बिंदु से A बिंदु पर पहुँच जाता है। अतएव एक पूर्ति वक्र के ऊँचे बिंदु से नीचे बिंदु पर पहुँचना पूर्ति के संकुचन को प्रकट करता है।

ऊँची कीमत पर अधिक पूर्ति क्यों ? (Why more of a Commodity is Offered at a Higher Price) 

ऊँची कीमत पर वस्तु की अधिक पूर्ति के दो कारण हैं:-

(i) अन्य बातें समान रहने पर, ऊँची कीमत का अर्थ ऊँचा लाभ है। तदनुसार, उत्पादक अधिक उत्पादन करने तथा अधिक मात्रा बेचने के लिए प्रोत्साहित होता है।

(ii) अधिक पूर्ति के लिए, अधिक उत्पादन  प्रायः घटते प्रतिफल नियम के अंतर्गत किया जाता है। जिसका अर्थ उत्पादन के बढ़ने पर सीमांत लागत (MC) का बढ़ना है। तदनुसार कीमत भी बढ़ेगी यदि अधिक पूर्ति के लिए उत्पादन को बढ़ाया जाता है। 

7.2 पूर्ति में वृद्धि तथा पूर्ति में कमी अथवा पूर्ति में परिवर्तन 

(Increase in Supply and Decrease in Supply or Change in Supply) 

जब किसी वस्तु की अपनी कीमत के अतिरिक्त दूसरे तत्वों जैसे आशंसाओं (Expectations), तकनीक या फर्म के लक्ष्य में परिवर्तन होने के कारण उसकी पूर्ति में परिवर्तन होता है तो उसे पूर्ति की वृद्धि या कमी कहते हैं। पूर्ति में वृद्धि या कमी पूर्ति वक्र के नीचे या ऊपर की ओर खिसकाव के द्वारा प्रकट की जाती है।

(1) पूर्ति में वृद्धि (Increase in Supply):-

वस्तु की अपनी कीमत समान रहने पर यदि किसी वस्तु की पूर्ति बढ़ जाती है अथवा अपनी कीमत कम होने पर पूर्ति समान रहती है तो इस परिवर्तन को पूर्ति में वृद्धि कहा जाता है। (More supply at same price or same supply at less price is called increase in supply)

 पूर्ति में वृद्धि दो प्रकार से हो सकती है:-

(A) समान कीमत अधिक पूर्ति (Same Price More Supply):-

तालिका 6(A) में, मान लीजिए जब आइसक्रीम की कीमत ₹3 है तो आइसक्रीम की पूर्ति 3 है। यदि आइसक्रीम की कीमत ₹ 3 ही रहे परंतु पूर्ति बढ़कर 4 हो जाए तो इसे पूर्ति में वृद्धि कहा जाएगा।

 (B) कम कीमत पर समान पूर्ति (Less Price Same Supply):-

तालिका 6(B) में, जब आइसक्रीम की कीमत 3 है तो पूर्ति 3 है। यदि मूल्य कम होकर ₹ 2 हो जाए परंतु पूर्ति में कोई कमी न आए, अर्थात् वह 3 ही रहे, तो इसे भी पूर्ति में वृद्धि कहा जाएगा।

                                                                                  तालिका 6. पूर्ति में वृद्धि (Increase in Supply) 

आइसक्रीम की कीमत (₹) पूर्ति की मात्रा (इकाइयाँ)
समान कीमत

3

3

अधिक पूर्ति

3

4

कम कीमत

3

2

समान पूर्ति

3

3

पूर्ति में होने वाली वृद्धि को चित्र 6 से स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए SS प्रारंभिक पूर्ति वक्र है। जब आइसक्रीम की कीमत 3 है तो आइसक्रीम की पूर्ति भी 3 है । उत्पादक SS, पूर्ति वक्र के A बिंदु पर है । पूर्ति को प्रभावित करने वाले कीमत के अतिरिक्त अन्य तत्वों में परिवर्तन होने के कारण पूर्ति वक्र SS, दो कारणों से दायीं ओर या नीचे की ओर खिसक कर S,S, हो जाएगा । इस नये पूर्ति वक्र के (i) बिंदु B से ज्ञात होता है कि आइसक्रीम की पूर्ति 3 से बढ़कर 4 हो गई है। (ii) बिंदु C से ज्ञात होता है कि आइसक्रीम की कीमत कम होकर ₹ 2 हो जाती है परंतु पूर्ति पहले जितनी अर्थात् 3 ही रहती है। नया पूर्ति वक्र S2S 2 पूर्ति में वृद्धि कोप्रकट कर रहा है।

Figure-6

₹ 3 की वर्तमान कीमत पर वस्तु की पूर्ति की गई मात्रा 3 इकाइयों से बढ़कर 4 इकाइयाँ हो जाती है। इसके फलस्वरूप पूर्ति वक्र का खिसकाव S1 S1 से S2 S2 जाता है। उत्पादक पुराने पूर्ति वक्र के A बिंदु से खिसक कर नये पूर्ति वक्र के बिंदु B पर पहुँच जाता है। दूसरी स्थिति में, कीमत के ₹3 से कम होकर ₹ 2 होने पर पूर्ति समान रहती है और उत्पादक पुराने पूर्ति वक्र के S1 S1 के बिंदु A से खिसककर नये पूर्ति वक्र S2 S2 बिंदु C पर पहुँच जाता है।

पूर्ति में वृद्धि के कारण (Causes of Increase in Supply) 

(i) जब तकनीकी प्रगति होती है।

(ii) जब उत्पादन साधनों की कीमतों में कमी जिसके कारण उत्पादन की लागत में कमी होती है।

(iii) जब प्रतियोगी वस्तुओं की कीमतों में कमी होती है।

(ix) जब बाजार में फर्मों की संख्या में वृद्धि होती है ।

(v) जब फर्मों को भविष्य में कीमतों के कम होने की संभावना होती है।

(vi) जब फर्म का उद्देश्य लाभ को अधिकतम करने के स्थान पर बिक्री को अधिकतम करना होता है।

(vii) अनुदानों में वृद्धि 

(viii) करों में कमी।

(2) पूर्ति में कमी (Decrease in Supply) 

वस्तु की अपनी कीमत समान रहने पर यदि किसी वस्तु की पूर्ति कम हो जाती है अथवा अपनी कीमत बढ़ने पर भी पूर्ति समान रहती है तो इस परिवर्तन को पूर्ति में कमी कहा जाता है। (Less supply at same price and same supply at more price is called decrease in supply . )

