अध्याय-12 पूर्ण प्रतियोगिता में बाजार संतुलन (Market Equilibrium Under Perfect Competition)
अध्याय के मुख्य बिन्दु:–
■ बाजार संतुलन की धारणा : संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा
■ पूर्ण प्रतियोगिता में संतुलन कीमत का निर्धारण
■ माँग में होने वाले परिवर्तन का संतुलन कीमत पर प्रभाव
■पूर्ति में होने वाले परिवर्तन का संतुलन कीमत पर प्रभाव
■ माँग और पूर्ति में एक साथ परिवर्तन तथा संतुलन कीमत
■ समय तत्त्व तथा संतुलन कीमत
■ सरकार द्वारा कीमत नियंत्रण – उच्चतम कीमत एवं न्यूनतम कीमत
1. बाजार संतुलन, संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा किसे कहते है ?
(Concept of Market Equilibrium: Equilibrium Price and Equilibrium Quantity)
बाजार संतुलन बाजार की वह स्थिति है जिसमें एक विशेष कीमत के अनुरूप किसी वस्तु के लिए माँग यथार्थ रूप से उसकी पूर्ति के बराबर होती है। (D = S )
इस स्थिति में न तो अतिरिक्त माँग या माँग-आधिक्य (Excess Demand : D > S) और न ही अतिरिक्त पूर्ति या पूर्ति – आधिक्य (Excess Supply : S > D) होता है। ऐसी स्थिति में जो कीमत बाज़ार में प्रचलन में होती है वह संतुलन कीमत कहलाती है। यह कीमत समान रूप से पूर्ण प्रतियोगी बाजार में प्रचलित होती है।
संतुलन की स्थिति में, पूर्ति की गई / माँगी गई मात्रा संतुलन मात्रा कहलाती है। अतः संतुलन मात्रा वह मात्रा है जो बाजार में संतुलन कीमत के अनुरूप होती है।
संतुलन कीमत (Equilibrium Price) :- बाजार माँग = वाजार पूर्ति
संतुलन कीमत पर सभी क्रेता अपनी पूरी माँग को संतुष्ट कर लेते हैं तथा सभी विक्रेता किसी वस्तु की उतनी मात्रा को बेचने में सफल हो जाते हैं जितनी वे बाजार में बेचना चाहते हैं। अतः संतुलन कीमत वह कीमत है जिस पर किसी वस्तु की माँग और पूर्ति बराबर होती है अर्थात क्रेताओं और विक्रेताओं का क्रय-विक्रय क्रमशः एक-दूसरे के बरावर होता है। (The equilibrium price, therefore, is the price at which demand and supply is equal to each other or the purchases and sales of buyers and sellers respectively coincide.)
2. पूर्ण प्रतियोगिता में बाजार संतुलन का निर्धारण कैसे होता है ?
(Determination of Market Equilibrium under Perfect Competition)
पूर्ण प्रतियोगिता की अवस्था में संतुलन कीमत केवल एक फर्म द्वारा निर्धारित नहीं होती बल्कि (i) बाजार माँग तथा (ii) बाजार पूर्ति की परस्पर शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है।
बाजार माँग से अभिप्राय किसी वस्तु के लिए माँग के उस कुल जोड़ से है जो बाजार में सभी क्रेताओं द्वारा की जाती है।
बाजार पूर्ति से तात्पर्य किसी वस्तु की पूर्ति के उस कुल जोड़ से है जो बाजार में सभी फर्में बेचने के लिए तैयार हैं।
(i) बाजार माँग का और (ii) बाजार पूर्ति का संतुलन कीमत के निर्धारण को तालिका 1 तथा चित्र 1 द्वारा स्पष्ट किया गया है।
तालिका 1. पूर्ण प्रतियोगिता में संतुलन कीमत
कीमत (₹)
|
आइसक्रीम की पूर्ति (दर्जन) | आइसक्रीम की माँग (दर्जन |
5 |
50 |
10 |
4 |
40 |
20 |
3 |
30 |
30 |
2 |
20 |
40 |
1 | 10 |
50 |
तालिका 1 से ज्ञात होता है कि जब आइसक्रीम की कीमत ₹5 है तो पूर्ति 50 दर्जन तथा माँग 10 दर्जन है। आइसक्रीम के विक्रेता आइसक्रीम की बिक्री बढ़ाने के लिए उसकी कीमत कम कर देंगे। मान लीजिए, विक्रेता कीमत को ₹5 से कम करके ₹4 कर देते हैं; इसके फलस्वरूप आइसक्रीम की माँग बढ़कर 20 दर्जन हो जाती है तथा पूर्ति कम होकर 40 दर्जन हो जाती है। परंतु इस कीमत पर भी आइसक्रीम की माँग उसकी पूर्ति से कम है। अतः आइसक्रीम के विक्रेता उसकी कीमत को घटाकर ₹3 कर देते हैं, इस कीमत पर आइसक्रीम की माँग और पूर्ति बराबर अर्थात् 30 दर्जन हो जाती है। अतएव ₹3 ही आइसक्रीम की संतुलन कीमत कहलायेगी। यदि कीमत ₹ 3 से कम होकर ₹ 2 हो जाती है तो आइसक्रीम की माँग बढ़कर 40 दर्जन तथा पूर्ति कम होकर 20 दर्जन रह जायेगी। माँग के पूर्ति की तुलना में अधिक होने के कारण कीमत बढ़कर ₹3 हो जायेगी । अतः प्रतियोगिता की स्थिति में बाजार कीमत संतुलन कीमत के बराबर निर्धारित होगी, वह न तो इससे कम तथा न ही इससे अधिक निर्धारित होगी ।
संतुलन बिंदु E पर प्राप्त हुआ है। यहाँ संतुलन कीमत = ₹ 3, संतुलन मात्रा = 30 दर्जन । यदि कीमत ₹5 हो जाती है, तब अतिरिक्त पूर्ति = AB है । यदि कीमत ₹ 2 हो जाती है, तब अतिरिक्त माँग = CD है।
संतुलन कीमत के निर्धारण को चित्र 1 द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। इस चित्र में OX अक्ष पर वस्तु की मात्रा तथा OY अक्ष पर वस्तु की कीमत प्रकट की गई है। DD माँग वक्र तथा SS पूर्ति वक्र है, यह दोनों ‘E’ बिंदु पर एक-दूसरे को काट रहे हैं अर्थात् बिंदु ‘E’ पर वस्तु की माँग तथा पूर्ति एक-दूसरे के बराबर हैं। बिंदु ‘E’ संतुलन बिंदु है, इस बिंदु द्वारा ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत ₹ 3 तथा संतुलन मात्रा 30 दर्जन है । यदि कीमत बढ़कर ₹5 हो जाती है तो पूर्ति (50 दर्जन), माँग (10 दर्जन) से अधिक होगी। चित्र 1 से स्पष्ट है कि इस कीमत पर अतिरिक्त पूर्ति (Excess Supply) AB के बराबर होगी। इस परिस्थिति में पूर्ति के माँग से अधिक होने के कारण कीमत में कमी हो जाएगी तथा वह संतुलन कीमत अर्थात् ₹ 3 के बराबर हो जाएगी। यदि कीमत कम होकर ₹ 2 हो जाती है तो पूर्ति (20 दर्जन) माँग (40 दर्जन) से कम होगी। माँग के पूर्ति से अधिक होने के कारण कीमत में वृद्धि होगी। चित्र 1 से स्पष्ट होता है कि CD अधि माँग (Excess Demand) है। माँग के पूर्ति से अधिक होने के कारण कीमत बढ़कर संतुलन कीमत के बराबर हो जाएगी ।