पूर्ति में दो प्रकार से कमी हो सकती है:

(A) समान कीमत कम पूर्ति (Same Price Less Supply):-

तालिका 7(A) में, मान लीजिए जब आइसक्रीम की कीमत ₹3 है तो 3 आइसक्रीमों की पूर्ति की जाती है। यदि कीमत ₹3 ही रहे परंतु पूर्ति कम होकर 2 हो जाए तो इसे पूर्ति में कमी कहा जाएगा।

  (B) अधिक कीमत समान पूर्ति (More Price Same Supply):-

तालिका 7 (B) में, जब आइसक्रीम की कीमत ₹3 है तो पूर्ति 3 है। यदि कीमत बढ़कर ₹4 हो जाए परंतु पूर्ति पहले जितनी ही अर्थात् 3 रहे तो इसे पूर्ति में कमी कहा जाएगा।

                                                                                   तालिका 7. पूर्ति में कमी (Decrease in Supply) 

आइसक्रीम की कीमत (₹) पूर्ति की मात्रा (इकाइयाँ)
समान कीमत

3

3

कम पूर्ति

3

2

कीमत में वृद्धि

3

4

समान पूर्ति

3

3

 

पूर्ति में होने वाली कमी को चित्र 7 से स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिए SS, प्रारंभिक पूर्ति वक्र है। जब आइसक्रीम की कीमत ₹ 3 है तो आइसक्रीम की पूर्ति 3 है । उत्पादक SS, पूर्ति वक्र के A बिंदु पर है। पूर्ति को प्रभावित करने वाले अन्य तत्त्वों में परिवर्तन होने के कारण पूर्ति वक्र दो कारणों से बाईं ओर या ऊपर की ओर सरक कर S2 S2 हो जाएगी। इस नई पूर्ति वक्र के (i) बिंदु F से ज्ञात होता है कि आइसक्रीम की कीमत ₹ 3 रहने पर पूर्ति 3 से कम होकर 2 हो गई है (ii) बिंदु G से ज्ञात होता है कि जब आइसक्रीम की कीमत बढ़कर ₹4 हो जाती है तो भी पूर्ति पहले के बराबर अर्थात् 3 ही रहती है। नया पूर्ति वक्र S2S 2 पूर्ति में होने वाली कमी को प्रकट करता है।

₹ 3 की वर्तमान कीमत पर वस्तु की पूर्ति की गई मात्रा 3 इकाइयों से कम होकर 2 इकाइयाँ हो जाती है। इसके फलस्वरूप पूर्ति वक्र का खिसकाव S1 S1 से S2S2 हो जाता है। उत्पादक पुराने पूर्ति वक्र के A बिंदु से खिसक कर नये पूर्ति वक्र के बिंदु B पर पहुँच जाता है। दूसरी स्थिति में, कीमत के ₹3 से बढ़कर ₹4 होने पर पूर्ति समान रहती है और उत्पादक पुराने पूर्ति वक्र SS 1 के बिंदु A से खिसककर नये पूर्ति वक्र S2 S2 के बिंदु C पर पहुँच जाता है।

पूर्ति में कमी के कारण (Causes of Decrease in Supply) 

(i) जब तकनीक के पुराने पड़ जाने के कारण उत्पादन लागत में वृद्धि हो जाती है।

(ii) जब उत्पादन कारकों की कीमत में वृद्धि के फलस्वरूप उत्पादन लागत में वृद्धि होती है।

(iii) जब प्रतियोगी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो जाती है।

(iv) जब बाजार में फर्मों की संख्या में कमी हो जाती है।

(v) जब फर्म निकट भविष्य में कीमतों के बढ़ने की संभावना का अनुमान लगाती है।

(vi) जब फर्म का उद्देश्य बिक्री को अधिकतम करने के स्थान पर लाभ को अधिकतम करना होता है।

(vii) अनुदानों में कमी 

(viii) करों में वृद्धि

7.3 पूर्ति वक्र का खिसकाव (Shift in Supply Curve):-

संक्षेप में, पूर्ति में होने वाली वृद्धि तथा कमी को चित्र 8 द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। पूर्ति वक्र का दायीं ओर खिसकाव पूर्ति में वृद्धि को प्रकट करता है। इसके विपरीत पूर्ति वक्र का बाई ओर खिसकाव पूर्ति वक्र की कमी को प्रकट करता है। चित्र 8 में SS आरंभिक पूर्ति वक्र है। इस पूर्ति वक्र का दायीं ओर खिसक कर S1S1 हो जाना पूर्ति में वृद्धि को प्रकट करता है क्योंकि OP कीमत पर पूर्ति OQ से बढ़कर OQ1 हो गई है। पूर्ति वक्र का बाईं ओर खिसक कर S2 S2 हो जाना पूर्ति में कमी को प्रकट करता है। क्योंकि OP कीमत पर पूर्ति OQ से कम होकर OQ2 हो गई है।

Figure-8

 

कीमत के स्थिर रहने पर, पूर्ति में वृद्धि होने पर आरंभिक पूर्ति वक्र SS खिसककर S,S, हो जाता है। तथा पूर्ति में कमी होने

पर आरंभिक पूर्ति वक्र SS खिसककर S2S2 हो जाती है।

7.4 प्रौद्योगिकी/ तकनीक में परिवर्तन पूर्ति वक्र को कैसे प्रभावित करता है

(How does change in Technology affect Supply Curve?) 

प्रौद्योगिकी या तकनीक में सुधार होने से उत्पादन की सीमांत तथा औसत लागत घटती है। क्योंकि पहले से कम साधन लगा कर अधिक मात्रा में उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

अतः उत्पादक प्रचलित कीमत पर अधिक पूर्ति करने के लिये तैयार हो जाएँगे । फलस्वरूप पूर्ति वक्र आगे को (दाईं ओर) खिसक जाएगा, जैसा कि चित्र 9 में दिखाया गया है।

Figure-9

जब प्रौद्योगिकी में सुधार होता है, कारकों की उत्पादकता (कारक का प्रति इकाई उत्पादन) बढ़ती है। इसका अर्थ है MC तथा AC में गिरावट का आना। इसके अनुसार पूर्ति वक्र दाईं ओर खिसक जाता है जो यह प्रकट करता है कि उत्पादक अब वर्तमान कीमत पर अधिक मात्रा देने के लिए तैयार हैं। अतएव जब कीमत OP बनी रहती है, पूर्ति की गई मात्रा बढ़कर PK से PT हो जाती है।

आरंभ में OP कीमत पर PK मात्रा की पूर्ति की जाती थी। तकनीकी सुधार के (परिणामस्वरूप उत्पादन की लागत में कमी होने पर) समान कीमत पर PT मात्रा की पूर्ति होने लगती है। यह पूर्ति में वृद्धि की स्थिति है।

7.5 आगतों की कीमतों में परिवर्तन पूर्ति वक्र को कैसे प्रभावित करता है

(How does change in Input Prices affect Supply Curve?) 

आगतों (साधनों) की कीमतों में वृद्धि अथवा कमी हो सकती है। आगतों की कीमतों में वृद्धि के फलस्वरूप सीमांत (तथा औसत) लागत बढ़ती है। अतः उत्पादक प्रचलित कीमत पर कम पूर्ति करते हैं। पूर्ति वक्र पीछे को (बायीं ओर) खिसक जाता है। इसके विपरीत, यदि आगतों की कीमत गिर जाती है तो सीमांत (तथा औसत) लागत घट जाती है। परिणामस्वरूप उत्पादक वर्ग प्रचलित कीमत पर अधिक पूर्ति करने लगते हैं। इस स्थिति में पूर्ति वक्र आगे को (दायीं ओर) खिसक जाता है, अर्थात पूर्ति बढ़ जाती है। चित्र 10 में इसे दिखाया गया है। S1 S1 आरंभिक पूर्ति वक्र है। जब आगतों की कीमतें बढ़ती है तब यह पीछे को खिसक कर S3 S3 बन जाता है। जब आगतों की कीमतें गिर जाती हैं तब पूर्ति वक्र आगे को खिसक कर S2 S2  बन जाता है।

Figure-10

7.6 उत्पादन कर तथा पूर्ति वक्र (Excise Tax and Supply Curve

Supply curve shifts forward in case of decrease in input price and the consequent decrease in production cost.

Supply curve shifts backward in case of increase in the input price and the consequent increase in production cost.

आरंभ में, यह मान लिया जाता है कि उत्पादक बिंदु K पर है और वस्तु की OP कीमत पर वह PK मात्रा की पूर्ति कर रहा है। आगत कीमत में कमी के कारण पूर्ति वक्र में आगे की ओर खिसकाव होता है। जिसके अनुसार, उत्पादक S1 S1 वक्र पर बिंदु K से खिसक कर S2 S2 के बिंदु पर पहुँच जाता है। वर्तमान कीमत (OP) पर पूर्ति की गई मात्रा PK से बढ़कर PT हो जाती है। आगत कीमत में वृद्धि होने पर पूर्ति वक्र S1 S1 से खिसक कर S3 S3 हो जाता है। वर्तमान कीमत (OP) पर पूर्ति की गई मात्रा PK से घटकर PR हो जाती है।

उत्पादन कर वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन पर लगाया जाता है सामान्यतः यह एक फर्म के उत्पादन की प्रति इकाई पर लगाया जाता है। फलस्वरूप उत्पादक की सीमांत तथा औसत लागत बढ़ जाती है। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में एक उत्पादक प्रचलित कीमत पर कम पूर्ति करेगा या वस्तु की पहले जितनी मात्रा को ऊँची कीमत पर बेचना चाहेगा। ऐसी स्थिति में पूर्ति में कमी होगी अर्थात पूर्ति वक्र पीछे को (बायीं ओर) खिसक जाएगा। इसे चित्र 11 द्वारा दिखाया गया है।

Figure-11

 

जब उत्पादन कर लगाया जाता है तब फर्म की AC तथा MC दोनों बढ़ती हैं। इसके अनुसार, पूर्ति वक्र बाईं ओर खिसककर S,S, से S2 S2 हो जाती है। वस्तु की वर्तमान कीमत पर कम मात्रा में पूर्ति की जाती है ।

आरंभ में OP कीमत पर उत्पादक PT मात्रा की पूर्ति करने को तैयार था । उत्पादन कर के लगने के पश्चात वह प्रचलित कीमत पर केवल PK मात्रा की पूर्ति ही करता है। पूर्ति वक्र अब S1S1 से पीछे को खिसक कर S2 S2 बन जाता है।

7.7 संबंधित वस्तुओं की कीमत तथा पूर्ति वक्र (Price of Related Products and Supply Curve) 

प्रतिस्थापन्न वस्तु (Substitute Good) की कीमत में परिवर्तन का वस्तु की पूर्ति पर विशेष प्रभाव पड़ता है। यदि चाय के दाम बढ़ जाते हैं तो कॉफी के उत्पादक अपने स्टॉक को रोक लेंगे और कॉफी की कीमत में वृद्धि की प्रतीक्षा करेंगे। कॉफी की प्रचलित कीमत पर वह इसकी कम मात्रा बेचेंगे। इसके फलस्वरूप पूर्ति घटेगी तथा पूर्ति वक्र पीछे को खिसक जाएगा। इसके विपरीत यदि चाय की कीमत घट जाती है, तो इसके उत्पादक अपने स्टॉक को जल्दी से जल्दी बेचना चाहेंगे, अन्यथा क्रेता कॉफी की अपेक्षा चाय की माँग करने लगेंगे अतः प्रचलित कीमत पर कॉफी की अधिक मात्रा को बिक्री के लिए प्रस्तुत किया जायेगा। यह स्थिति पूर्ति में वृद्धि की है या पूर्ति वक्र के आगे को खिसकने की स्थिति है। इन दोनों स्थितियों को चित्र 12 द्वारा दिखाया गया है।

Figure-12

Supply curve shifts to the right when price of the substitute good decreases

Supply curve shifts to the left when price of the substitute good increases

कॉफी की कीमत में वृद्धि होने से उपभोक्ता चाय का उपभोग करने लगेंगे। इसके फलस्वरूप वर्तमान कीमत पर चाय की पूर्ति कम की जाएगी। चाय का पूर्ति वक्र बाई ओर से खिसक कर S1 S1 से S3 S3 हो जाएगा। इसके विपरीत कॉफी की कीमत के कम होने से, चाय की पूर्ति में वृद्धि होगी । चाय का पूर्ति वक्र आगे की ओर खिसक कर S1 S1 से S2 S2 हो जाएगा।