2.1 पूर्ण प्रतियोगिता में संतुलन कीमत की मान्यताएँ बताए ? (Assumptions of Equilibrium Price under Perfect Competition)
संतुलन की धारणा निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है:-
(i) माँग वक्र का ढलान ऋणात्मक (Negative) है अर्थात यह ऊपर से नीचे की ओर दायीं तरफ गिर रही है।
(ii) पूर्ति वक्र का ढलान धनात्मक (Positive) है अर्थात यह नीचे से ऊपर की ओर उठ रही है।
(iii) बिना सरकारी हस्तक्षेप के पूर्ति और माँग की शक्तियाँ स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं।
2.2 कीमत निर्धारण की विशेषताएँ (Characteristics of Price Determination)
पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत निर्धारण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-
(i) पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत कीमत का निर्धारण उद्योग द्वारा किया जाता है, किसी एक व्यक्तिगत फर्म द्वारा नहीं ।
(ii) पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत को संतुलन कीमत कहा जाता है क्योंकि यह बाजार माँग तथा बाजार पूर्ति के संतुलन के अनुरूप
होती है अर्थात् यह उद्योग के संतुलन के अनुरूप होती है।
(iii) एक व्यक्तिगत फर्म, पूर्ण प्रतियोगी बाजार में, संतुलन कीमत को परिवर्तित नहीं कर सकती ।
3.माँग में होने वाले परिवर्तन का संतुलन कीमत पर प्रभाव क्या परभव पड़ता है ?
(Effects of Change in Demand on Equilibrium Price)
यदि वस्तु की पूर्ति स्थिर रहती है तो माँग के बढ़ने से कीमत बढ़ेगी तथा माँग के कम होने से कीमत कम होगी।
चित्र 2 से प्रकट होता है कि DD प्रारंभिक माँग वक्र तथा SS प्रारंभिक पूर्ति वक्र है, OP संतुलन कीमत तथा OQ संतुलन माँग तथा पूर्ति है।
चित्र 2 माँग में पूर्ति स्थिर रहती है। माँग में वृद्धि होने पर संतुलन कीमत OP से बढ़कर OP1 हो जाती है। संतुलन मात्रा OQ से बढ़कर OQ1 हो जाती है। माँग में कमी होने पर संतुलन कीमत OP से घटकर OP2 हो जाती है। संतुलन मात्रा भी OQ से घटकर OQ2 हो जाती है।
मान लीजिए यदि माँग में वृद्धि होने के कारण माँग वक्र दाईं ओर खिसक कर D1D1 हो जाता है। नई माँग वक्र D1D1 पूर्ति वक्र SS को E1 बिंदु पर छू रही है । अतः E, बिंदु नया संतुलन बिंदु होगा तथा OQ नई संतुलन मात्रा और OP, नई संतुलन कीमत होगी। इसके विपरीत माँग में पूर्ति की तुलना में कमी होने के कारण माँग वक्र बाईं ओर खिसक कर D2 D2 हो जायेगी। नई माँग वक्र D2D2 पूर्ति वक्र SS को E2 बिंदु पर काट रही है । अत: E2 नया संतुलन बिंदु होगा। इस बिंदु पर OP2 नई संतुलन कीमत होगी तथा OQ2 नई संतुलन मात्रा होगी।
संक्षेप में, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पूर्ति के स्थिर रहने पर जब किसी वस्तु की माँग में वृद्धि होती है तो संतुलन कीमत ऊँची हो जाती है तथा संतुलन उत्पादन भी बढ़ जाता है। इसके विपरीत जब माँग में कमी होती है तो संतुलन कीमत कम हो जाती है तथा संतुलन उत्पादन भी कम हो जाता है। चित्र 3 द्वारा यह स्थिति स्पष्ट हो जाती है।
(1) माँग में वृद्धि (Increase in Demand):-
चित्र 3 (A) से ज्ञात होता है कि पूर्ति SS वक्र के स्थिर रहने पर माँग के बढ़ने के कारण DD माँग वक्र ऊपर दाईं ओर खिसककर D1 D1 हो गया है। यह पूर्ति वक्र SS को E1 बिंदु पर काट रहा है इसलिये E1 नया संतुलन बिंदु होगा। इससे ज्ञात होता है कि नई संतुलन कीमत बढ़कर OP1 हो जाएगी तथा संतुलन मात्रा बढ़कर OQ1 हो जाएगी।
(2) माँग में कमी (Decrease in Demand):-
चित्र 3(B) से ज्ञात होता है कि पूर्ति वक्र SS के स्थिर रहने पर माँग के कम होने के कारण माँग वक्र DD नीचे बाईं ओर खिसककर D2D2 हो गया है। यह पूर्ति वक्र SS को E2 बिंदु पर काट रहा है। इसलिए बिंदु E2 नया संतुलन बिंदु होगा। इस बिंदु पर कीमत कम होकर OP2 हो जाएगी तथा संतुलन मात्रा कम होकर OQ2 हो जाएगा।
3.1 माँग में परिवर्तन तथा संतुलन कीमत: कुछ विशेष स्थितियाँ (Change in Demand and Equilibrium Price: Some Exceptional Situations)
दो विशेष स्थितियों में यह देखा जा सकता है कि माँग में वृद्धि या कमी किस प्रकार संतुलन कीमत को प्रभावित करती है :
(A) जब वस्तु की पूर्ति पूर्णतया लोचदार ( Perfectly Elastic) रहती है, तथा
(2) जब वस्तु की पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार (Perfectly Inelastic) रहती है।
(1) जब पूर्ति पूर्णतया लोचदार हो तो संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?