यदि प्रतिस्थापन्न वस्तु (कॉफी) की कीमत घट जाती है तो ( चाय की) पूर्ति वक्र दायीं ओर SS से S2 S2 को खिसक जाती है। उत्पादक चाय की PR मात्रा (PT की अपेक्षा) बेचने को तैयार है। यदि प्रतिस्थापन्न वस्तु (कॉफी) की कीमत बढ़ जाती है तो चाय का पूर्ति वक्र बायीं ओर S1S1 से S3 S3 को खिसक जाता है । उत्पादक प्रचलित कीमत पर चाय की केवल PK मात्रा (PT की अपेक्षा) बेचने को तैयार होते हैं।

8.समय अवधि (या समय सीमा) तथा पूर्ति का व्यवहार(Time Period (or Time Horizon) and Supply Behaviour) 

अर्थशास्त्रियों ने समय अवधि को मोटे तौर पर तीन अवधियों में बाँटा है: जैसे:

(i) अति अल्पकाल (Very Short – Period)

जिसे बाजार अवधि (Market – Period) भी कहते हैं । (ii) अल्पकाल (Short-Period) (iii) दीर्घकाल (Long Period) ।

(i) अति अल्पकाल (अथवा बाजार अवधि) में पूर्ति का व्यवहार :-

अति अल्पकाल या बाजार अवधि, समय की उस अवधि को कहते हैं जिसमें किसी तरह भी उत्पादन में परिवर्तन नहीं किया जा सकता । अतः पूर्ति को अधिक-से-अधिक उसके वर्तमान स्टॉक तक बढ़ाया जा सकता है।

उदाहरण: एक मुर्गी खाने में अति अल्पकाल (बाजार अवधि) में अण्डों की पूर्ति उतनी ही होती है जितने अण्डे स्टॉक में होते हैं। किसान के लाख निवेदन करने पर भी मुर्गियाँ अधिक अण्डे नहीं देंगी।

वास्तव में, नाशवान वस्तुओं (वे वस्तुएँ जिनका स्टॉक नहीं किया जा सकता; जैसे- हरी सब्जियाँ) की अति अल्पकाल में पूर्ति पूर्णतः स्थिर रहती है। इसे खड़ी रेखा द्वारा प्रकट किया जाता है; जैसे- चित्र 13 में किया गया है। कीमत चाहे कुछ भी हो, अति अल्पकाल में वस्तुओं ( नाशवान ) की पूर्ति स्थिर रहती है।

Figure-13

No matter what the price is, quantity supplied remains constant during very short period of time (for perishable goods)

एक ऊर्ध्वाधर सरल रेखा पूर्ति वक्र (X- अक्ष से शुरू होती हुई ) शून्य कीमत पर भी वस्तु की स्थिर पूर्ति को प्रकट करती है। यह उन नाशवान वस्तुओं के लिए सही हो सकता है जिनका स्टॉक नहीं किया जा सकता तथा जिनका उत्पादन अति अल्पकाल की अवधि में स्थिर रहता है।

(ii) अल्पकाल :-

समय की उस अवधि को कहते हैं जिसमें घटते-बढ़ते (परिवर्तनशील) साधनों के अधिक उपयोग द्वारा पूर्ति में वृद्धि की जा सकती है। इस अवधि में स्थिर साधनों (जैसे प्लांट मशीनरी आदि) में परिवर्तन नहीं किया जा सकता । अतः बँधे साधनों की स्थिरता के कारण पूर्ति केवल एक सीमा तक ही कीमतों में परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तित होती है।

(iii) दीर्घकाल:-

दीर्घकाल समय की उस अवधि को कहते हैं जिसमें उत्पादन के सभी साधनों में परिवर्तन किया जा सकता है। तकनीकी सुधार भी इस अवधि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अत: पूर्ति वक्र में माँग के अनुसार परिवर्तन हो जाता है। दीर्घकाल में पूर्ति वक्र अल्पकाल की तुलना में, कीमत स्तर में परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील होती है। अल्पकाल की तुलना में पूर्ति वक्र में खिसकाव की बहुत अधिक प्रवृत्ति पायी जाती है। चित्र 14 में अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन पूर्ति वक्रों को दिखाया गया है।

Figures-14

 

दीर्घकालीन पूर्ति वक्र अल्पकालीन पूर्ति वक्र की तुलना में चपटा होता है। इससे प्रकट होता है कि दीर्घकाल में पूर्ति कीमत में परिवर्तनों की अनुकरणीय होती है। यह इसलिए होता है क्योंकि दीर्घकाल में सभी उत्पादन कारकों की आगतों में परिवर्तन द्वारा उत्पादन को बढ़ाया (या घटाया जा सकता है, जबकि अल्पकाल में केवल परिवर्ती कारकों के आगतों में परिवर्तन द्वारा उत्पादन बढ़ाया (या घटाया) जा सकता है।

SL (दीर्घकालीन पूर्ति वक्र) की तुलना में SH (अल्पकालीन पूर्ति वक्र) बहुत अधिक खड़ी ढाल (Much Steeper) वाली वक्र है। यह भी कहा जा सकता है कि दीर्घकालीन पूर्ति वक्र अल्पकालीन पूर्ति वक्र की तुलना में अधिक चपटी वक्र है।

9.पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के पूर्ति वक्र का व्युत्पन्न (Derivation of Firm’s Supply Curve under Perfect Competition) 

अध्याय 10 में हमने उत्पादक के संतुलन की व्याख्या की थी। परिचर्चा का केंद्र-बिंदु यह था कि लाभ अधिकतम करने वाली फर्म (Profit Maximising Firm) अपना संतुलन वहाँ प्राप्त करती है जहाँ MR = MC है और MC बढ़ रही है। पूर्ण प्रतियोगिता की अवस्था में, फर्म के लिए कीमत दी हुई होती है। जिसका अर्थ है कि फर्म के उत्पादन के विभिन्न स्तरों के लिए AR (औसत आय) स्थिर होता है। स्थिर AR का अभिप्राय है कि AR = MR है। इसलिए संतुलन की शर्त को, जहाँ MR = MC है, P (कीमत) MC के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है। एक दी हुई P (कीमत ) पर फर्म अपना संतुलन वहाँ प्राप्त करती है जहाँ P = MC और MC बढ़ रहा है।

हमने इस बात की भी चर्चा की थी कि अल्पकाल में फर्म हानि भी उठा सकती है। परंतु कोई भी अवस्था हो फर्म को अपनी परिवर्ती लागत अवश्य निकालनी पड़ती है। ताकि अल्पकाल के अंतर्गत अपना उत्पादन तभी करें जब TR (कुल संप्राप्ति) = TVC (कुल परिवर्ती लागत) अथवा TR/ Q = TVC/Q अथवा AR = AVC (औसत परिवर्ती लागत) अथवा P = AVC | इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य यह प्रकट होता है कि फर्म का अल्पकालीन पूर्ति वक्र वहाँ से शुरू होता है जहाँ उसका उत्पादन बंद करने वाला बिंदु (Shut down point) है, अर्थात् वह बिंदु P = AVC है । इस बिंदु से प्रारंभ होते हुए फर्म का पूर्ति वक्र MC वक्र के समान या समरूप होगा। चित्र 15 इस बात को स्पष्ट करता है।

Figure-15

चित्र 15 से स्पष्ट होता है कि यदि P (कीमत ) = P है, तब फर्म उस बिंदु Q पर अपना संतुलन प्राप्त करती है जो उसकी पूर्ति वक्र का प्रारम्भिक बिंदु है। यह OL मात्रा का उत्पादन करती है। यदि P (कीमत) = P2 है तब फर्म Q बिंदु पर अपना संतुलन प्राप्त करती है (यहाँ भी P = MC है और MC बढ़ रही है)। फर्म OL, मात्रा के उत्पादन का निर्णय लेती है। इसी भाँति यदि P = P3 है, तब फर्म Q2 बिंदु पर अपना संतुलन प्राप्त करती है (जहाँ P = MC है और MC बढ़ रहा है)। फर्म अब OL♭ मात्रा के उत्पादन का निर्णय लेती है। यह ध्यान से देखें, कि फर्म का संतुलन MC के बढ़ते खण्ड (Rising Segment) पर हो रहा है जो उत्पादन बंद करने वाले बिंदु Q से प्रारंभ हो रहा है। अन्य शब्दों में, MC वक्र का बढ़ता खण्ड (जो उत्पादन बंद करने वाले बिंदु से शुरू हो रहा है) कीमत-मात्रा (Price-quantity) संबंध को व्यक्त करता है।

इससे यह प्रकट होता है कि संबद्ध वस्तु की विभिन्न संभव कीमत के अनुरूप, एक लाभ अधिकतम करने वाली फर्म वस्तु की कितनी मात्रा के उत्पादन का इरादा रखती है। यही बात है जो पूर्ति वक्र दिखलाती या प्रकट करती है । अतएव इसका निष्कर्ष यह हुआ कि, अल्पकाल में, फर्म के MC वक्र का बढ़ता खण्ड (जो उत्पादन बंद करने वाले बिंदु से शुरू होता है) इसकी पूर्ति वक्र के समान या समरूप है।

दीर्घकाल (Long Run) में, फर्म को, वस्तु की कीमत से सभी लागतें अवश्य निकालनी होती हैं। अथवा P (कीमत ) से AC (औसत लागत) अवश्य निकलनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तब उत्पादन नहीं किया जाएगा। P (कीमत ) और AC

दीर्घकाल में, फर्म के MC वक्र का बढ़ता खण्ड (जो लाभ-अलाभ बिंदु से शुरू होता है, जब P = AC है) फर्म के पूर्ति वक्र के समान / समरूप होता है।

(औसत लागत) के बीच समानता (Equality) फर्म के लाभ-अलाभ बिंदु (Break-even Point) को बतलाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि लाभ अधिकतम करने वाली फर्म अपना उत्पादन केवल लाभ-अलाभ बिंदु से ऊपर ही कर पाएगी। अन्य शब्दों में, इसका अर्थ यह है कि दीर्घकाल में, फर्म का पूर्ति वक्र उसके लाभ-अलाभ या समस्तर बिंदु से शुरू होता है जहाँ P (कीमत) = AC (औसत लागत)। इस बिंदु से प्रारंभ होकर फर्म का पूर्ति वक्र उसके MC वक्र के समान या समरूप है। चित्र 16 इस बात का विवरण देता है।

Figure-16

चित्र 16 से प्रकट होता है कि बिंदु Q फर्म का लाभ – अलाभ बिंदु है जहाँ P = AC है। बिंदु Q पर फर्म वस्तु की OL मात्रा का उत्पादन करती है। यह कीमत (P) उत्पादन की कुल लागत को निकालती है । यदि कीमत P से कम हो जाती है, तब उत्पादन नहीं किया जाएगा। जब P (कीमत ) = P2 है, फर्म Q, बिंदु पर अपना संतुलन प्राप्त करती है (जहाँ P = MC है और MC बढ़ रहा है ) और फर्म का उत्पादन OL, है । इसी भाँति यदि P = P 3 है, तब Q2 बिंदु पर संतुलन प्राप्त होता है और OL मात्रा का उत्पादन किया जाता है। प्रत्येक संतुलन बिंदु (विभिन्न P स्तरों के अनुरूप) MC वक्र के बढ़ते खण्ड पर स्थित है (जो लाभ – अलाभ बिंदु से शुरू हो रहा है)। यह खण्ड उस संतुलन मात्रा या उस मात्रा को प्रकट करता है जो वस्तु की कीमत के विभिन्न स्तरों पर फर्म उत्पादित करने का इरादा रखती है। (या आपूर्ति करने का इरादा रखती है) अतएव, यह तथ्य कि फर्म के MC वक्र का बढ़ता खण्ड (जो लाभ-अलाभ बिंदु से शुरू होता है जब P = AC है) दीर्घकाल में फर्म के पूर्ति वक्र के समान या समरूप है।

10.पूर्ति की कीमत लोच(Price Elasticity of Supply):-

पूर्ति की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरूप उसकी पूर्ति में होने वाले परिवर्तन का माप है। पूर्ति के नियम (Law of Supply) से यह ज्ञात हो जाता है कि कीमत में परिवर्तन होने के कारण पूर्ति में किस दिशा में परिवर्तन होगा अर्थात् कीमत के घटने या बढ़ने से पूर्ति घटेगी या बढ़ेगी, परंतु यदि हम यह जानना चाहें कि कीमत के 10 प्रतिशत बढ़ने पर पूर्ति कितने प्रतिशत बढ़ेगी अर्थात पूर्ति में परिवर्तन किस अनुपात में होगा तो हमें पूर्ति की कीमत लोच (Price Elasticity of Supply) का अध्ययन करना पड़ेगा । अतएव पूर्ति की कीमत लोच कीमत में आनुपातिक परिवर्तन के फलस्वरूप पूर्ति की मात्रा में होने वाला आनुपातिक परिवर्तन है।