(When Supply is Perfectly Elastic)
यदि किसी वस्तु की पूर्ति पूर्णतया लोचदार होती है तो उसकी माँग में होने वाली वृद्धि या कमी का उस वस्तु की संतुलन कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इनका प्रभाव केवल वस्तु की माँगी गई मात्रा पर पड़ता है। चित्र 4(A) तथा 4 (B) द्वारा इस स्थिति को स्पष्ट किया गया है।
(i) चित्र 4(A) से ज्ञात होता है कि वस्तु का पूर्ति वक्र SS पूर्णतया लोचदार है। प्रारंभिक माँग वक्र DD पूर्ति वक्र SS को E बिंदु पर काट रही है। इसलिए बिंदु E संतुलन बिंदु होगा। बिंदु E से ज्ञात होता है कि वस्तु की संतुलन कीमत OP तथा संतुलन मात्रा OQ है। यदि माँग में वृद्धि होने के फलस्वरूप माँग वक्र दाईं ओर खिसक कर D1D1 हो जाती है तो नया संतुलन बिंदु E1 होगा। बिंदु E1 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत OP ही रहेगी परंतु संतुलन मात्रा बढ़कर OQ हो जायेगी।
(ii) चित्र 4(B) से ज्ञात होता है कि माँग में कमी होने के फलस्वरूप यदि माँग वक्र बाईं ओर खिसक कर D2D2 हो जाती है तो नया संतुलन बिंदु E2 होगा। बिंदु E2 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत OP ही रहेगी परंतु संतुलन मात्रा कम होकर OQ2 हो जाएगी।
(2) जब पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार हो तो संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?
(When Supply is Perfectly Inelastic):-
यदि किसी वस्तु की पूर्ति पूर्णतया बेलोचदार (या स्थिर पूर्ति) हो तब माँग में वृद्धि या कमी वस्तु की कीमत को प्रभावित करती है। इसका वस्तु की मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि पूर्ति स्थिर होती है। चित्र 5 (A) तथा 5(B) द्वारा इस स्थिति को स्पष्ट किया गया है।
(i) चित्र 5(A) से ज्ञात होता है कि वस्तु का पूर्ति वक्र SS पूर्णतया बेलोचदार है। प्रारंभिक माँग वक्र DD पूर्ति वक्र SS को E बिंदु पर काट रही है। इसलिए बिंदु E संतुलन बिंदु होगा । बिंदु E से ज्ञात होता है कि वस्तु की संतुलन कीमत OP तथा संतुलन मात्रा OQ होगी। यदि माँग में वृद्धि होने के फलस्वरूप माँग वक्र ऊपर की ओर खिसककर D1 D1 हो जाती है तो नया संतुलन बिंदु E1 होगा । बिंदु E1 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत बढ़कर OP1 हो जायेगी परंतु संतुलन मात्रा OQ ही रहेगी।
(2) चित्र 5 (B) से ज्ञात होता है कि माँग में कमी होने के फलस्वरूप यदि माँग वक्र नीचे की ओर खिसक कर D2D2 हो जाती है तो नया संतुलन बिंदु E2 होगा। बिंदु E2 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत OP से कम होकर OP2 हो जाएगी परंतु संतुलन मात्रा OQ ही रहेगी।
4. पूर्ति में होने वाले परिवर्तन का संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?
(Effects of Change in Supply on Equilibrium Price)
किसी वस्तु की माँग के स्थिर रहने पर उसकी पूर्ति में वृद्धि होने से संतुलन कीमत कम होगी तथा पूर्ति में कमी होने से संतुलन कीमत बढ़ेगी। (Price changes inversely with supply.) चित्र 6 में DD प्रारंभिक माँग वक्र तथा SS प्रारंभिक पूर्ति वक्र है। OP प्रारंभिक संतुलन कीमत तथा 0Q प्रारंभिक संतुलन माँग तथा पूर्ति है।
चित्र 6 पूर्ति में परिवर्तन की स्थिति को दर्शाता है। पूर्ति में वृद्धि होने पर संतुलन कीमत OP से घटकर OP2 हो जाती है। संतुलन मात्र OQ से बढ़कर OQ2 हो जाती है । पूर्ति में कमी होने पर संतुलन कीमत OP से बढ़कर OP1 हो जाती है। संतुलन मात्रा OQ से घटकर OQ1 हो जाती है।
मान लीजिए, पूर्ति में वृद्धि होने के कारण पूर्ति वक्र नीचे दाई ओर खिसककर S2 S2 हो जाता है। नया पूर्ति वक्र S2S2 माँग वक्र DD को E2 बिंदु पर छू रहा है । अत: बिंदु E2 नया संतुलन बिंदु होगा। इस बिंदु पर कीमत OP2 निर्धारित होगी तथा संतुलन मात्रा OQ2 होगी। इसके विपरीत मान लीजिए पूर्ति के कम होने के कारण पूर्ति वक्र ऊपर बाईं ओर खिसक कर S1 S1 हो जाता है। पूर्ति वक्र S 1S1 माँग वक्र DD को E1 बिंदु पर काट रहा है। इसलिये E1 नया संतुलन बिंदु होगा । इस नये संतुलन बिंदु E1 पर संतुलन कीमत OP1 तथा संतुलन मात्रा OQ1 होगी।
संक्षेप में, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जब किसी वस्तु की पूर्ति बढ़ती है तो संतुलन कीमत कम हो जाती है परंतु संतुलन मात्रा बढ़ जाती है, इसके विपरीत जब किसी वस्तु की पूर्ति कम होती है तो उसकी कीमत बढ़ जाती है तथा संतुलन मात्रा कम हो जाती है। चित्र 7 द्वारा इन स्थितियों को स्पष्ट किया जा सकता है।
(1) पूर्ति में वृद्धि का संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?(Increase in Supply):-
चित्र 7 (A) से ज्ञात होता है कि माँग वक्र DD के स्थिर रहने पर पूर्ति के बढ़ने के कारण पूर्ति वक्र SS नीचे दाईं ओर खिसककर S1S1 हो गया है। यह माँग वक्र DD को E1 बिंदु पर काट रहा है। इसलिये E1 नया संतुलन बिंदु होगा। इससे ज्ञात होता है कि नई संतुलन कीमत कम होकर OP1 हो जायेगी तथा संतुलन मात्रा बढ़कर OQ1 हो जायेगी।
(2) पूर्ति में कमी का संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?(Decrease in Supply):-
चित्र 7 (B) से ज्ञात होता है कि माँग के स्थिर रहने पर पूर्ति के कम होने पर पूर्ति वक्र ऊपर बाईं ओर खिसककर S2 S2 हो गया है। यह माँग वक्र DD को E2 बिंदु पर काट रहा है। इसलिये E2 नया संतुलन बिंदु होगा। इससे ज्ञात होता है कि नई संतुलन कीमत बढ़कर OP2 हो जायेगी तथा संतुलन मात्रा कम होकर OQ2 हो जायेगी।
4.1 पूर्ति में परिवर्तन तथा संतुलन कीमत: कुछ विशेष स्थितियां
(Change in Supply and Equilibrium Price: Some Exceptional Situations)
निम्नलिखित दो विशेष स्थितियों में यह देखा जा सकता है कि पूर्ति में वृद्धि या कमी किस प्रकार संतुलन कीमत को प्रभावित करती है:
(1) जव वस्तु की माँग पूर्णतया लोचदार रहती है, तथा
(2) जब वस्तु की माँग पूर्णतया वेलोचदार रहती है।
(1) जब माँग पूर्णतया लोचदार हो तो संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?