परिभाषा (Definition):- 

, सैम्युअलसन के अनुसार, “पूर्ति की लोच कीमत में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरूप पूर्ति में होने वाले परिवर्तन की प्रतिक्रिया की मात्रा है।” (Elasticity of supply is the degree of responsiveness of supply of a commodity to a change in its price. -Samuelson)

→ प्रो० बिलास के अनुसार, “पूर्ति की लोच से अभिप्राय वस्तु की पूर्ति में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन को कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन से भाग देने से है।” (Elasticity of supply is defined as the percentage change in quantity supplied divided by percentage change in price. —Bilas) 

पूर्ति की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के कारण पूर्ति में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का माप है।

10.1 पूर्ति की कीमत लोच का माप(Measurement of Price Elasticity of Supply) 

पूर्ति की कीमत लोच (संक्षेप में पूर्ति की लोच) को मापने की दो प्रसिद्ध विधियाँ इस प्रकार हैं:-

(i) अनुपातिक (या प्रतिशत) विधि, तथा (ii) ज्यामितीय विधि ।

(i) आनुपातिक या प्रतिशत विधि (Proportionate or Percentage Method

इस विधि के अनुसार, पूर्ति की लोच (E), वस्तु की ‘पूर्ति की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन’ तथा ‘कीमत में प्रतिशत परिवर्तन’ का अनुपात है।

              पूर्ति की मात्रा में प्रतिशत परिवर्तन 

Es = —————————————–

                कीमत में प्रतिशत परिवर्तन 

सांकेतिक रूप में (Symbolically)

                          ΔQ

                     ——– x 100                                                  

                        Q

Es = ——————————-         

                         ΔΡ 

                    ——-× 100 

                       P 

 

 

                        ΔQ

                    ——–                                         

                        Q

Es = ——————————-      

                     ΔΡ 

                  ——–

                       P 

 

 

              ΔQ                  P  

          ——–    x   ———-                                  

             Q                   ΔΡ

 

 

             ΔQ             P

Es=——— X  ——–

             ΔΡ            Q

 

Q : आरंभिक मात्रा

Q1: कीमत परिवर्तन के बाद पूर्ति की मात्रा

P : आरंभिक कीमत

Pi: नई कीमत

उदाहरण (Illustration) :-

एक उत्पादक ₹ 10 प्रति इकाई कीमत पर वस्तु की 400 इकाइयों की पूर्ति करता है। कीमत के घटकर ₹ 5 हो जाने से वह केवल 200 इकाइयों की पूर्ति करता है । पूर्ति की लोच ज्ञात कीजिए ।

हल (Solution): –

            ΔQ            P

Es = ——— X  ——

          ΔΡ           Q

 

Q=400,          ΔQ=200,       P=10,             ΔΡ=5

200 ÷5 X 10 ÷400

40 ÷1 X1 ÷40=1

(ii) ज्यामितीय विधि (Geometric Method):-

इस विधि के अनुसार पूर्ति की लोच, पूर्ति वक्र के ‘उद्गम’ (Origin) पर निर्भर करती है। यह मान्यता लेते हुए कि पूर्ति वक्र सीधी और धनात्मक ढलान वाली रेखा होती है, हम पूर्ति की लोच की तीन संभव स्थितियों की कल्पना कर सकते हैं, जो निम्नलिखित हैः स्थिति 1 (Situation 1 ) : Es (पूर्ति की लोच) = 1

चित्र 17 में दिखाया गया है।

Figure -17

 

Es = 1 होगा, यदि पूर्ति वक्र एक सरल रेखा है इसका ढलान ऊपर की ओर है यह मूल बिंदु से शुरू होती है।

जैसाकि चित्र से स्पष्ट होता है ( और प्रमाण यहाँ दिया गया है) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता पूर्ति वक्र को क्या कोण बनाते हुए खींचा गया है।

 

    ΔQ              P

              Es= ——— X   ——        ………(i)

         ΔΡ                 Q

 

यदि P को प्रारंभिक कीमत और S को प्रारंभिक मात्रा मान लिया जाए, तब

Es=bc ÷ ac x OP1÷OS1    ……………(ii)

bc ÷ ac x S1b ÷ OS1          ………………(iii)

Δbca तथा ΔOS1b सदृश त्रिभुज हैं। इसलिए इनकी भुजाओं का अनुपात बराबर होना चाहिए

Bc            OS1

……… = ………         …  (iv)

Ac           S1b

(iv) को (iii) से संबंधित करते हुए हमें प्राप्त होता है:-

OS1          S1b

…….. x ………  =   1 (इकाई)

S1b      OS1

इकाई लोच (Unitary Elasticity):-

जब किसी वस्तु की पूर्ति में परिवर्तन उसी अनुपात में होता है जिस अनुपात कीमत में परिवर्तन हुआ है, तो उस वस्तु की पूर्ति को इकाई लोच कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कीमत में 50 प्रतिशत की वृद्धि होती है तथा पूर्ति भी 50 प्रतिशत बढ़ती है तो पूर्ति की इकाई कीमत लोच होगी।

E = 50%/ 50% = 1 (Unity)

स्थिति 2 (Situation 2): Es (पूर्ति की लोच) > 1

इकाई से अधिक लोच या लोचदार पूर्ति (Greater than Unitary Elasticity or Elastic Supply): जब किसी वस्तु की पूर्ति में प्रतिशत परिवर्तन कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन से अधिक होता है तो इस दशा में पूर्ति की लोच इकाई से अधिक होती है। उदाहरण के लिए, यदि कीमत में 50 प्रतिशत वृद्धि होने पर पूर्ति में 100 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो पूर्ति की लोच इकाई से अधिक होती है अर्थात पूर्ति लोचदार होती है।

चित्र 18 में SS वक्र इकाई से अधिक पूर्ति लोच प्रकट कर रहा है अर्थात

Figure-18

एक सरल रेखा (ऊपर की ओर ढलवां ) पूर्ति वक्र, जो Y – अक्ष से शुरू होता है यह प्रकट करता है कि Es > 1, चाहे यह कोई भी कोण बनाए ।

स्थिति 3 (Situation 3): Es (पूर्ति की लोच) < 1

इकाई से कम लोच या बेलोचदार पूर्ति (Less than Unitary Elasticity or Inelastic Supply):-

जब किसी वस्तु की पूर्ति में होने वाला प्रतिशत परिवर्तन कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन से कम होता है, तो इसे पूर्ति की इकाई से कम लोच कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कीमत में 50 प्रतिशत वृद्धि होने पर पूर्ति में केवल 25 प्रतिशत की वृद्धि पूर्ति होती है, तो इस दशा को इकाई से कम लोचदार या बेलोचदार पूर्ति कहते हैं।

Es = 25% /50% = 1 (Es < 1)

चित्र 19 में SS वक्र इकाई से कम पूर्ति लोच प्रकट कर रहा है।

Figure-19

एक सरल रेखा (ऊपर की ओर ढलवां ) पूर्ति वक्र, जो X- अक्ष से शुरू होता है यह प्रकट करता है कि Es < 1, चाहे यह कोई भी कोण बनाए ।

नोट: पाठ्यक्रम के अनुसार, विद्यार्थियों के लिए ज्यामितीय विधि द्वारा पूर्ति की लोच को मापना जरूरी नहीं है।

पूर्ति की लोच का शून्य होना (Zero Elasticity of Supply):- 

इस स्थिति में पूर्ति वक्र को एक ऊर्ध्वाधर सीधी रेखा द्वारा दिखाया जाता है। जिसका अर्थ पूर्ति का स्थिर बना रहना है, चाहे कीमत कोई भी हो। इसे चित्र 20 द्वारा प्रकट किया गया है। सदैव याद रखिए

(i) Es = 1, जब ऊपर उठती हुई पूर्ति सरल रेखा आरंभिक बिंदु ‘0’ से आरंभ होती है।

(ii) Es > 1, जब ऊपर उठती हुई पूर्ति सरल रेखा Y – अक्ष से आरंभ होती है।

(iii) Es < 1, जब ऊपर उठती हुई पूर्ति सरल रेखा X- अक्ष से आरंभ होती है।

Figure-20 

वस्तु की कीमत में परिवर्तन का जब पूर्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता तब Eg = 0, होता है। कीमत शून्य रहने पर भी पूर्ति स्थिर बनी रहती है।

चित्र 20 में दिखाया गया है कि पूर्ति की मात्रा OS ही बनी रहती है, चाहे वस्तु की कीमत OP, हो या OP2 | ऊर्ध्वाधर सीधी रेखा वाले पूर्ति वक्र को पूर्णत: बेलोचदार पूर्ति वक्र भी कहा जाता है। इस अवस्था में Es = 0 होती है।

पूर्ति की लोच का अनंत होना (Infinite Elasticity of Supply):- 

ऐसी लोच को एक ऊर्ध्वाधर सीधी रेखा द्वारा दिखाया जाता है। चित्र 21 के अनुसार जब वस्तु की कीमत OS है तब पूर्ति की मात्रा अनंत है। यदि कीमत में थोड़ी सी भी कमी होती है तो पूर्ति की मात्रा शून्य हो जाएगी ( वास्तव में पूर्ति वक्र का ही लोप हो जाएगा।) इसे पूर्णतया लोचदार पूर्ति भी कहते हैं। इस अवस्था में Es

Es = ∞ (अनंत) होती है।

Figure-21

जब Es = 0, होता है, तब कीमत में मामूली परिवर्तन भी पूर्ति की मात्रा में अनंत परिवर्तन लाता है। अतएव यदि कीमत OS से नीचे गिरती है वस्तु की पूर्ति घटकर शून्य हो जाती है।

किसी वस्तु की पूर्ति वक्र पर नीचे की ओर संचलन किस कारण से होता है

(What causes a Downward Movement along a Supply Curve of a Commodity?) 

ध्यानपूर्वक समझ लें कि प्रश्न का संबंध पूर्ति वक्र पर संचलन से है । पूर्ति वक्र पर होने वाला संचलन संबंधित वस्तु कीमत में होने वाले परिवर्तन के कारण होता है । पूर्ति वक्र पर नीचे की ओर संचलन का कारण कीमत का कम होना है। यह पूर्ति के संकुचन की स्थिति है।

10.2 पूर्ति की लोच को प्रभावित करने वाले तत्व (Factors Affecting Elasticity of Supply) 

पूर्ति की लोच को मुख्य रूप से निम्नलिखित तत्व प्रभावित करते हैं:

आगतों की प्रकृति (Nature of Inputs ):-

पूर्ति की लोच आगतों की प्रकृति पर भी निर्भर करती है। यदि किसी वस्तु के उत्पादन के लिये आवश्यक आगत सामान्य रूप से उपलब्ध होते हैं तो उस वस्तु की पूर्ति लोचदार होगी। इसके विपरीत यदि किसी वस्तु के उत्पादन के लिये विशेष आगतों की आवश्यकता होती है तो वस्तु की पूर्ति बेलोचदार होगी ।

(2) प्राकृतिक बाधाएँ (Natural Constraints):-

पूर्ति की लोच पर प्राकृतिक बाधाओं का भी प्रभाव पड़ता है। प्रकृति पूर्ति पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा देती है। उदाहरण के लिये यदि हम टीक की लकड़ी की पूर्ति बढ़ाना चाहते हैं तो उसके पेड़ तैयार होने में कई वर्ष लग जायेंगे। इसकी पूर्ति में वृद्धि आसानी से नहीं की जा सकती। इसलिए टीक की लकड़ी की पूर्ति कम लोचदार होगी ।

लोचदार, बेलोचदार तथा इकाई के समान लोचदार पूर्ति

(i) जब E > 1, तब पूर्ति लोचदार होती है।

(ii) जब E, < 1, तब पूर्ति बेलोचदार होती है।

(iii) जब E = 1, तब पूर्ति की लोच इकाई के समान होती है।

( 3 ) जोखिम सहन करना (Risk Taking):-

पूर्ति की लोच इस बात पर भी निर्भर करती है कि उद्यमी कितनी जोखिम उठाने के इच्छुक हैं। यदि उद्यमी जोखिम उठाने के लिये तैयार हैं तो पूर्ति लोचदार होगी। इसके विपरीत यदि वे जोखिम उठाने के लिये तैयार नहीं हैं तो पूर्ति बेलोचदार होगी ।