(When Demand is Perfectly Elastic)
यदि किसी वस्तु की माँग पूर्णतया लोचदार होती है तो पूर्ति के कम या अधिक होने का संतुलन कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इनका प्रभाव केवल संतुलन मात्रा पर पड़ेगा। चित्र 8 (A) तथा 8 (B) द्वारा इस स्थिति को स्पष्ट किया गया है।
(i) चित्र 8 (A) से ज्ञात होता है कि DD पूर्णतया लोचदार माँग वक्र है। प्रारंभिक पूर्ति वक्र SS है। यह माँग वक्र DD को बिंदु E पर काट रही है इसलिए बिंदु E संतुलन बिंदु होगा। इस बिंदु E से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत OP तथा संतुलन मात्रा OQ होगी। पूर्ति में वृद्धि हो जाने के कारण यदि पूर्ति वक्र नीचे दाईं ओर खिसककर S1S1 हो जाता है तो नया संतुलन हो जायेगी। बिंदु E होगा। बिंदु E1 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत OP ही रहेगी। परंतु संतुलन मात्रा बढ़कर OQ1
(ii) चित्र 8 (B) से ज्ञात होता है कि यदि पूर्ति में कमी होने के कारण पूर्ति वक्र ऊपर बाईं ओर खिसक कर S2S2 हो जाती है तो संतुलन बिंदु E2 होगा। इस बिंदु E2 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत पहले जितनी अर्थात् OP ही रहेगी परंतु संतुलन मात्रा कम होकर OQ2 हो जायेगी ।
(2) जब माँग पूर्णतया बेलोचदार हो तो संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?
(When Demand is Perfectly Inelastic)
यदि किसी वस्तु की माँग पूर्णतया बेलोचदार होती है तो पूर्ति के कम होने पर संतुलन कीमत बढ़ जायेगी तथा पूर्ति के बढ़ने पर यह कम हो जायेगी। इनका प्रभाव संतुलन मात्रा पर नहीं पड़ेगा। चित्र 9 (A) तथा 9 (B) द्वारा इस स्थिति को स्पष्ट किया गया है।
(i) चित्र 9 (A) से ज्ञात होता है कि DD पूर्णतया बेलोचदार माँग वक्र है। प्रारंभिक पूर्ति वक्र SS है। यह माँग वक्र DD को बिंदु E पर काट रही है अत: बिंदु E संतुलन बिंदु होगा । इस बिंदु E से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत OP तथा संतुलन मात्रा OQ होगी। यदि पूर्ति में वृद्धि हो जाने के कारण पूर्ति वक्र नीचे की ओर खिसककर S1S1 हो जाता है तो नया संतुलन बिंदु E होगा। बिंदु E1 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत कम होकर OP1 हो गई है। परंतु संतुलन मात्रा OQ ही रहेगी।
(ii) चित्र 9(B) से ज्ञात होता है कि यदि पूर्ति में कमी होने के कारण पूर्ति वक्र ऊपर की ओर खिसककर S2 S2 हो जाती है तो संतुलन बिंदु E2 होगा। बिंदु E2 से ज्ञात होता है कि संतुलन कीमत बढ़कर OP2 हो जायेगी परंतु संतुलन मात्रा OQ ही रहेगी।
5.माँग और पूर्ति में एक साथ परिवर्तन तथा संतुलन कीमत
(Simultaneous Change in Demand and Supply and Equilibrium Price)
(1) माँग और पूर्ति में एक साथ वृद्धि का संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?
(Simultaneous Increase in Demand and Supply)
हम जानते हैं कि माँग और पूर्ति में वृद्धि होने के कारण वस्तु की संतुलित मात्रा में अवश्य वृद्धि होती है। परंतु कीमत में कोई परिवर्तन होगा या नहीं, इस बात पर निर्भर करता है कि माँग में पूर्ति की तुलना में अधिक वृद्धि होती है, वराबर की वृद्धि होती है या कम वृद्धि होती है। अतएव माँग तथा पूर्ति में एक साथ परिवर्तन से संतुलन कीमत पर प्रभाव के संबंध में तीन स्थितियाँ हो सकती हैं। इन्हें चित्र 10 द्वारा प्रकट किया गया है।
(i) चित्र 10 (A) से ज्ञात होता है कि D1D1 प्रारंभिक माँग वक्र है तथा S1S1 प्रारंभिक पूर्ति वक्र है। संतुलन कीमत OP1 तथा संतुलन मात्रा OQ1 है। माँग के बढ़ने के कारण नया माँग वक्र D2D2 हो जाता है तथा पूर्ति के बढ़ने के कारण पूर्ति वक्र S2S2 हो जाता है। इस स्थिति में माँग में पूर्ति की तुलना में अधिक वृद्धि हुई है। इसलिए कीमत बढ़कर OP2 तथा संतुलन मात्रा बढ़कर OQ2 हो जाएगी। अतएव जब माँग, पूर्ति की तुलना में अधिक बढ़ती है तो संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा में वृद्धि होती है।
(ii) चित्र 10(B) से ज्ञात होता है कि माँग और पूर्ति में समान वृद्धि हुई है। इसलिए कीमत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। कीमत पहले जितनी अर्थात् OP1 ही है परंतु वस्तु की माँग तथा पूर्ति की मात्रा OQ1 से बढ़कर OQ2 हो गई। अतएव जब माँग और पूर्ति में वरावर की वृद्धि होती है तो संतुलन कीमत में कोई वृद्धि नहीं होती । परंतु संतुलन मात्रा बढ़ जाती है।
(iii) चित्र 10(C) से ज्ञात होता है कि पूर्ति में होने वाली वृद्धि माँग में होने वाली वृद्धि की तुलना में अधिक हुई है। इसलिए कीमत OP1 से कम होकर OP2 हो गई है परंतु संतुलन मात्रा OQ1 से बढ़कर OQ2 हो गई है। अतएव जब पूर्ति में वृद्धि माँग की तुलना में अधिक होती है तो संतुलन कीमत कम हो जाती है तथा संतुलन मात्रा बढ़ जाती है।
(2) माँग और पूर्ति में एक साथ कमी का संतुलन कीमत तथा माँगी गई मात्रा पर क्या पड़ेगा ?