(4) वस्तु की प्रकृति (Nature of Commodity):-

नाशवान वस्तुओं की पूर्ति बेलोचदार होती है क्योंकि कीमत में परिवर्तन होने पर भी उनकी पूर्ति में वृद्धि या कमी नहीं की जा सकती। दूसरी ओर टिकाऊ वस्तुओं की पूर्ति लोचदार होती है क्योंकि कीमत में परिवर्तन होने पर उनकी पूर्ति को कम या अधिक किया जा सकता है।

(5) उत्पादन लागत (Cost of Production):-

पूर्ति की लोच पर उत्पादन लागत का भी प्रभाव पड़ता है। यदि उत्पादन पर बढ़ती लागतों का नियम लागू हो रहा है तो पूर्ति बेलोचदार होगी ।

(6) समय तत्त्व (Time Element):-

पूर्ति की लोच पर समय तत्व का भी प्रभाव पड़ता है। दीर्घकाल में पूर्ति लोचदार होती है जबकि अल्पकाल में पूर्ति बेलोचदार होती है क्योंकि अल्पकाल में पूर्ति में परिवर्तन करना संभव नहीं होता । अर्थशास्त्री इस संबंध में समय तत्त्व को तीन भागों में बाँट देते हैं

(I) अति अल्पकाल (Very Short  Period):-

अति अल्पकाल में पूर्ति में परिवर्तन करने का समय नहीं होता इसलिये पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती है।

(ii) अल्पकाल (Short- Period):-

अल्पकाल में प्लांट की क्षमता स्थिर होती है परन्तु पूर्ति को वर्तमान उत्पादन क्षमता तक बढ़ाया जा सकता है इसलिये पूर्ति कम लोचदार होती है।

 (iii) दीर्घकाल (Long-Period):-

दीर्घकाल में उत्पादन क्षमता में इच्छानुसार परिवर्तन किया जा सकता है इसलिये पूर्ति अधिक लोचदार होती है।

(7) उत्पादन की तकनीक (Technique of Production):-

यदि उत्पादन तकनीक जटिल तथा पूँजी प्रधान है तो पूर्ति कम लोचदार या बेलोचदार होगी। क्योंकि कीमत में होने वाले परिवर्तन के अनुसार पूर्ति में सरलता से परिवर्तन करना संभव नहीं होता है। इसके विपरीत यदि उत्पादन तकनीक सरल है तो पूर्ति अधिक लोचदार होगी ।

10.3 पूर्ति की लोच का महत्व( Importance of Elasticity of Supply) 

(1) कीमत निर्धारण तथा पूर्ति की लोच (Price Determination and Elasticity of Supply):-

मार्शल द्वारा प्रतिपादित समय तत्व की धारणा वास्तव में पूर्ति की लोच पर आधारित है। अति अल्पकाल (Very Short Period) में पूर्ति के अधिक बेलोचदार होने के फलस्वरूप कीमत निर्धारण पर माँग का अधिक प्रभाव पड़ता है। दीर्घकाल में पूर्ति के अधिक लोचदार होने के फलस्वरूप कीमत पर पूर्ति का अधिक प्रभाव पड़ता है।

(2) साधन कीमत निर्धारण तथा पूर्ति की लोच (Factor Pricing and Elasticity of Supply):-

लगान के आधुनिक सिद्धांत के अनुसार एक साधन को लगान उस समय प्राप्त होता है जब उसकी पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार होती है। इसलिए भूमि से प्राप्त सारी आय को लगान कहा जाता है । जब कुछ साधनों जैसे- श्रम, पूंजी आदि की पूर्ति अल्पकाल के लिए भी बेलोचदार होती है तो इन साधनों की माँग बढ़ने पर इन्हें अपनी परिवर्तनशील लागत से अधिक जो अतिरिक्त आय प्राप्त होती है वह भी लगान का ही रूप है। इसे अर्ध लगान (Quasi Rent) कहा जाता है। जब किसी साधन की पूर्ति पूर्णतया लोचदार होती है तो उसे लगान के रूप में कोई अतिरिक्त आय नहीं मिलती है।

पूर्ति की लोच के माप संबंधी संख्यात्मक उदाहरण एवं उनके हल

जब कीमत ₹4 प्रति गुड़िया है तो गुड़िया बनाने वाली प्रतिदिन 8 गुड़ियों की पूर्ति करती है। कीमत ₹5 प्रति गुड़िया होने पर वह प्रतिदिन 10 गुड़ियों को बेचने को तैयार है। गुड़ियों की पूर्ति की कीमत लोच बताइए ।

हल (Solution): 

                                      P                ΔQ

पूर्ति की लोच (Es) = ————- X   ————                  

                                      Q                 ΔΡ

 

P = ₹ 4; P1 = ₹ 5; ΔΡ = ₹ 5 – ₹ 4 = ₹ 1

Q = 8 गुड़िया; Q1 = 10 गुड़िया;

ΔQ = (10 – 8) गुड़िया = 2 गुड़िया

4                   2

         Es = …………… X ………..  = 1 (इकाई)

8                      1

उत्तर : पूर्ति की कीमत लोच इकाई है।

उदाहरण (Illustration) 2. 

यदि आलू की कीमत ₹ 4 प्रति किलोग्राम हो तो एक आलू विक्रेता एक दिन में 80 क्विंटल आलू बेचता है। आलू की पूर्ति लोच 2 है। यदि आलू की कीमत ₹5 प्रति किलोग्राम हो जाये तो यह विक्रेता कितनी मात्रा वेचेगा ?

हल (Solution):

मान लीजिए विक्रेता आलू की M मात्रा की पूर्ति करेगा।

                                       ΔQ             P

पूर्ति की लोच (Es) = ———–X   ———-                    

                                     ΔΡ                Q

 

P = ₹ 4; P1 = ₹ 5; ΔΡ = ₹ 5 – ₹4 =₹1

Q = 80 क्विंटल; Q1 = M क्विंटल; ΔQ = (M – 80) क्विंटल

Es = 2 

 

           4                 M – 80

2 =  …….……… x ………………

  80                1

 

       M – 80

2 = ………………..

   20

40 = M – 80

M = 80 + 40 = 120

उत्तर : पूर्ति की मात्रा = 120 क्विंटल |

 

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