(Simultaneous Decrease in Demand and Supply)
चित्र 11 में माँग तथा पूर्ति में एक साथ कमी का संतुलन कीमत तथा संतुलन मात्रा पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाया गया है।
(i) चित्र 11(A) से ज्ञात होता है कि D1D1 प्रारंभिक माँग वक्र है तथा S1S1 प्रारंभिक पूर्ति वक्र है। संतुलन कीमत OP1 तथा संतुलन मात्रा OQ1 है । माँग के कम होने के कारण नया माँग वक्र D2 D2 हो जाता है तथा पूर्ति के कम होने के कारण पूर्ति वक्र S2S2 हो जाता है । इस स्थिति में माँग में पूर्ति की तुलना में अधिक कमी हुई है। इसलिए संतुलन कीमत घटकर OP2 तथा संतुलन मात्रा घटकर OQ2 हो जाएगी। अतएव जब माँग पूर्ति की तुलना में अधिक कम होती है तो संतुलन कीमत भी कम होती है तथा संतुलन मात्रा घट जाती है।
(ii) चित्र 11(B) से ज्ञात होता है कि माँग और पूर्ति में समान कमी हुई है। इसलिए कीमत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। कीमत पहले जितनी अर्थात् OP1 ही है परंतु वस्तु की माँग तथा पूर्ति की मात्रा OQ1 से घटकर OQ2 हो गई है। अतएव जव माँग और पूर्ति में बराबर की कमी होती है तो संतुलन कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता। परंतु संतुलन मात्रा घट जाती है।
(iii) चित्र 11(C) से ज्ञात होता है कि पूर्ति में होने वाली कमी माँग में होने वाली कमी की तुलना में अधिक हुई है। इसलिए कीमत OP1 से बढ़कर OP 2 हो गई है परंतु संतुलन मात्रा OQ से घटकर 0Q2 हो गई है। अतएव जब पूर्ति में कमी माँग की तुलना में अधिक होती है तो संतुलन कीमत बढ़ जाती है तथा संतुलन मात्रा घट जाती है ।
6.समय तत्त्व तथा संतुलन कीमत मे क्या संबंद है ?
(Time Element and Equilibrium Price):-
एक उद्योग द्वारा वस्तु की संतुलन कीमत उस बिंदु पर निर्धारित की जाती है जिस पर माँग और पूर्ति एक-दूसरे के बराबर होती हैं । परंतु एक वस्तु की कीमत पर माँग का अधिक प्रभाव पड़ेगा अथवा पूर्ति का, यह इस बात पर निर्भर करता है कि माँग तथा पूर्ति को स्थिर होने के लिए कितना समय मिल रहा है। कीमत निर्धारण में समय तत्त्व के महत्त्व की विवेचना प्रो० मार्शल ने तीन प्रकार की समय अवधि के संदर्भ में की है।
(1) अति अल्पकाल (Very Short Period):-
अति अल्पकाल समय की वह अवधि है जिसमें किसी वस्तु की पूर्ति को केवल उसके वर्तमान स्टॉक तक बढ़ाया जा सकता है। नाशवान वस्तुओं की पूर्ति पूर्ण रूप से स्थिर या पूर्णतया बेलोचदार होती है। इसका कारण यह है कि अति अल्पकाल समय की इतनी कम अवधि होती है कि इसमें उत्पादन के साधनों में वृद्धि करके उत्पादन को बढ़ाना संभव नहीं होता। क्योंकि अति-अल्पकाल में सभी साधन स्थिर होते हैं।
इस स्थिति में कीमत निर्धारण में माँग का प्रभाव अधिक होता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि पूर्ति का कोई महत्त्व नहीं होता । वास्तव में इस स्थिति में कीमत के निर्धारण में पूर्ति निष्क्रिय तत्त्व (Passive Factor) तथा माँग सक्रिय तत्त्व (Active Factor ) होता है।
उदाहरण के लिये, जब किसान अपनी नाशवान सब्जियों को बाजार बेचने के लिये लाता है तो सब्जियों की उपलब्ध मात्रा महत्त्वपूर्ण तो होती है परंतु पूर्ति की दी हुई मात्रा की कीमत अधिक या कम होगी – यह इस बात पर निर्भर करेगा कि बाजार में सब्जियों की माँग उनकी पूर्ति से अधिक है या कम है।
अति अल्पकाल (Very Short Period) में जो कीमत बाजार में प्रचलित होती है उसे बाजार कीमत कहते हैं।
बाजार कीमत, वह कीमत है जो किसी वस्तु की एक बाजार में एक निश्चित समय पर प्रचलित होती हैं। (Market Price is the price of a commodity which prevails in a market at a particular time.)
बाजार कीमत का निर्धारण चित्र 12 से स्पष्ट हो जाता है। इस चित्र में OX- अक्ष पर वस्तु की मात्रा तथा OY-अक्ष पर कीमत दिखाई गई है। SS वस्तु की पूर्ति रेखा है। यह OY अक्ष के समानांतर एक लंब रेखा है जिससे प्रकट होता है कि वस्तु की पूर्ति एक स्थिर मात्रा है। DD माँग वक्र है। यह SS रेखा को बिंदु E पर काटती है, इसलिये इस बिंदु पर कीमत OP होगी। यदि किन्हीं कारणों द्वारा माँग बढ़ जाती है तो नई माँग वक्र D, D, होगी जो पूर्ति वक्र SS को E, बिंदु पर काटेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि वस्तु की OS मात्रा की कीमत OP से बढ़कर OP, हो जायेगी। यदि माँग घट जाती है तो नई माँग वक्र D2D2 होगी जो पूर्ति वक्र SS को E2 बिंदु पर काटेगी । वस्तु की कीमत OP से कम होकर OP2 रह जायेगी।
(2) अल्पकाल (Short Period):-
अल्पकाल समय की वह अवधि है जिसमें केवल परिवर्तनशील साधनों का अधिक उपयोग करके उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है तथा स्थिर साधन स्थिर ही बने रहते हैं। स्थिर साधनों में इसलिये परिवर्तन नहीं हो पाता क्योंकि समय की अवधि इतनी कम होती है कि उनमें परिवर्तन करना संभव नहीं है।
अल्पकाल में कीमत निर्धारण में पूर्ति का महत्त्व अति अल्पकाल की तुलना में अधिक होता है। अल्पकाल में पूर्ति एक सक्रिय तत्त्व बन जाती है। परंतु कई साधनों की स्थिरता के कारण पूर्ति कीमत निर्धारण का इतना महत्त्वपूर्ण निर्धारक नहीं हो पाती जितना कि माँग । माँग में बिना किसी बाधा के परिवर्तन होता है।
अल्पकाल में जो कीमत निर्धारित होती है उसे उप- सामान्य कीमत (Sub- normal Price) कहते हैं।
चित्र 13 द्वारा उप-सामान्य कीमत के निर्धारण को स्पष्ट किया गया है। OX- अक्ष पर उत्पादन की मात्रा तथा OY-अक्ष पर कीमत प्रकट की गई है। SS उद्योग का अल्पकालीन पूर्ति वक्र है । यह नीचे से ऊपर की ओर उठ रहा है। DD प्रारंभिक माँग वक्र है। DD वक्र अल्पकालीन पूर्ति वक्र SS को बिंदु E पर काट रही है। बिंदु E से ज्ञात होता है कि OP संतुलन कीमत तथा OQ संतुलन मात्रा है।
- DD माँग की स्थिति में, OP उपसामान्य कीमत है।
- D1 D1 माँग की स्थिति में, OP1 उप सामान्य कीमत है।
- D2D2 माँग की स्थिति में, OP2 उप सामान्य कीमत है।
माँग में वृद्धि होने पर अल्पकाल में संतुलन कीमत तथा उत्पादन में वृद्धि होगी। उदाहरण के लिये मान लीजिये माँग वक्र DD से खिसककर D1D1 हो जाती है। चित्र 13 से ज्ञात होता है कि माँग वक्र के ऊपर की ओर खिसक जाने के कारण प्रारंभिक कीमत OP पर पूर्ति की कमी होगी तथा कीमत बढ़कर OP1 हो जायेगी। इस स्थिति में प्रत्येक फर्म अपने उत्पादन में वृद्धि करेगी जिससे सीमांत लागत नई ऊंची कीमत के बराबर हो जाये। इसके फलस्वरूप जैसा कि संतुलन बिंदु E1 से ज्ञात होता है, उद्योग की उत्पादन मात्रा बढ़कर OQ1 हो जायेगी। इसके विपरीत यदि माँग वक्र नीचे की ओर खिसककर DD से D2D2 हो जाए यह पूर्ति वक्र को बिंदु E2 पर काटेगी। नये संतुलन बिंदु E2 से ज्ञात होता है कि नई संतुलन कीमत कम होकर OP2 हो जायेगी तथा संतुलन मात्रा घटकर OQ2 हो जायेगा।
कीमत में अंतर नोट करें:-
बाजार कीमत वह कीमत है जो समय के एक निश्चित बिंदु पर बाजार में पाई जाती है, चाहे पूर्ति और माँग की शक्तियों में समन्वय हुआ हो अथवा नहीं।
सामान्य कीमत वह कीमत है जिसकी उस समय पाए जाने की संभावना है जब पूर्ति और माँग की शक्तियों में पूर्ण रूप से समन्वय हो चुका हो ।
( 3 ) दीर्घकाल (Long Period):-
दीर्घकाल समय की वह अवधि है जिसमें उत्पादन के सभी साधन परिवर्तनशील होते हैं। दीर्घकाल में परिवर्तनशील तथा स्थिर दोनों प्रकार के साधनों में परिवर्तन करके उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है। पूर्ति में, माँग में होने वाले परिवर्तन के अनुसार पूरी तरह परिवर्तन हो सकता है।
दीर्घकाल में पूर्ति पूरी तरह से लोचशील हो जाती है तथा कीमत के निर्धारण में इसका महत्त्व बढ़ जाता है। समय की इस अवधि में बाजार में कीमत निर्धारण में माँग तथा पूर्ति दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं। जिस प्रकार कैंची के दोनों ब्लेड कपड़ा काटने में समान रूप से महत्त्वपूर्ण होते हैं उसी प्रकार कीमत निर्धारण में माँग तथा पूर्ति दोनों ही महत्त्वपूर्ण होते हैं।
इस संबंध में मार्शल ने ठीक ही निष्कर्ष निकाला है कि समय जितना अधिक लम्बा होगा कीमत निर्धारण में पूर्ति का महत्त्व उतना ही अधिक बढ़ जायेगा।
दीर्घकाल में जो कीमत निर्धारित होती है उसे सामान्य कीमत कहते हैं।
मार्शल के अनुसार, “सामान्य कीमत वह कीमत है जो बाज़ार में उस स्थिति में प्रचलित होने की प्रवृत्ति प्रकट करती है जिसमें माँग और पूर्ति की शक्तियों को परस्पर एक-दूसरे के समान होने का पूरा-पूरा समय मिल जाता “(Normal Price is that price which tends to prevail in a market when full time is given to the forces of demand and supply to adjust themselves. —Marshall)
बाजार कीमत और सामान्य कीमत के अंतर को नोट करें
बाजार कीमत वह कीमत है जो समय के निश्चित बिंदु पर पाई जाती है। चाहे माँग और पूर्ति की शक्तियाँ एक-दूसरे को समन्वित करें अथवा नहीं। सामान्य कीमत वह कीमत है जिसे तब पाए जाने की अपेक्षा की जाती है जब पूर्ति और माँग की शक्तियाँ आपस में पूर्ण रूप से समन्वित हो जाती है।
सामान्य कीमत के निर्धारण को चित्र 14 द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
चित्र 14 में OX-अक्ष पर वस्तु की मात्रा तथा OY – अक्ष पर कीमत प्रकट की गई है। उद्योग की माँग वक्र DD तथा LS दीर्घकालीन पूर्ति वक्र हैं। उद्योग की माँग वक्र तथा पूर्ति वक्र E बिंदु पर एक-दूसरे को काट रही हैं, इसलिये सामान्य कीमत OP निर्धारित होगी। यदि किसी कारणवश उद्योग, कीमत को बढ़ाकर OP से OP1 कर देता है तो कीमत फिर से दोबारा OP हो जायेगी। इसका कारण यह है कि OP1 कीमत पर माँग OQ2 है तथा वस्तु की पूर्ति OM है। वस्तु की पूर्ति (OM) के माँग (OQ2) से अधिक होने के कारण उद्योग को कीमत कम करनी पड़ेगी, इस प्रकार कीमत कम होकर OP हो जायेगी। इसके विपरीत यदि किसी कारणवश उद्योग को कीमत OP से कम करके OP2 करनी पड़ती है तो यह कीमत भी स्थिर नहीं रहेगी। कीमत OP2 से बढ़कर OP हो जायेगी । इसका कारण यह है कि OP2 कीमत पर माँग (OQ1) है तथा पूर्ति (ON) है। वस्तु की माँग (OQ 1) पूर्ति (ON) से अधिक है। माँग के पूर्ति से अधिक होने पर कीमत में वृद्धि होगी तथा कीमत बढ़कर OP हो जायेगी । चित्र 15 से ज्ञात होता है कि बाजार कीमत की प्रवृत्ति सामान्य कीमत के इर्दगिर्द घूमने की होती है।
बाजार कीमत सामान्य कीमत के चारों ओर घूमती है।
17.सरकार द्वारा कीमत नियंत्रण – उच्चतम कीमत एवं न्यूनतम कीमत
(Price Control by the Government-Ceiling Price and Floor Price)
एक प्रतियोगी वातावरण में भी जहाँ वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें माँग तथा पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती हैं, सरकारी हस्तक्षेप का पूर्ण रूप से अभाव नहीं पाया जाता है। समस्त समाज के हित को ध्यान में रखते हुए, सरकार विशेष वस्तुओं की कीमत को संतुलन कीमत के स्तर से नीचे या ऊपर निर्धारित कर सकती है। सरकार विशेष वस्तुओं की कीमतों के एक उच्चतम स्तर तथा न्यूनतम स्तर को निर्धारित कर देती हैं। विशेष वस्तुओं जैसे जीवन के लिए अनिवार्य वस्तुओं की कीमत के उच्चतम स्तर को उच्चतम कीमत या अधिकतम कीमत (Ceiling Price) कहते हैं। इसी प्रकार कुछ वस्तुओं, विशेष रूप से कृषि पदार्थों की कीमत न्यूनतम स्तर को न्यूनतम कीमत (Floor Price) कहते हैं ।
7.1 उच्चतम कीमत (Ceiling Price):-
उच्चतम कीमत से अभिप्राय उस अधिकतम कीमत से है जो उत्पादक अपनी वस्तु के लिए प्राप्त कर सकते हैं। (Ceiling Price refers to maximum price that the producers can charge for their products)
इसे उस स्थिति में लागू किया जाता है जब जीवन के लिए नितांत आवश्यक वस्तुओं, जैसे चीनी या जीवन रक्षक दवाइयों की बाजार में बहुत अधिक दुर्लभता पायी जाती है।
कारण (Reason):- इन वस्तुओं की संतुलन कीमत के बहुत अधिक बढ़ जाने की संभावना होती है तथा ये वस्तुएँ अधिकांश जनसंख्या की पहुँच के बाहर हो जाती हैं।
उच्चतम कीमत का प्रभाव (Effect of Ceiling Price)
यदि उच्चतम कीमत प्रचलित संतुलन कीमत के बराबर या ऊपर निर्धारित की जायेगी तो इसका अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत यदि उच्चतम कीमत प्रचलित संतुलन कीमत के नीचे निर्धारित की जायेगी तो माँग आधिक्य (Excess Demand) की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। माँग आधिक्य वह स्थिति है जिसमें उच्चतम कीमत पर माँग, पूर्ति से अधिक होती है। इसे चित्र 16 द्वारा प्रकट किया गया है।
उच्चतम कीमत (Ceiling Price) OP1 है। इस कीमत के फलस्वरूप पूर्ति घटकर P1a और माँग बढ़कर P1b हो जाएगी। परिणामस्वरूप माँग में पूर्ति से अधिक (TR के बराबर ) वृद्धि हो जायेगी । अर्थात्
माँग > पूर्ति
माँग(P1b) – पूर्ति(P1a) = ab = आधिक्य माँग (Excess Demand )
आधिक्य माँग के कारण वस्तु चोर बाजार या काले बाज़ार (Black Marketing) में बिकने लगती है। काले बाजार से अभिप्राय उस अभेद बाजार से है जिसमें किसी वस्तु को सरकार द्वारा निर्धारित कीमत से अधिक कीमत पर गैर-कानूनी तरीके से बेचा जाता है। इसे रोकने के लिए सरकार राशनिंग लागू करती है तथा वस्तु का वितरण ‘सस्ती कीमत दुकानों’ द्वारा किया जाता है।
7.2 न्यूनतम कीमत (Floor Price ):-
न्यूनतम कीमत से अभिप्राय उस कम-से-कम कीमत से है जो उत्पादकों को उनके उत्पाद के लिए दी जाती है। (Floor Price refers to the minimum price that the producers are to be paid for their products.)
किसानों को न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के लिए प्रायः उन्हें यह कीमत दी जाती है।
किसानों को न्यूनतम आय सुनिश्चित करना क्यों जरूरी है ?
(Why do the Farmers need to be Assured of Minimum Income?)
क्योंकि किसी फसल के बहुत अधिक उत्पादन तथा बाजार में अत्यधिक पूर्ति (Excess Supply) की स्थिति में, कृषि पदार्थ के दाम बहुत गिर जाते हैं। फलस्वरूप किसान की आय में बहुत अधिक उत्पादन के बावजूद भारी कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति को ही ‘बाहुल्यता में निर्धनता का विरोधाभास ‘ ( Paradox of Poverty) कहते हैं।
न्यूनतम कीमत का प्रभाव (Effect of Floor Price):-
यदि न्यूनतम कीमत प्रचलित संतुलन कीमत के बराबर या कम निर्धारित की जाती है तो उसका बाजार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । परंतु यदि न्यूनतम कीमत प्रचलित संतुलन कीमत से अधिक निर्धारित की जाती है तो उसके फलस्वरूप पूर्ति आधिक्य (Excess Supply) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पूर्ति आधिक्य वह स्थिति है जिसमें न्यूनतम कीमत पर पूर्ति माँग से अधिक होती है। इसे निम्नलिखित चित्र 17 द्वारा दिखाया गया है।
- संतुलन कीमत = OP
- संतुलन मात्रा = OL
- पटल कीमत = OP2
- आधिक्य पूर्ति = ab = L1L2
चित्र 17 में, संतुलन कीमत = OP, जहाँ बाजार पूर्ति = बाजार माँग = PQ
यदि न्यूनतम कीमत OP2 निर्धारित की जाती है तो यह (संभावित) संतुलन कीमत से ऊँची है। फलस्वरूप पूर्ति में P2b विस्तार और माँग में P2a संकुचन होता है । इसके फलस्वरूप पूर्ति आधिक्य (Excess Supply) ab की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। अर्थात् पूर्ति > माँग ।
पूर्ति – माँग = ab = पूर्ति आधिक्य (Excess Supply)
पूर्ति आधिक्य के कारण कीमत में भारी गिरावट आएगी और ‘न्यूनतम कीमत’ निर्धारित करने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पायेगा। इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिये ‘समर्थन कीमत’ (Support Price) को न्यूनतम कीमत के पूरक रूप में लागू किया जाता है।
‘समर्थन कीमत‘ उस कीमत को कहते हैं जिस पर सरकार किसानों के आधिक्य उत्पादन को स्वयं खरीदने के लिए वचनबद्ध होती है। यदि किसानों को खुले बाजार में उत्पादन की न्यूनतम कीमत प्राप्त न हो सके तो वो अपने उत्पादन को सरकारी एजेंसी के पास समर्थन कीमत पर बेच सकते हैं। ‘समर्थन कीमत’ में न्यूनतम कीमत सम्मिलित होती है।
नियंत्रण कीमत तथा समर्थन कीमत (Control Price and Support Price):-
(i) नियंत्रण कीमत (Control Price):-
वस्तुओं की कीमत को उनकी संतुलन कीमत से नीचे निर्धारित किया जाता है जिससे विशेष जन-समूह को नितांत आवश्यक वस्तुओं की न्यूनतम पूर्ति सुनिश्चित कर सके।
(ii) समर्थन कीमत ( Support Price) :-
सरकार द्वारा संतुलन कीमत के ऊपर निर्धारित की जाती है जिससे किसानों को न्यूनतम आय सुनिश्चित करायी जा सके ।
काला बाजार (Black Market):-
काले बाजार से अभिप्राय उस अवैध बाजार से है जिसमें किसी वस्तु को सरकार द्वारा उसकी निर्धारित कीमत से अधिक कीमत पर गैर-कानूनी तरीके से बेचा जाता है।
माँग पूर्ति विश्लेषण तथा FAD सिद्धांत कि व्याख्या करे (Demand Supply Analysis and FAD Theory)
FAD शब्द के अर्थ हैं Food Availability Decline (खाद्य उपलब्धता अपकर्ष) अर्थात् भोजन की कीमत में वृद्धि होने के कारण निर्धन लोगों के लिए भोजन या खाद्य पदार्थों की उपलब्धता में होने वाली कमी ।
खाद्य उपलब्धता अपकर्ष सिद्धांत:-
इस सिद्धांत का प्रतिपादन नोबल पुरस्कार विजेता (1998) अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने किया था। इस सिद्धांत के अनुसार जब किसी देश में प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़ या सूखे के कारण भोजन की पूर्ति कम होने के परिणामस्वरूप उसकी कीमत इतनी अधिक बढ़ जाती है, तो निर्धन लोगों के लिए खाद्य पदार्थ खरीद कर उपभोग करना संभव नहीं होता। इसके कारण भूख से निर्धन लोगों की मृत्यु होने लगती है, इस स्थिति को अकाल की स्थिति कहा जाता है।
अतएव खाद्य उपलब्धता अपकर्ष सिद्धांत (FAD Theory) के अनुसार अकाल के कारण तथा यातायात के साधनों के अभाव में निर्धन लोगों को मिलने वाले खाद्य उपलब्धता में कमी हो जाती है जिसके फलस्वरूप उनकी अधिक संख्या में मृत्यु होने लगती है ।
इस सिद्धांत को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। बाढ़ या सूखे जैसे प्राकृतिक आपदा के कारण, मान लो चावल का उत्पादन किसी क्षेत्र में बहुत ही कम हो जाता है तब चावल की कीमत अधिकतर लोगों की पहुंच से बहुत अधिक हो जाती है। यदि इस अवस्था में जब यातायात के साधनों के अभाव के कारण क्षेत्रीय अभाव की ऐसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं जिनके कारण अतिरिक्त अनाज वाले क्षेत्रों से अभावग्रस्त क्षेत्रों में अनाज नहीं पहुँचाया जा सकता तो इससे लोगों को भूख के कारण मृत्यु का सामना करना पड़ता है तथा अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
चित्र 20(A), 20 (B) और 20 (C) में तीन परिवारों A, B तथा C के माँग वक्र और चित्र 20 (D) में बाजार माँग वक्र दिखाए गए हैं। ‘A’ अति निर्धन परिवार है, B परिवार ‘C’ से निर्धन है और ‘C’ धनी परिवार है। OP0 कीमत पर तीनों परिवार अनाज को खरीदने में सामर्थ्य हैं। जब कीमत बढ़कर OP1 हो जाती है तब ‘A’ परिवार बाजार से हट जाता है जबकि ‘B’ और ‘C’ परिवार अब भी अनाज को खरीदने के योग्य है। OP2 कीमत पर, ‘A’ तथा ‘B’ दोनों परिवार अनाज खरीदने के अयोग्य हैं। अत: उन्हें भूखमरी (Starvation) का सामना करना पड़ता है। बाजार माँग वक्र (जोकि तीन परिवारों के माँग वक्रों का समस्तरीय जोड़ है) से यह स्पष्ट होता है कि बाजार कीमत के बढ़ने से अनाज की उपलब्धि कम होती जाती है। यही प्रो. सेन का “ खाद्य उपलब्धता अपकर्ष सिद्धांत” (Food Availability Decline – FAD Theory) है।